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विदेशियों को धूल चटा अखंड भारत का सपना साकार करता है ये पंजाबी गाना

14 दिसंबर 2018 को इस महान गाने को आए हुए एक साल हो गए हैं.

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Image: Youtube
गुरु रंधावा मेहनती आदमी है. लोग कैंची से बाल कटाते हैं, गुरु रंधावा ने बाल सूती से छिलाए हैं. तभी इतने सधे रहते हैं. सूती, कपड़ा नहीं होता. सूती, सीप को कहते हैं. उसको चिकने पत्थर पर पानी मिलाकर घिस दो तो तो बीच में छेद हो जाता है, उससे आम छीलकर छुन्ना बनाया जा सकता है. बात ये थी कि गुरु रंधावा मेहनती आदमी है. उसकी मेहनत को थोड़ा पानी डालकर डाइल्यूट कर दो तो एक हिंदी फिल्म का तीन महीने एफएम में बजने वाला गाना बन जाता है.
सूती से छीले बाल
सूती से छीले बाल

तो बात करते हैं उनके गाने लाहौर की. जो 14 दिसंबर 2017 को दुनिया के सामने पहली बार आया. इस गाने के शुरुआती 30 सेकेण्ड से हमें सीख मिलती है. सीख ये कि घरवालों को कभी व्हाट्सऐप पर मत आने दीजिए. मम्मी वहां भी शादी के लिए लड़की की फोटो भेजने लग जाएंगी. ऐसी ही किसी मम्मी को लड़की की तस्वीर भेज, मैच मेकिंग के प्रयास कराते देख टिंडर का विचार जन्मा रहा होगा.
अब आता है फन फैक्ट, गुरू रंधावा का आई फोन, भाई फोन है. दुनिया जिस तरफ से मैसेज भेजती है. भाई के भाई-फोन में उस तरफ मैसेज आते हैं. संदर्भ- मम्मी ने लड़की का फोटो भेजा  है. लेकिन आया वो उस तरह है, जिधर से मैसेज जाते हैं. आम लोगों के साथ क्या होता है. वो यहां देखें.
देखिये गुरु रंधावा की मम्मी मैसेज भेजती हैं, तो वो किधर जाता है. और मैं टीम मोती वाले विभव को मैसेज भेजता हूं तो कहां जाता है.
देखिये गुरु रंधावा की मम्मी मैसेज भेजती हैं, तो वो किधर जाता है. और मैं टीम मोती वाले विभव को मैसेज भेजता हूं तो कहां जाता है.

आगे बढ़ें तो ये गीत भारत-पाकिस्तान के बीच उस खाई को पाटता नज़र आता है, जिसे शाम चार बजे के बाद न्यूज चैनल्स के कुकुरहांव करते 'डिबेट शोओं' में बैठे पार्टी प्रवक्ता रोज़ खोद-खोदकर गहरा करते हैं. गुरु कहते हैं, "ओ लगदी लाहौर दी आ, जिस हिसाब ना' हंसदी आ"
नेटवर्क प्रॉब्लम
नेटवर्क प्रॉब्लम

अर्थात कन्या जिस प्रकार हंस रही है, वो लाहौर शहर की लगती है. अर्थात साल 2017-18 के वित्तवर्ष में दुबई की सड़कों पर ( रैंडम फैक्ट अलर्ट - शूट स्थल दुबई है!) गाड़ी हौंकता युवक लाहौर को अपना मानता है. वो पहचानता है कि लाहौर की युवतियां किस प्रकार हंसती हैं.
मतलब उसका पाकिस्तान आना-जाना है. या तो उसका वीजा-पासपोर्ट बन गया है. या वो एजेंट विनोद है या सैफ अली खान है, वेद प्रताप वैदिक या अजीत दोवल (डोभाल, डोबाल, डोवाल या डोवल! हा कन्फ्यूजन!) का इन्टर्न है. इस बहस को छोड़ें मतलब ये निकलता है कि लाहौर जब मुस्कुराता है तो भारतीय युवक दुबई में प्रसन्न होते हैं. एक्जैक्टली यही तो अखंड भारत का सपना है. जहां दुबई से लेकर लाहौर-दिल्ली- बंबई सब एक हो चुके हैं. क्वांटम फिजिक्स जानने वाले इसकी अल्टरनेट रीडिंग भी देते हैं. वो बताते हैं, इस दुनिया के पैरलल एक और दुनिया है, जहां भारत अब भी अखंड भारत है, पद्मावत पद्मावती है और लाहौर से लेकर पंजाब सब एक है. और वहां आधार कार्ड को हर चीज से लिंक कराना भी अनिवार्य नहीं है. ये गाना उसी समानांतर दुनिया से आया है.
दर्शन
दर्शन

