सेंसर बोर्ड सिनेमा की दुनिया का सबसे कोसा गया नाम है. इसे निर्देशकों से लेकर दर्शकों तक (सुशील दर्शकों को छोड़कर) सबकी गालियां पड़ी हैं. अौर पिछले साल नियुक्त हुए नए सेंट्रल बोर्ड अॉफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के अध्यक्ष पहलाज निहलाणी जी ने अपने ताज़ा फैसलों से इसकी जनता में व्याप्त प्रतिष्ठा में इजाफ़ा ही किया है.
सेंसर बोर्ड की कैंची पर चलेगी श्याम बेनेगल की दरांती?
श्याम बेनेगल कमेटी ने कहा, CBFC का काम सेंसर करना नहीं, सिर्फ सर्टिफिकेट देना है. इसके अलावा भी हैं रिपोर्ट में कई क्रांतिकारी सुझाव.


जब पानी सर से ऊपर निकल गया तो सरकार ने साल की शुरुआत में निर्देशक श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसे भारत में सेंसरशिप अौर फिल्म सर्टिफिकेशन की पूरी प्रक्रिया का रिव्यू करने के लिए कहा गया. उन्हें इस सिलसिले में दुनियाभर की अच्छी प्रैक्टिसेस को भी ध्यान में रखने अौर उन्हें अपनी रिपोर्ट में शामिल करने को कहा गया. समिति में बांग्ला निर्देशक गौतम घोष, तमिल सिनेमा के सुपरस्टार कमल हासन, रंग दे बसंती फेम निर्देशक राकेश अोमप्रकाश मेहरा, विज्ञापन गुरु पीयुष पांडे, एनएफडीसी की निर्देशक नीता लाठ गुप्ता जैसे दिग्गज नाम शामिल थे. इन प्रतिष्ठित नामों के होने से समिति के प्रति समूचे सिनेमा उद्योग की उम्मीदें बहुत बढ़ गई हैं.
समिति ने अपने शुरुआती सुझाव सूचना अौर प्रसारण विभाग को सौंप दिए हैं. आइये जानें क्या हैं समिति के मुख्य सुझाव −
समिति ने एक बार फिर दोहराया है कि सीबीएफसी का काम सिर्फ फिल्मों को सही कैटेगरी के हिसाब से सर्टिफिकेट देना है. उनका काम होना चाहिए फिल्म को देखना अौर उसके हिसाब से यह तय करना कि यह कौनसी उमर के दर्शकों के लिए मुफीद रहेगी. अपनी बनते उन्हें फिल्मों की काट-छांट करने से बचना चाहिए.
हालांकि इसमें एक पेंच है. समिति ने लिखा है कि अगर फिल्म सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 के सेक्शन 5बी (1) में दर्ज किसी बात का उल्लंघन करती है, इस सूरत में बोर्ड को सर्टिफिकेशन से मना करने का अधिकार होगा.
सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 के इस सेक्शन में कुछ बातें शामिल हैं, जिनके आधार पर फिल्म को परखा जा सकता है. जैसे कि वो भारत की एकता, सुरक्षा अौर संप्रभुता को कोई चोट न पहुंचाए, अन्य देशों के साथ देश के मैत्री संबंधों में बाधा न डाले, सार्वजनिक व्यवस्था, भद्रता अौर नैतिकता के खिलाफ़ न जाए अौर कोर्ट के किसी आदेश की अवमानना नहीं करे.
सर्टिफिकेशन से संबंधित मामले में अौर सुधार के लिए समिति ने कुछ नई सब-कैटेगरी प्रस्तावित की हैं। जैसे यूए कैटेगरी को आगे यूए 12+ अौर यूए 15+ जैसी सब-कैटेगरी में बांटने का प्रस्ताव है. इसी तरह एडल्ट फिल्म को भी आगे ए. के साथ ए.सी. (एडल्ट विथ कॉशन) जैसी विशेष श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव है. अभी सीबीएफ़सी फिल्मों को यू (सभी के लिए मुफीद फिल्म), यू ए (बारह साल के कम उम्र के बच्चे बड़ों के साथ देखें) अौर ए (अठ्ठारह साल से बड़े दर्शकों के लिए) सर्टिफिकेट देती है.
