The Lallantop

हाथी से उतरे मौर्य, माया बोलीं- मुलायम का जूठा खा लिया क्या?

UP चुनावों से पहले BSP को झटका, दरअसल उतना बड़ा झटका नहीं. मायावती 'चिल्ड आउट' हैं.

Advertisement
post-main-image
फोटो - thelallantop
सितंबर 2014 की बात है. मायावती अपने खास सिपहसालार स्वामी प्रसाद मौर्य के एक बयान से असहज हो गई थीं. लखनऊ की एक सभा में वह कह गए थे कि शादियों में गौरी-गणेश की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह दलित-पिछड़ों को गुमराह कर उन्हें मनुवादी सिस्टम का गुलाम बनाने की साजिश है.
मौर्य ने कह तो दिया लेकिन समेटने में मायावती को पसीने छूट गए. वह खुद प्रेस के सामने आईं और कहा कि बीएसपी सब धर्मों की प्रतिनिधि है, 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' में यकीन रखती है. इसलिए मौर्य का कमेंट उनका पर्सनल है. पार्टी इससे सहमत नहीं है.'
मौर्य मामूली नेता नहीं थे. उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे. बीएसपी में उनकी हैसियत टॉप-थ्री की थी. लेकिन तब बीएसपी 'इनको मारो जूते चार' वाले दौर से आगे बढ़कर 'हाथी नहीं गणेश है' के नारे तक आ चुकी थी. बाभन-दलितों का साझा फॉर्मूला काम कर गया था. अंग्रेजी के विश्लेषकों ने इसे 'सोशल इंजीनियरिंग' कहकर स्टैटजी के स्तर पर ऊंचा दर्जा दे दियाथा. इसलिए मायावती स्वीकार्यता के मोह में थीं और उनके पास चारा नहीं था. उन्हें पार्टी के हार्डकोर अंबेडकरवादियों को उनके प्रकट 'हिंदू विरोध' से रोके रखना था.
बीएसपी में माया ही सुप्रीमो रहीं. उनके बाद किसी की बात मायने नहीं रखतीं. लेकिन अब मौर्य चुनाव से ठीक पहले हाथी से उतर चुके हैं, इसलिए जाते-जाते वह माया को 'दौलत की बेटी' भी बता गए. उसके बाद वही बोला, जो हर पार्टी छोड़ने वाला पिछले 15 साल से बोल रहा है. बहन जी टिकट बेचती हैं. बहन जी कांशीराम औऱ आंबेडकर
 के रास्ते से भटक गई हैं. वे दलित नहीं, दौलत की बेटी हैं.
पर भाईसाहब, ये बात आपको तभी क्यों पता चलती है, जब आप किनारे कर दिए जाते हैं. इसके पहले भी जितने कद्दावर नेताओं ने, फिर चाहे वह आरके चौधरी रहे हों, या जंगबहादुर पटेल, या फिर जुगल किशोर, सबको ये तभी पता चला.

मौर्य ने मुलायम का जूठा खा लिया था: मायावती

मौर्य के इस्तीफे के बाद बुधवार को मायावती ने भी प्रेस कांफ्रेंस की और वो बिना नरमी बरते आरोपों का सिक्का पलट दिया. बोलीं, 'ये जो स्वामी प्रसाद मौर्या गया है, परिवारवाद के चक्कर में गया है.'
मायावती ने कहा कि मौर्य अपने बेटे-बेटी के लिए मनचाही सीट से टिकट चाह रहे थे. 2012 से उन्हें परिवारवाद का मोह था. पिछले चुनाव में उन्होंने बेटे-बेटी के लिए मनचाही सीटों से टिकट हासिल भी कर लिया था. माया बोलीं, 'लेकिन इस बार वो बात करने आए तो मैंने कहा कि आपने मुलायम सिंह का जूठा खा लिया है क्या? इसके बाद वह कई बार बात करने आए, पर मैंने कहा कि आपके बच्चों के टिकट के बारे में कोई बात नहीं करूंगी. मैंने कहा आपको टिकट मिलेगा. आपको रहना है, काम करना है करिए, वरना रास्ते खुले हैं. हम दो-तीन दिन में उन्हें खुद पार्टी से निकालने वाले थे, अच्छा है कि वे खुद चले गए.'
मायावती ने 'दौलत की बेटी' वाली बात पर भी बोलीं. कहा कि जो जाता है, उन्हें कुछ मिलता नहीं तो मुझे दौलत की बेटी कह जाता है. ये तो इत्तेफाक से मेरे मां-बाप ने मेरा नाम माया रख दिया.


