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नहीं रहे कर्नल रिटायर्ड नरेंद्र कुमार जिनको लोग प्यार से 'बुल' कहते थे

सियाचिन के 'असली हीरो' का 87 साल की उम्र में निधन.

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नरेंद्र बुल. (फोटो- इंडिया टुडे)
कर्नल नरेंद्र कुमार 'बुल' (रिटायर्ड) नहीं रहे. दिल्ली के आर्मी अस्पताल में गुरुवार 31 दिसंबर को उनका निधन हो गया. वो 87 साल के थे. सियाचिन पर भारतीय कब्जे में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. उनकी पहचान शानदार पर्वतारोही के रूप में भी थी. पीएम नरेंद्र मोदी, सीडीएस जनरल बिपिन रावत समेत कई और ने भी उनके निधन पर शोक जताया है. https://twitter.com/narendramodi/status/1344691501759082497 भारतीय सेना ने जताया दुख भारतीय सेना की ओर से नरेंद्र कुमार 'बुल' की मौत पर शोक जताया गया है. ट्वीट में सेना ने कहा कि "बोल्ड और डेयरिंग सोल्जर्स कभी नहीं मरते हैं, वे केवल धुंधले हो जाते हैं". सेना ने कहा,
"एक सिपाही जिसके धैर्य, दृढ़ निश्चय, ऊंची चोटियों को नापने की उनकी तड़प ने उन खोजों को जन्म दिया जिसने सेना की मदद की, उन जगहों पर पहुंचने में और वहां की हिफाजत करने में. साल्टोरो-रिज और लद्दाख के अन्य क्षेत्रों में हमारी मजबूत स्थिति उनकी साहसिक यात्राओं का एक हिस्सा है. हमारी सेना के समृद्ध इतिहास में उनका नाम हमेशा रहेगा. बुल कुमार भले ही हमें छोड़ गए हों, लेकिन हम सभी जानते हैं कि बोल्ड और साहसी सैनिक कभी नहीं मरते, वे केवल धुंधले हो जाते हैं. उनकी आत्मा को शांति मिले."
https://twitter.com/adgpi/status/1344873473852600321 https://twitter.com/ANI/status/1344889443774201856 नरेंद्र ने पहचान लिया था पाकिस्तान की नजरों को साल 1933. जगह पाकिस्तान का रावलपिंडी. नरेंद्र का जन्म हुआ था. बंटवारा हुआ तो नरेंद्र परिवार के साथ भारत आ गए. साल 1953 में वे भारतीय सैन्य एकेडमी देहरादून से कुमाऊं रेजीमेंट में शामिल हुए थे. साल 1984 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत चलाया. उन्होंने इस अभियान का नेतृत्व किया. भारतीय सेना ने सियाचिन पर कब्जा किया. ऐसा माना जाता है कि 1977 में उन्होंने पाकिस्तान की साजिश को पहचान लिया था और उनकी रिपोर्ट के आधार पर ही तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन मेघदूत पर हां कही थी. पाकिस्तान सियाचिन को कब्जा लेना चाहता था. 'बुल' ने सियाचिन से सटी सल्तोरो पर्वत- पर चढ़ाई का अभियान शुरू किया. इस जगह की महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थिति के कारण सियाचिन पर भारतीय कब्जा आसान हो गया. दरअसल इस पहाड़ी की स्थिति ऐसी है जिसकी वजह से ऐसा कहा जाता है कि जिसके पास सल्तोरो होता है, उसी के पास सियाचिन भी होता है. हिमालय की बहुत सी पर्वत चोटियों पर नरेंद्र ने फतेह हासिल की, उन्होंने कंचनजंघा पर्वत चोटी पर भी चढ़ाई की. उनकी सेवाओं के लिए उनको अर्जुन पुरुस्कार के साथ-साथ पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया था.

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