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पीरियड्स में बिना पैसे काटे छुट्टी देने की याचिका डाली थी, सुप्रीम कोर्ट ने सुनने से मना कर दिया

याचिका में कहा गया कि ये महिलाओं के लिए जरूरी है.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मुद्दा सरकार की पॉलिसी के दायरे में आता है. (सांकेतिक फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी को महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पेड लीव (Paid Periods Leave) देने वाली याचिका पर विचार करने से मना कर दिया है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डी. वाई. चंद्रचूड़ (CJI DY Chandrachud) का मानना है कि ऐसा करने पर महिलाओं को नौकरी मिलने में समस्या आएगी. वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने जनवरी के शुरुआत में इस संबंध में एक PIL दाखिल की थी.

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिया कि ये मुद्दा सरकार की पॉलिसी के दायरे में आता है. CJI डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि इस मुद्दे पर फैसला लेने के लिए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को इसका प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है.

याचिका पर जाने से पहले आपको पेड लीव के बारे में समझ देते हैं. किसी संस्था या कार्यालय में काम कर रहे लोग जब छुट्टी लेते हैं, तो आम तौर पर छुट्टी के दिन का मेहनताना उनकी सैलरी से काट लिया जाता है. यानी महीने के अंत में जब उन्हें वेतन मिलता है, तो छुट्टी वाले दिन का हिस्सा उसमें नहीं होता है. लेकिन पेड लीव में ऐसा नहीं है. अगर किसी की छुट्टी पेड लीव के तहत आती है, तो उसका पैसा उसके वेतन से नहीं काटा जाता है.

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याचिका में क्या था?

वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने 11 जनवरी, 2023 को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. इस याचिका में कहा गया था कि महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान तो पेड लीव दिए जाने का कानून है, लेकिन पीरियड्स के दौरान महिलाओं को छुट्टी दिए जाने का कोई नियम नहीं है. याचिका में ये कहा गया है कि पेड पीरियड लीव कोई लग्जरी लीव नहीं है बल्कि महिलाओं के लिए ये प्राकृतिक जरूरत है. उन्हें ये मिलनी चाहिए.  

इस याचिका में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 14 का पालन करने के लिए केंद्र समेत देश के सभी राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई थी. साथ ही याचिका में ये बताया गया कि यूनाइटेड किंगडम, चीन, वेल्स, जापान, ताइवान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, स्पेन और जाम्बिया जैसे देशों में पीरियड लीव दी जा रही है. 

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