स्वामी प्रसाद मौर्य के मायावती पर आरोप

-2017 का चुनाव जो बीएसपी के लिए 'डू और डाई' का चुनाव है, वहां आज बड़े पैमाने पर ऊंची जाति के लोगों को दिया जा रहा है. एक ही सीट पर कई बार नीलामी हो रही है. इससे मौलिक कार्यकर्ता परेशान है. खिन्न है. पार्टी में टिकटों पर नीलामी हो रही है और पार्टी नीलामी का बाजार बन चुकी है.
-बाबासाहेब के सिद्धांतों से समझौता किया जा रहा है.
-कांशीराम ने कहा था, 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'. लेकिन अब मायावती 'जिसकी जितनी तैयारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के हिसाब से काम कर रही हैं.
https://twitter.com/ANINewsUP/status/745552849212313600
-दलित-पिछड़ा जो बरसों तक अपमानित होता रहा, मायावती उसका रास्ता रोक रही हैं.
-अगर वे सही मायनों में कांशीराम के रास्ते पर चलतीं तो 2012 में हम सरकार में जरूर आते. तब सरकार की कोई एंटी इंकम्बेंसी नहीं थी.
-2014 चुनाव में भी इनका सूपड़ा साफ हुआ. क्योंकिसारे प्रत्याशी पैसे के बिनाह पर घोषित किए गए थे.



स्वामी प्रसाद पर लौटते हैं. क्योंकि ये बड़े थे. करीबी थे.

हाल तक इनकी हनक चल रही थी. फेसबुक पर मायावती की फोटो वाला पोस्टर लगाकर उन्होंने 'रमजान मुबारक' कहा था. हाल के इंटरव्यूज में वो अगले साल के यूपी चुनावों में बीएसपी की बड़ी जीत के दावे कर रहे थे.
मौर्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे. क्योंकि बहिन जी विपक्ष में नहीं बैठतीं. वह विधानसभा में घुसती हैं, तो बतौर मुख्यमंत्री. वरना राज्यसभा सांसद बन दिल्ली से दरबार चलाती हैं. इसलिए यूपी विधानसभा में बीएसपी के अगुवा मौर्य ही थे.
स्वामी प्रसाद मौर्य
स्वामी प्रसाद मौर्य

स्वामी प्रसाद मौर्य बीएसपी सुप्रीमो के कितना करीब थे. उन्हें कितनी छूट थी. इसे यूं समझ लें कि बीएसपी में चुप्पा राज होता है. मीडिया के सामने सिर्फ मायावती आती हैं और लिखा हुआ पढ़कर चली जाती हैं. कोई सवाल जवाब नहीं होता. कभी नहीं होता. कभी कोई इंटरव्यू भी नहीं होता. उनके अलावा सतीश चंद्र मिश्रा कभी कभार वह भी ज्यादातर कानूनी मसलों पर पार्टी और मायावती का पक्ष रखते हैं. उन दोनों के अलावा सिर्फ स्वामी को ही विरोधियों पर हमला करने और हाथी का बचाव करने का हुकुम ऊपर से हासिल था.
मगर ये मायावती की रणनीति में टैक्टिकल शिफ्ट का संकेत भी हो सकता है. हाल तक कहा जा रहा था कि मायावती सवर्ण भरोसे सत्ता में लौटने की प्लानिंग नहीं कर रहीं. बल्कि इस बार दलित- मुसलमान और पिछड़ा का कॉकटेल बनाया जा रहा है. इसी के तहत अवध के पासी वोटरों पर पकड़ रखने वाले आरके चौधरी 16 साल बाद पार्टी में लौटे. इसी रणनीति के तहत स्वामी प्रसाद मौर्य बीएसपी में आगे बढ़े. मगर अब उनकी रुखसती बताती है कि रणनीति बदल चुकी है. क्या यह बीएसपी के 'सोशल इंजीनियरिंग' का साइड इफेक्ट है?

