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'संस्कारी' और 'धार्मिक' जन अलीगढ़ का नया डायलाग प्रोमो न देखें!

फिल्म है अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर पर जिन्हें गे होने की वजह से यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया. प्रोमो में डायलाग नहीं तमाचा है.

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फोटो - thelallantop
आप भी वहीँ हैं जहाँ हम हैं. यानी की इंडिया. ख़बरों में क्रांति और आन्दोलन और ब्लाह-ब्लाह-ब्लाह देखने और सुनने को मिल रहा है. कोई नारेबाजी से offend हो उठता है तो कोई किसी के सेक्शुअल ओरिएंटेशन से. संस्कार और नैतिकता जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करके एक दूसरे को धोबी पछाड़ देने की रेस चल रही है. ऐसा मालूम देता है कि हंसल मेहता ने अपनी बात रखी है. प्रोमो रिलीज़ हुआ है उनकी फ़िल्म अलीगढ़ का. फिल्म में मनोज बाजपई, राजकुमार राव और आशीष विद्यार्थी हैं. प्रोमो कोई लम्बा चौड़ा नहीं है, सिर्फ़ 2-3 डायलॉग्स हैं. जो बहुत कुछ कह जाते हैं. फ़िल्म के हिसाब से भी और आज के माहौल के हिसाब से भी. वैसे भी फ़िल्म अलीगढ़ कोई कोरी कल्पना नहीं है. है तो ये भी सच्ची घटना पर ही आधारित और वो भी हाल ही में हुई थी. इस लिहाज़ से चीज़ें काफी कुछ वैसी ही दिखेंगी जैसी हम आज अपने आस पास देखते हैं.   एक प्रोफ़ेसर को यूनिवर्सिटी से इसलिए निकाल दिया जाता है क्यूंकि वो होमोसेक्शुअल हैं. अब होमोसेक्शुअल होने में उनका दोष क्या है, इसका कोई जवाब नहीं है. लेकिन सवाल खड़ा होता है नैतिकता का. नैतिकता यानी कि वो चश्मा जिसे चढ़ा कर यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने इस पूरे मामले को देखा. इस चश्मे की ख़ास बात ये है कि इसका रंग आँखों के साथ-साथ बदलता है. वही चश्मा अगर किसी और की आँखों पर चढ़ाया जाए तो उसे कुछ और ही दिखता. बस इसी चश्मे की बात करते हुए दिखते हैं इस प्रोमो में आशीष विद्यार्थी. आशीष विद्यार्थी जो कि इस फिल्म में मनोज बाजपई के वकील के रोल में दिखेंगे. आशीष एक बहुत ही साफ़ और सीधी बात कहते हैं. कहते क्या वो तो सवाल पूछ रहे हैं. सवाल काफी सधा हुआ है - नैतिकता की सीमा आखिर क्या है? नया डायलाग प्रोमो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=5ZvGET8tl78

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