अतुल कुमार गे राइट्स ऐक्टिविस्ट हैं. LBGT और क्वियर लोगों के अधिकारों के लिए लड़ते हैं. ऐसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए काम करते हैं. गीत लिखना और गाना पसंद करते हैं. बीते दिनों इन्होंने अपने क्वियर दोस्तों के लिए 'रेनबो' कपड़ों की एक रेंज निकाली. जिसकी नुमाइश ताज महोत्सव में LGBT समुदाय के लोगों ने रैंप पर की. ये आर्टिकल उन्होंने हमें अंग्रेजी में लिख भेजा था. हम उसे ट्रांसलेट कर लगा रहे हैं. अतुल के बारे में और जानने के लिए आपन उनकी वेबसाइट wearpriderainbow.com देख सकते हैं. और हां, अगर आपके पास कायदे का कंटेंट हो तो हमें lallantopmail@gmail.com पर भेज सकते हैं. अच्छा लगा तो हम छापेंगे. माओं को एक प्यारा सा शौक होता है. अपने नन्हे लड़कों को रंग बिरंगी फ्रॉकें पहनना. बालों की चोटियां बांधना. फिर बच्चे बड़े होकर 'लड़के' बन जाते हैं. और कुछ सालों बाद 'मर्द'. मैं साल-दो साल का होऊंगा शायद तब. लोग मुझे फ्रॉक में देखकर मुझे लड़की समझ लेते. तब मां मुस्कुराते हुए चीख उठती, 'नहीं! ये लड़का है.' तब मैं लड़की और लड़के के बीच का फर्क नहीं समझता था. मेरी कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव नारेचा से शुरू होती है. 15 लोगों की जॉइंट फैमिली थी हमारी. मुझे नाचने गाने का खूब शौक था. जब घर में मस्ती का माहौल होता, घर की औरतें मेरे पांवों में पायल पहना देती. मैं नाचता. तब लोग मुझे देखकर खुश होते थे. पर जैसे जैसे बड़ा होने लगा, मेरा नाचने-गाने का शौक उन्हें बेचैन करने लगा. घर के बड़े मुझे नाचने से रोकने लगे.
मैं अपने भाई बहनों के साथ गुड़ियों से खेलता था. जब हम बड़े होने लगे, उनके खिलौने बदल गए. वो मुझसे कहते थे, "तुम अब तक गुड़ियों से खेलते हो!" ये वही उम्र थी जब मेरा कजिन मेरे पास आता था. उम्र में काफी बड़ा था मुझसे. मुझे अपना पीनिस पकड़ाने की कोशिश करता. मेरे अंडरवियर के अंदर भी हाथ डाल देता. ये उसके लिए एंटरटेनमेंट था. मुझे बुरा लगता था. पर पता ही नहीं था कि ये गलत है. कि इसकी शिकायत की जा सकती है. मुझे यकीन सा था. कि भाई ही सही होगा.
गांव में रामलीला होती थी. ग्राम प्रधान करवाते थे. उनसे पूछ कर एक बार उस कमरे में घुसा था मैं जिसमें रामलीला के सभी कैरेक्टर तैयार हुआ करते थे. उन्हें देखकर लगा मैं भी ऐसे ही तैयार होना चाहता हूं. अपनी गुड़ियों को भी ऐसे ही सजाना चाहता हूं.स्कूल का टॉपर था मैं. इसलिए टीचर्स मुझे पसंद करते थे. पर मैं एक शर्मीला लड़का था. दूसरे लड़कों की तरह 'मर्दाना' नहीं था. चाल ढाल लाउड नहीं थी. जब फिफ्थ क्लास में था, एक मेल टीचर पर मेरा क्रश था. मैं हमेशा उनके बारे में सोचता रहता. भगवान से प्रार्थना करता कि मुझे लड़की बना दें. फिर एक लड़की से उनकी शादी हो गई. मुझे बहुत खराब लगा. छोटा ही था. इतना उदास हो गया कि सुसाइड करने चला था. घर पर फांसी लगाने की कोशिश की. पर रस्सी बांधते ही डर के मारे हालत खराब हो गई. मां के बारे में सोचने लगा. सब छोड़-छाड़ कर बाहर भाग गया. और दिल लगाने के लिए दूसरे बच्चों के साथ खेलने लगा. पर टीचर की शादी हो जाने से मुझे बहुत बड़ा धक्का लगा था. उसके बाद कई लड़कों पर क्रश हुआ. पर मुझे सबक मिल चुका था. जब भी कोई लड़का अच्छा लगता, मैं उससे नफरत करने की कोशिश करता. उसमें खराब बातें तलाशता. जिससे उसे भूल पाऊं. क्योंकि मुमकिन नहीं था कि एक लड़के से जा कर कह सकूं कि तुम अच्छे लगते हो.