लेकिन अब मौर्य जाएंगे कहां?

पहला कयास तो यही है कि वह सपा में जाएंगे. मायावती ने भी कहा कि वह पहले मुलायम से ही जुड़े हुए थे और कई पार्टियों से होकर बीएसपी में आए थे. मायावती ने कहा कि हो सकता है कि सपा उन्हें और उनके बेटे-बेटी को टिकट दे दे, लेकिन वह चुनाव से पहले उनका इस्तेमाल ही करेगी.
एकाध मीडिया हाउस तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि मौर्य ने आजम खान और शिवपाल से मुलाकात की है और 27 जून को होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में वह सपा सरकार में मंत्री भी बनाए जा सकते हैं.
वैसे हाल के दौर में बीजेपी ने जैसे दलित-पिछड़े लीडरों को लपका है, उनके बीजेपी में जाने की संभावना भी जताई जा रही थी. लेकिन बीजेपी एक मौर्य को पहले ही प्रदेश अध्यक्ष बना चुकी है. तो उसे अब ज्यादा गरज नहीं है. फिर मौर्य नरेंद्र मोदी के बारे में बहुत तीखी भाषा में बोलते रहे हैं. दिल्ली की कुर्सी के लिए बीजेपी ने जगदंबिका पाल और उदित राज को पचा लिया, पर PM पर तीखे कमेंट कर चुके हर नेता से बीजेपी बचना चाहेगी. इसलिए थ्योरी अभी यही मजबूत है कि मौर्य सपा के सिस्टम में प्लेसमेंट पा सकते हैं. वहां उनका बेटे और बेटी को टिकट दिलाने वाला परिवारवाद भी फल-फूल सकता है.
वैसे मौर्य अखिलेश के निकनेम 'टीपू' पर भी चुटकी ले चुके हैं. इसी साल फरवरी में कहा था कि टीपू सुल्तान तो बन गए लेकिन तलवार रामपुर वालों (आजम खां) के हाथ में चली गई.
Swami Prasad maurya5

कहा यह भी जा रहा है कि बीएसपी के नए फीडबैक सिस्टम के तहत जोनल कॉर्डिनेटर स्वामी प्रसाद मौर्य की शैली को लेकर लगातार बहिन जी को खबर दे रहे थे. अब कांग्रेस ही बचती है, लेकिन वहां मौर्य के जाने की संभावना नहीं है. गए तो वह एक बड़ा जुआ होगा क्योंकि चुनाव बाद कांग्रेस की स्थिति वैसे भी बहुत अच्छी नहीं लग रही.

इस्तीफा क्यों दिया होगा?

मौर्य की विधानसभा सीट बदली गई है. पिछले चुनाव में वह कुशीनगर की पडरौना सीट से जीते थे. इस बार उन्हें रायबरेली की ऊंचाहार सीट से लड़ने को कहा गया. ऊंचाहार से पिछले चुनाव में मौर्य के बेटे उत्कृष्ट चुनाव लड़े थे और सपा कैंडिडेट मनोज कुमार पांडेय से हार गए थे. ऐसा नहीं है कि सिर्फ मौर्य की सीट ही बदली गई है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर को भी ऐसा ही आदेश मिला. बताया जा रहा है कि उनके बेटे संजय राजभर आंबेडकर नगर की अकबरपुर सीट से टिकट मांग रहे थे. मगर मैडम ने कहा कि नहीं, खुद रामअचल वहां से चुनाव लड़ें.
स्वामी प्रसाद के परिवार की बात करें तो उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते बेटी संघमित्रा एटा की अलीगंज सीट से चुनाव लड़ी थीं. इसके बाद बुआ मायावती की गुड बुक में बने रहने के लिए मुलायम के खिलाफ मैनपुरी लोकसभा सीट से शहीद होने को भी तैयार हो गई थीं. इस दौरान उन्होंने एक रैली में ये भी कह दिया था कि चुनाव बाद मुलायम सिंह यादव को फिर से भैंस चराने लायक बना दूंगी. इसे लेकर बाप-बेटी पर मामला भी दर्ज हुआ था.

