. 6 मार्च को रेलवे बोर्ड ने इस मामले में सफाई दी
और पूरे गुणाभाग को समझाया.

रेलवे बोर्ड ने RRB Group D result मामले पर सफाई दी (सोर्स - PIB)
नॉर्मलाइज़ेशन से नंबर बढ़ना आम बात है 100 में से 111 नंबर सुनने में तो अनोखा लगता है पर ये बहुत नॉर्मल है. परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों के बीच यह कॉमन नॉलेज है कि नॉर्मलाइज़ेशन की वजह से नंबर 100 से ज्यादा भी हो सकते हैं. लेकिन इस बार सवाल ये नहीं था कि 100 से ज्यादा नंबर आए. सवाल इस बात पर उठ रहा था कि नॉर्मलाइज़ेशन के नाम पर 134 यो 148 नंबर आए थे. इतने ज्यादा नंबर बढ़ना परीक्षा पर सवाल खड़े कर रहा था. दी लल्लनटॉप ने इसकी पड़ताल की थी. उम्मीदवारों की मदद से कुछ स्क्रीनशॉट्स की जांच की गई थी, जिसमें नंबर 100 से ज्यादा पाए गए. जांच में अधिकतम अंक 111 तक पाए गए थे. 134, 148 या 999 अंक वाले स्क्रीनशॉट्स की पुष्टि नहीं हो पाई थी. सूचना के अभाव में इन नंबरों को न तो सही साबित किया जा सकता था और न ही गलत. इसलिए परीक्षा पर सवाल उठ रहे थे.
बोर्ड ने इन सवालों के जवाब दिए 6 मार्च को बोर्ड ने नॉर्मलाइज़ेशन का पूरा प्रोसेस भी समझाया और सारी उलझनों को दूर भी किया. सवाल 1. नॉर्मलाइज़ेशन क्यों जरूरी है? मान लीजिए किसी छात्र ने एक कठिन पेपर हल किया और उसके 100 में से 90 नंबर आ गए. वहीं दूसरे किसी छात्र ने सरल पेपर को हल किया और उसे भी मिले 90 नंबर. तो जब नॉर्मलाइजेशन का नियम लगेगा तो कठिन पेपर वाले को हो सकता है कि 100 से ज्यादा नंबर मान लिए जाएं. और यही फॉर्मूला सरल वाले पर लागू करेंगे तो उसके नंबर 90 से कम भी हो सकते हैं.
सवाल 2. 100 से (अधिकतम अंकों से) ज्यादा नंबर आते कैसे हैं? बोर्ड ने बताया कि नॉर्मलाइज़ेशन के बाद 100 से ज्यादा नंबर आना आम बात है. सफाई में नॉर्मलाइज़ेशन का पूरा फॉर्मूला दिया है.

बोर्ड ने नॉर्मलाइज़ेशन का फॉर्मूला बताया (सोर्स -PIB)
अब इस गणित के फॉर्मूले को हिंदी में समझते हैं. 100 अंकों का पेपर होता है. अब मान लीजिए कि उम्मीदवार ने इसमें से 80 अंक हासिल किए. तो ये 80 हुआ रॉ स्कोर. अब जिस शिफ्ट में उम्मीदवार ने परीक्षा दी है, वो कितनी आसान है, इसके लिए दो चीजें देखी जाती हैं. पहली चीज है, उस शिफ्ट का हाइयेस्ट स्कोर. मतलब उस शिफ्ट के टॉपर के नंबर. और दूसरी है शिफ्ट में बैठे उम्मीदवारों के एवरेज नंबर. इन दोनों आंकड़ों से पेपर की कठिनाई का पता चलेगा. अब पेपर की कठिनाई के साथ-साथ उम्मीदवार के रॉ-स्कोर को देखा जाता है. बस यही बताता है ये फॉर्मूला, जिससे नॉर्मलाइज़्ड स्कोर निकल के आता है. जिन नंबरों के स्क्रीनशॉट्स वायरल हो रहे हैं, उनमें नॉर्मलाइज़्ड स्कोर है. मतलब गुणाभाग के बाद निकल के आने वाला स्कोर.
सवाल 3. तो रॉ-स्कोर कैसे पता चलेगा? रिज़ल्ट आने के पहले 14 से 20 जनवरी तक उम्मीदवारों को उनके द्वारा हल किए गए पेपर के साथ सही उत्तर ऑनलाइन दिखाए गए थे. इससे ही रॉ-स्कोर निकाला जा सकता है. 'ऑब्जेक्शन ट्रैकर' मतलब आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था दी गई थी. 1 लाख 58 हजार आपत्तियां भी आई थीं, जिन्हें देखा और हल किया गया था.

उम्मीदवारों को आपत्तियां दर्ज कराने का समय भी दिया गया था (सोर्स -PIB)
सवाल 4. क्या ये नॉर्मलाइज़ेशन की तिकड़म नई है? नहीं. बोर्ड ने साफ किया है कि फॉर्मूले को छेड़ा नहीं गया है. बोर्ड इस फॉर्मूले को 19 साल से इस्तेमाल कर रहा है. सन् 2000 से.

बोर्ड 19 साल से यही फॉर्मूला अपना रहा है (सोर्स - PIB)
सवाल 5. नॉर्मलाइज़ेशन से 148 या 999 नंबर कैसे आ सकते हैं? यह सबसे बड़ा सवाल था, क्योंकि हर एक स्क्रीनशॉट की पुष्टि करना संभव नहीं है. इसका जवाब बोर्ड ही दे सकता है. और जवाब के बाद सब क्लियर भी हो गया. बोर्ड ने साफ बताया कि नॉर्मलाइज़ेशन के बाद भी अधिकतम अंक 126.13 हैं.

बोर्ड ने नॉर्मलाइज़ेशन के बाद के अधिकतम नंबर बताए (सोर्स -PIB)
यानी 101, 109 या 111 नंबरों वाले स्क्रीनशॉट्स तो सही थे, पर 126 नंबरों से ज्यादा के जो स्क्रीनशॉट्स फैलाए जा रहे हैं, वो फर्ज़ी हैं.
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