अगली पंक्ति आती है, "ओ लगदी पंजाब दी, आ जिस हिसाब ना' तकदी आ" मतलब गुरू रंधावा को सामुद्रिकी का ज्ञान भी है. वो देखने के अंदाज से बता सकते हैं, सामने वाला कहां का है. साहित्य में रूचि रखने वाले जानते हैं आख़िरी बार ऐसा टैलेंट सिर्फ घुंडीराज में पाया गया था. जमीनी हकीकत पर लौटें. क्योंकि गुरू रंधावा अब पॉलिटिकल मुद्दों पर बोलने जा रहे हैं. ये अपील करने के बाद कि कुड़ी का पता करो, किस गांव-शहर से आ रही है वो कहते हैं, "दिल्ली दा नखरा आ" अर्थात युवती के नखरे उसके दिल्ली का होने की चुगली करते हैं. इस लाइन का कोई मतलब नहीं निकलता, सीधे-सीधे ये अरविंद केजरीवाल के सरकार चलाने के तरीके पर उठाया गया सवाल है.
नाराज आदमी पार्टी के संयोजक
नाराज आदमी पार्टी के संयोजक

पर ऐसा भी नहीं कि युवक चीजें यूं ही कह देता है. अगली ही पंक्ति में वो बंबई की गर्मी का जिक्र भी करता है. जनगीत ऐसे ही बनते हैं. प्रेम, पड़ोसी और कार में बेकार फुंकते पेट्रोल के बीच भी गायक-गीतकार को ग्लोबल वार्मिंग की चिंता है. ये चिंता बंबई वालों को भी समझ आनी चाहिए. मुंबई को बॉम्बे कहें, मुंबई या बंबई इस सबसे ज्यादा जरूरी ये है कि मुंबई की गर्मी उसकी पहचान न बनने पाए. यहां भी अल्टरनेट रीडिंग सामने आती है, जानकार बताते हैं, यहां गुरू उस दिमागी गर्मी की बात कर रहे हैं. जिस गर्मी के कारण 200 साल पुरानी लड़ाई के चक्कर में शहर जल जाता है.
साइड मांगने पर लुक देते गुरू
साइड मांगने पर लुक देते गुरू

अब इस गीत के सबसे चौंकाने वाले हिस्से की बारी है. जहां गुरू कहते हैं कि "लंदन तों आई लगदी आ, जिस हिसाब ना' चलदी आ" गुरू चलने के अंदाज़ से बता सकते हैं कि युवती अंग्रेजों की धरती से आई है. वही अंग्रेज जिन्होंने सैकड़ों सालों तक हमें गुलाम बनाए रखा. अब जब गीतकार ने लिखा कि "कुड़ी दा पता करो, केहड़े पिंड दी आ, केहड़े शहर दी आ" तो इस लिखने में चिंता है. आईबी को अलर्ट हो जाना चाहिए. कुड़ी ईस्ट इंडिया कंपनी न साबित हो जाए. गुरू को यहां सिक्योरिटी ब्रीच का खतरा नज़र आता है. इसी भय में वो आगे कुछ का कुछ कहते जाते हैं. उन्होंने कहा, "चैन मेरा ले गई आ" यहां आरोप लगाते हुए युवक ने युवती को चेन स्नैचर बता डाला. इसके बाद कही गई पंक्ति "दिल विच बह गई आ" में वो उसे कोलेस्ट्रोल बता रहा है. अगली दो पंक्तियां हैं कि "बोलने के हिसाब से तो वो चुप थी, लेकिन सब बता गई" और "आंखों से गोली मारती है." यहां तक आते-आते गीत रास्ता भटक जाता है, उसका गोविंदरवीनाकरण हो जाता है और वो अपने व्यापक अर्थ खो देता है, सिवाय प्रलाप और ऑटोट्यून के इसके आगे कुछ नहीं बचता.
रॉन्ग टर्न
रॉन्ग टर्न

लेकिन गीत के इस तरह खत्म होने पर बुरा महसूस मत कीजिए. वीडियो देखिए. 3 मिनट 54 सेकेंड के वीडियो में युवक 37 सेकेंड पर युवती की फोटो पाता है, लेकिन उसे डाउनलोड 3 मिनट 37 सेकेंड पर कर पाता है. (इस बीच वो कार से दो युवतियों को ठोंकने से बचाता है, रोड रेज टालता है, एक बार रेगिस्तान में नाच आता है, एक सड़क किनारे के कैफे में ऑर्डर देता है, वापस रेगिस्तान जाता है, गोल्डन कपडे में नाचता है, मतिभ्रम की स्थिति में रहता है, बेजा गाड़ी चलाता है, और अंत में उसी युवती से मिल भी जाता है!) पूरा गाना बीत गया और एक फोटो डाउनलोड न हुई, सोचिए कि भारत में डिजिटलीकरण कितना सफल है और विदेश में किस कदर फेल है. ये गीत बताता है कि गाना-वाना अपनी जगह है, अपने 'पियो' का नेटवर्क ही सही है.



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