करियर-शरियर कैसा रहा

मौर्य चार बार से विधायक हैं. संगठन का काम देखते रहे हैं. मायावती सरकार में मंत्री भी रहे थे. सन 80 में राजनीति में आए. 1996 में जब बीएसपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, तब मौर्य पहली बार विधायक बने. एक साल बाद ही लाल बत्ती मिल गई. क्योंकि बीजेपी और बीएसपी की छह छह महीने मुख्यमंत्री वाली सरकार बन गई.
2001 में मायावती ने उन्हें विधानसभा में बीएसपी विधायक दल का नेता बनाया. 2003 में बीजेपी के सपोर्ट से मायावती फिर मुख्यमंत्री बनीं और मौर्य फिर मंत्री. और 2007 में जब मायावती अपने दम पर बहुजन के नारे पर सवार हो पूर्ण बहुमत से लौटीं तो मौर्य फिर मंत्री बने. मगर दो साल बाद ही उन्हें संगठन में काम करने को कह दिया गया. इस दौरान वह विधान परिषद के रास्ते सदन में पहुंचे.
पैदाइश प्रतापगढ़ की है. पढ़ाई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से की. वहीं एलएलबी की पढ़ाई की. फिर कांशीराम के मिशन के संपर्क में आए. और शुरुआती दौर में ही मायावती के विश्वासपात्र बन गए. पूर्वांचल में बीएसपी के प्रदर्शन का श्रेय बीते सालों में उन्हीं को दिया गया है.
स्वामी प्रसाद मौर्य 'बुद्धिज्म' को फॉलो करते हैं. वह अंबेडकरवाद और कांशीराम के सिद्धांतों को मानने वाले नेताओं मे रहे हैं.


यूपी में चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इसकी तस्दीक रोज ऐसी ही घटनाओं से होती रहेगी. मामला अब दिलचस्प हो रहा है. सपा में अलग बवाल चल रहा है. मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का सपा में विलय हो गया. इसके सूत्रधार थे प्रदेश कैबिनेट मंत्री बलराम यादव. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस बात से इतने नाराज हुए कि बलराम यादव को पार्टी से निकाल दिया. बलराम के दिल पर ऐसी चोट लगी कि मीडिया से बात करते हुए रो पड़े. बोले, 'मेरी जिंदगी में है समाजवादी पार्टी. नेताजी मेरे सिर्फ आदर्श नहीं, मेरे पिता हैं.'
लेकिन बुधवार सुबह-सुबह शिवपाल यादव अखिलेश से मिलने पहुंचे. सूत्रों के हवाले से खबर उठी कि मुख्तार अंसारी का विलय मुलायम की मर्जी से किया गया था. फिजां में उठा कि अब सपा में सब कुछ ठीक है. लेकिन अभी बहुत कुछ बनेगा-बिगड़ेगा. हर पार्टी में. क्योंकि चुनाव मार्च करते हुए उत्तर प्रदेश की तरफ आ रहे हैं. अभी बहुत उठापटक होनी बाकी है.  दिल थामकर बैठे रहिए. 'दी लल्लनटॉप' पढ़ते रहिए.


 

इधर भी नजर

'फुले, बाबा साहेब के ख्यालों को कांशीराम ने देश में फैलाया'

जीरो-हीरो-जीरो. क्या फिर हीरो बनेंगी मायावती

मुझे आर्यावर्त को चमारावर्त में बदलना है: कांशीराम

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement