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'छात्र आत्महत्या के लिए पेरेंट्स जिम्मेदार', सुप्रीम कोर्ट की बात माता-पिता को पढ़नी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने कोचिंग संस्थानों के नियमन की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए ये बातें कही हैं.

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सुप्रीम कोर्ट ने स्टूडेंट सुसाइडल केसों के लिए पेरेंट्स को जिम्मेदार बताया है. (प्रतीकात्मक फोटो- इंडिया टुडे)
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नलिनी शर्मा

सुप्रीम कोर्ट ने कोटा समेत देशभर में छात्र आत्महत्या की घटनाओं के लिए माता-पिता को भी जिम्मेदार बताया है. उसने कहा कि छात्रों के बीच जबरदस्त कम्पटीशन और पेरेंट्स के बनाए दबाव के कारण भी छात्र आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं.

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‘छात्रों की आत्महत्या के लिए पेरेंट्स भी जिम्मेदार’
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में तेजी से बन रहे कोचिंग संस्थानों के नियमन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी. 21 नवंबर को इसकी सुनवाई के दौरान छात्र आत्महत्या के आंकड़े जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एसवीएन भट्टी के बेंच के सामने रखे गए. याचिकाकर्ता अनिरुद्ध नारायण मालपानी की तरफ से वकील मोहिनी प्रिया ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े रखे. उन्होंने बताया कि देश के 8.2 प्रतिशत छात्र आत्महत्या करने की वजह से मरते हैं.

लेकिन इस पर लाचारी दिखाते हुए बेंच ने कहा कि वो मौजूदा स्थिति में बदलाव के लिए दिशा-निर्देश नहीं दे सकती. हालांकि कोर्ट ने इस स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की. उसने कहा,

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"ये सब करना आसान नहीं है. इन घटनाओं के पीछे माता-पिता का बनाया दबाव (भी) जिम्मेदार है. छात्रों से ज्यादा, उनके पेरेंट्स उन पर दबाव बना रहे हैं. ऐसी स्थिति में भला कोर्ट कैसे निर्देश दे सकता है."

कोर्ट ने ये भी कहा,

“हममें से अधिकतर लोग इस तरह के कोचिंग संस्थान नहीं चाहते. लेकिन स्कूलों की हालत तो देखें. कम्पटीशन बहुत ज्यादा है और छात्रों के पास इन कोचिंग इंस्टीट्यूट्स में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.”

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक याचिका में कहा गया था कि 14 साल के बच्चे घर से दूर कोचिंग इंस्टीट्यूट्स में दाखिला ले रहे हैं. वहां मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन के लिए कड़ी तैयारियां कराई जाती हैं. जबकि बच्चे मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं होते हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 

“समस्या कोचिंग संस्थानों में नहीं, बच्चों के पेरेंट्स में है. ये खुदकुशी के मामले कोचिंग संस्थानों की वजह से नहीं हो रहे. पेरेंट्स की उम्मीदों को पूरा न कर पाने की वजह से बच्चे ऐसा कदम उठा रहे हैं. एग्जाम्स में बढ़ते कम्पटीशन के चलते बच्चों पर पेरेंट्स की उम्मीदों का बोझ है. बच्चे आधा या एक नंबर से चूक जाते हैं और यही प्रेशर वो हैंडल नहीं कर पाते."

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस मामले को सरकार के सामने रखने को कहा है. वहीं याचिकाकर्ता ने अपनी PIL वापस लेते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को सरकार के समक्ष रखने की अपील की.

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