एक बार स्टोर रूम में एक किताब मिली जिसका नाम था 'आत्मा न तो नर है, न नारी'. इस नाम के बारे में घंटों सोचता रहा मैं. क्या यही चीज हम शरीर के बारे में नहीं कह सकते? फिर खुद को समझने का प्रोसेस शुरू हुआ. मैंने कहीं एक आर्टिकल पढ़ा. जिसमें लिखा था कि अमेरिका का एक आदमी सेक्स चेंज सर्जरी करा के औरत बन गया, मैंने सोचा, क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? मैं सपने देखने लगा. कि एक दिन सर्जरी करवा कर औरत बनूंगा. मुझे ऐश्वर्या राय बहुत पसंद थी. मैं सोचने लगा कि क्या औरत बनने के बाद मैं भी मिस वर्ल्ड बन पाऊंगा. लेकिन उसके पहले बहुत सारा पढ़ना चाहता था मैं. तो मैंने खुद को सबसे अलग कर लिया. दूसरे लड़कों से बातें करना बंद कर दिया. अपने क्रशेज के पीछे भागना बंद कर दिया. मैं खुद को प्रूव करना चाहता था पढ़ाई के दम पर. 11-12वीं क्लास तक ये साफ हो चुका था कि मैं दूसरे लड़कों सा नहीं हूं. मैं मर्दाना नहीं था. क्लास के लड़के कहते, "इसे तो पेटीकोट पहनना चाहिए." कोई कहता, "आजा मेरी जांघ पर बैठ जा, तुझे जन्नत दिखा दूं." मैंने कभी टीचर से शिकायत नहीं की. क्योंकि टीचर भी मेरे खिलाफ ही बोलते, ये बात मैं जानता था. टीचर के सामने अपना मजाक नहीं बनवाना चाहता था मैं.
एक दोस्त था. आलोक दीक्षित. वो अक्सर मुझे खुश रखने की कोशिश करता. हालांकि वो भी कभी समझ नहीं पाया कि मैं कैसा हूं. वो कहता, "चल तुझे किसी लड़की से मिलवा दूं. सारी मक्कारी निकल जाएगी तेरी." वो ऐसा मेरी बेइज्जती करने के लिए नहीं कहता. वो मेरा भला चाहता था. उसे लगता मेरी लाइफ में शायद एक लड़की की कमी है. कई साल बाद जब स्कूल और कॉलेज ख़त्म हो गया, तब उसे समझ आया कि मुझे किसी लड़की की जरूरत नहीं थी. मैं ऐसा ही था. ऐसा ही हूं.
स्कूल के बाद फिर से प्यार हुआ. वो तलाकशुदा था. मुझसे दस साल बड़ा. बहुत हिम्मत लगी, पर मैंने उससे कह दिया कि मैं उसे पसंद करता हूं. अंजाम ये हुआ कि उसने मेरे पापा को बता दिया. उस दिन पापा का गुस्सा कंट्रोल के बहार था. मुझे उनके शब्द याद हैं, "क्या चाहते हो? मुझे सड़क पर उतारना चाहते हो क्या? तुम्हें क्या लगता है, तुम एक लड़की हो? मैं सहम गया. बात को दफन करने के लिए कहा, 'पापा वो सब मजाक था.'ऐसा नहीं है कि मैंने 'नॉर्मल' लगने की कोशिश नहीं की. कॉलेज पहुंचा तो मर्दाना लगने की कोशिश करता. इसलिए कि लड़के मुझे अवॉइड न करें. पर मुझे कोई दोस्त नहीं मिला. मैं गाने सुनता. लिखता. रिकॉर्ड करता. फिर दो साल एक सीमेंट प्लांट में नौकरी की. पर जी नहीं लगा तो छोड़ दिया. तय किया, म्यूजिक बैंड बनाऊंगा. 'रेनबो' नाम का बैंड बनाया, LGBT दोस्तों के साथ मिल कर. लेकिन वो नाम से खुश नहीं थे. क्योंकि वो LGBT समुदाय के हैं, वो इस बात को मानना नहीं चाहते थे. मैंने बैंड छोड़ दिया. लेकिन गाने रिकॉर्ड करता रहा. https://www.youtube.com/watch?v=P9o_E81-Ws8 फिर 'स्टॉप ऐसिड अटैक' ग्रुप के लिए काम किया. आज आगरा में शीरोज़ हैंगआउट्स नाम के एक कैफे में काम कर रहा हूं. उन लड़कियों के साथ जो ऐसिड अटैक होने के बाद भी खुशी से जी रही हैं.
पिछले हफ्ते ताज महोत्सव में क्वियर मॉडल मेरे डिजाईन किए हुए कपड़े पहन कर रैंप पर उतरे. अच्छा लगा.
मेरे दो बॉयफ्रेंड रह चुके हैं. पर जब भी उनसे कमिटमेंट मांगा, उन्होंने मना कर दिया. शायद वो डरते हैं गे कहलाने से. इसलिए किसी से प्यार करता हूं तो कह नहीं पाता. लड़की होता तो कह सकता था. यहां तो गे ही खुद को गे मानने को तैयार नहीं है. इश्क करते हैं, पर घरों के अंदर. लड़कियों से शादी कर लेते हैं.मेरे पापा आज भी सोचते हैं कि मैं एक लड़की से शादी करूंगा.