इन सुझावों का वृहत उद्देश्य पांच बिन्दुअों में यहां बताया गया है −1.
बच्चे अौर बड़े किसी भी किस्म के नुकसानदायक प्रभावों से बचें2.
दर्शक, खासकर माता-पिता समझबूझ भरा फैसला लेने में सक्षम हों3.
फिल्मों के उपयुक्त खांचों में बंटवारे की यह प्रक्रिया रचनात्मक आज़ादी अौर कलात्मक अभिव्यक्ति को बाधित ना करे4.
सर्टिफिकेशन की यह प्रक्रिया निरंतर हो रहे सामाजिक बदलाव के प्रति जवाबदेह हो5.
सिनेमा का सर्टिफिकेशन सदा भारतीय संविधान के द्वारा निर्धारित अधिकारों अौर नियमों के अन्तर्गत रहे इसके अलावा रिपोर्ट में सीबीएफ़सी के केन्द्रीय बोर्ड अौर अध्यक्ष के लिए सर्टिफिकेशन की इस दैनंदिन प्रक्रिया से अलग रहने का सुझाव भी शामिल है. सदस्य संख्या भी क्षेत्रवार एक सदस्य तक सीमित करने का सुझाव है.क्षेत्रीय समितियां, जिन्हें सर्टिफिकेशन का काम अंजाम देना है, उनके गठन के लिए भी दिशानिर्देश रिपोर्ट में शामिल हैं.
− पच्चीस प्रतिशत सदस्य समाज के सभी पेशों से लिए जायेंगे, जिनके नाम नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पो्रेशन (NFDC) केन्द्रीय सरकार को भेजेगी.
− पच्चीस प्रतिशत सदस्य सामान्य जनता से आयेंगे, जिनके नाम फेडरेशन अॉफ फिल्म सोसाइटीज़ अॉफ इंडिया (FFCI) प्रस्तावित करेगी. − पच्चीस प्रतिशत सदस्य नेशनल काउंसिल फोर प्रोटेक्शन अॉफ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) अौर नेशनल कमीशन अॉफ विमन (NCW) द्वारा प्रस्तावित किए जायेंगे. − पच्चीस प्रतिशत स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री से सदस्य, जिनके नाम फिल्म फेडरेशन अॉफ इंडिया (FFI) द्वारा प्रस्तावित होंगे.इसके अलावा नौ क्षेत्रों में हर बोर्ड में पचास प्रतिशत संख्या महिलाअों की होनी चाहिए अौर सभी सदस्य अपने क्षेत्र की स्थानीय भाषा से परिचित होने चाहियें.
इसके अलावा कई अन्य सुझाव भी रिपोर्ट में शामिल हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य सर्टिफिकेशन की पूरी प्रक्रिया को सिनेमा उद्योग अौर रचनात्मक कलाकारों के लिए ज़्यादा सरल बनाना है. इनमें अॉनलाइन सबमीशन की सुविधा, ज़रुरत पड़ने पर टेलिविज़न के लिए रीसर्टिफिकेशन, विशेष परिस्थितियों में अतिरिक्त शुल्क के साथ आउट-अॉफ-टर्न सर्टिफिकेशन की सुविधा जैसी सुविधाएं शामिल हैं.
एक अौर बेहतरीन सुझाव जो समिति की रिपोर्ट में शामिल है, अौर जिसमें उनकी क्रियेटिव समझदारी दिखती है, वो यह है कि प्रदर्शन के लिए फिल्म चाहे कैसे भी सर्टिफाइड हो अौर कट हो, गोवा के राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय (NFAI) में उसका मूल 'डाइरेक्टर्स कट' ही रखा जाना चाहिए. बिना किसी कांट-छांट वाला.
इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. समाज की प्रचलित मान्यताएं समय के साथ बदलती हैं, कई बार उलट भी जाती हैं. कई बार कलाकार की रचनात्मक उड़ान अपने दौर की मान्यताअों के पार निकल जाती हैं. हो सकता है एक दौर का 'अनैतिक', दूसरे समय में सामान्य बात हो. इसीलिए उस रचनात्मकता को अपने मूल स्वरूप में ही सुरक्षित रखा जाना चाहिए. इस फैसले आनेवाली जेनेरेशन को हमारे दौर के सिनेमा का सही पता मिलेगा.












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