वैज्ञानिकों के संगठन बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साइंटिस्ट्स ने 'डूम्सडे क्लॉक' को ‘85 सेकेंड टु मिडनाइट’ (आधी रात से 85 सेकेंड पहले) कर दिया है. मिडनाइट का प्रतीकात्मक मतलब है दुनिया की तबाही. पिछले साल यह मिडनाइट से 89 सेकेंड पहले था यानी अब 4 सेकेंड और करीब आ गया. इससे संकेत मिलता है कि दुनिया विनाश के करीब जा रही है.
कयामत अब सिर्फ '85 सेकंड' दूर! Doomsday Clock ने फिर दहलाया
शिकागो की नॉन-प्रॉफिट संस्था बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंडिस्ट्स ने साल 1947 में कोल्ड वॉर के दौरान यह क्लॉक बनाई थी. ताकि लोगों को दुनिया पर आने वाले खतरे के बारे में जागरूक किया जा सके. संस्था के संस्थापकों में अल्बर्ट आइंस्टीन और जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर जैसे वैज्ञानिक शामिल थे, जो वर्ल्ड वॉर के दौरान न्यूक्लियर बम बनाने में जुटे थे.


'डूम्सडे क्लॉक' एक प्रतीकात्मक घड़ी है जो न्यूक्लियर वॉर, जलवायु परिवर्तन, AI और दूसरे वैश्विक खतरों को मापता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि रूस, चीन और अमेरिका की आक्रमक नीतियां, यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के युद्ध, न्यूक्लियर वेपन पर कमजोर नियंत्रण और AI के गलत इस्तेमाल के चलते दुनिया पर खतरा बढ़ गया है.
डूम्सडे क्लॉक में आधी रात (Midnight) वैश्विक तबाही का प्रतीक है. उसके पहले के सेकेंड या मिनट ये बताते हैं कि इंसान उस तबाही से कितना दूर या कितना करीब है. यह घड़ी यह नहीं बताती कि विनाश कब होगा, बल्कि यह दिखाती है कि इंसानी फैसले उसे किस दिशा में ले जा रहे हैं.
डूम्सडे क्लॉक को कब और क्यों बनाया गया?
शिकागो की नॉन-प्रॉफिट संस्था बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंडिस्ट्स ने साल 1947 में कोल्ड वॉर के दौरान यह क्लॉक बनाई थी. ताकि लोगों को दुनिया पर आने वाले खतरे के बारे में जागरूक किया जा सके. संस्था के संस्थापकों में अल्बर्ट आइंस्टीन (ऐल्बर्ट आइंस्टाइन) और जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर जैसे वैज्ञानिक शामिल थे, जो वर्ल्ड वॉर के न्यूक्लियर बम बनाने में जुटे थे.
डूम्सडे क्लॉक को हर साल अपडेट किया जाता है. मिडनाइट का मतलब है पूरी तबाही. जितना करीब, उतना ज्यादा खतरा. साल 1947 में यह 7 मिनट पहले था. फिर साल 1991 में कोल्ड वॉर खत्म होने पर सबसे दूर 17 मिनट और अब 85 सेकेंड सबसे करीब.
डूम्सडे क्लॉक कौन तय करता है?
इस घड़ी की स्थिति को संस्था बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंडिस्ट्स (BAS) का विज्ञान और सुरक्षा बोर्ड तय करता है. इसमें नोबेल पुरस्कार विजेता, परमाणु वैज्ञानिक, जलवायु विशेषज्ञ, साइबर और AI एक्सपर्ट्स शामिल होते हैं. यह बोर्ड दुनिया भर में हो रही घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है.
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