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यूरोप में लड़कियों की शादी नहीं हो रही क्योंकि वो गोरी हैं

ऐड छपते. सुंदर सुशील काली कन्या के लिए वर चाहिए.

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फोटो - thelallantop
अकबर अपने दरबार में बैठा मन की बात सोच रहा था. सब तरफ शांति थी. हचक के पइसा आ रहा था टैक्स में. उसने सोचा. जमीन सब जीत ली. अब पानी पर राज किया जाना चाहिए. जैसे छह सौ साल पहले दक्षिण के चोल राजा करते थे. तब उनके अंडर में मलेशिया और इंडोनेशिया तक के शहर हुआ करते थे. अकबर ने सब रिसोर्स रिलीज कर दिए. बड़े-बड़े मजबूत पानी के जहाज बनने लगे. नेवी बनाई गई. कमांडो ट्रेनिंग शुरू हुई. नक्शेबाजों को बुलाया गया. बनते-बनते कंपास भी बन गया. पानी वाला पहला लश्कर रवाना किया गया गुजरात की तरफ से. वो घूमते-घूमते पहुंच गया केप ऑफ गुड होप यानी कि अफ्रीका. वहां डेरा जमाया. कारोबार किया. फिर कब्जा कर लिया. महसूल मने कि टैक्स वसूलने लगे. फिर अकबर के ग्रेट ग्रैंडसन औरंगजेब का आते-आते यूरोप के मुल्क इंग्लैंड, फ्रांस वगैरह भी इंडियन नेवी के कब्जे में आ गए. लंदन, पैरिस, वेनिस, सब जगह मुगल राजाओं के सिक्के चलते. सड़क पर कोई काला आदमी चलता दिखता तो गोरे मारे डर के रस्ते से हट जाते. किनारे होते और कोर्निश (झुककर आदाब) करते. और वहां की औरतें. रात-दिन कोयला मलतीं. धूप में लेटतीं. तमाम लेप लगातीं. बस एक ही मन्नत मानतीं. हे भगवान, हम भी राजा लोगों की तरह सांवले हो जाएं. ये गोरे रंग की गुलामी से मुक्त हो जाएं. सांवले होंगे तो हम भी राजाओं से दिखेंगे. 20वीं सदी आते-आते युद्ध हुए. यूरोप से भारत का कब्जा हटा. मगर सैकड़ों साल की दासता. जाते-जाते भी न जाती. तो वहां की औरतें आज भी रात-दिन कालेपन की क्रीम मलती हैं. डार्क एंड लवली बिना प्रचार के झोंक कर बिकती है. अगर कोई औरत इतने सब के बाद भी गोरी रह जाए तो वर मिलने में दिक्कत होती है. अखबारों में मेट्रीमोनियल के ऐड छपते. सुंदर सुशील काली कन्या के लिए वर चाहिए. एक दिन वहां के प्रगतिशील तबके ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. बोले, त्वचा के रंग का स्टेटस से क्या लेना देना. खाल तो आस-पास की जलवायु और पूर्वजों से तय होती है. खाल सफेद हो या काली, ये अहम नहीं. आपके रंग नहीं, ढंग अहम हैं. बड़ी बहस चलती रही. नतीजा अब तक नहीं निकला.
और उधर इंडिया में लोग हंसते. कि ये कैसे सिर्री हैं. काले होने के लिए मरे जा रहे हैं. काले होने में क्या बड़ी बात है. अब धीमे-धीमे आंखें खोलिए. ये सपना पूरा हो गया. सामने क्या दिख रहा है. साल 2016 का हिंदुस्तान. जो अब तक सो रहा है. जिसे अब तक अंग्रेजों की गुलामी की आदत नहीं गई. इसीलिए उसे अंग्रेजों की तरह गोरा होना है. उसके लिए क्रीम मलनी है. गोरी चिट्टी कलाइयां बनानी हैं. हरी-हरी चूड़ियां पहननी हैं. और हरी चूड़ियां पहनकर शादी करनी है एक चमकते हुए दूल्हे से.
और मलने के लिए क्रीम देंगी आपको कॉस्मेटिक की कंपनियां. जो अपने विज्ञापन में आपको बताएंगी कि काली लड़कियों को न दूल्हा मिलता है, न नौकरी. लड़के उन्हें पसंद नहीं करते. नौकरी के इंटरव्यू में वो सेलेक्ट नहीं होतीं. और इधर हमारी लड़कियां क्रीम मल-मल थकती जाती हैं. पार्टी में जाने के पहले फाउंडेशन का लेप लगाती हैं.
ऐसे ही विज्ञापनों के खिलाफ कई महिला सांसदों ने फाइनली आवाज उठाई है.
कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने राज्य सभा में कहा है कि सफलता के लिए इंसान का रंग नहीं बल्कि उसके दिमाग की जरूरत होती है. उदाहरण दिया बराक और मिशेल ओबामा का. जिन्हें दुनिया उनके नाम नहीं, काम से जानती है. ये भी कहा कि ऐसी क्रीम्स महिलाओं में इन्फीरिऑरिटी कॉम्प्लेक्स पैदा करती हैं. चलो देर से ही सही, कमसकम संसद में जेंडर और रंग को लेकर इस तरह पॉपुलर मीडिया में चल रहे भेदभाव पर जिक्र तो हुआ.

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