इलाहाबाद में बम गिरा, लखनऊ में गोला बसपा बिक गई तीन रुपिया टोला2012 यूपी चुनाव के बाद हमारे अवधी गांव के उद्दंड बालकों ने ये नारा कहीं से रट लिया था. अखिलेश यादव मुख्यमंत्री होने वाले थे. मायावती सत्ता से बाहर जा रही थीं. हम आम की बगिया में छुट्टियों की दोपहरें काट रहे थे. तब कहीं से भी ये नारा सुनाई पड़ जाता था. कोई अपनी भैंस हांकते हुए गोहराता, कोई पेड़ पर चढ़कर और कोई ताश के खेल में जरूरी चाल चलते हुए. वह गांव सवर्णों का था और वहां मायावती की हार इसलिए एक स्वाभाविक जश्न में बदल गई थी.
लेकिन 2017 चुनाव में तो बसपा जीत रही थी. एक मिनट! इसे शब्दश: मत लीजिए. पर पॉलिटिकल जानकारों की एक जमात होती है जो चुनावों से मीलों पहले भविष्यवाणी करके सुख महसूस करती है. उन्होंने कहा था, कहा है, कि 2017 यूपी चुनावों में बसपा का पलड़ा सबसे भारी है.
फिर एकाएक बसपा के दो बड़े नेता पार्टी छोड़ देते हैं. 22 जून को विधानसभा में नेता विपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य
और 30 जून को महासचिव आरके चौधरी. मौर्य पिछड़े तबके के बड़े नेता. चौधरी प्रदेश के पुराने बहुजनवादी दलित चेहरे. चौधरी भी मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हैं. कहते हैं कि मायावती ने पार्टी को खुद की रियल एस्टेट कंपनी बना डाला है और खुद उसकी मालकिन बनकर पैसा वसूल रही हैं.
चौधरी की भाषा बिल्कुल स्वामी प्रसाद मौर्य वाली. कि बसपा कांशीराम के दिखाए रास्ते से भटक गई है. पार्टी के अंदर जो माहौल है, उसमें फिट नहीं बैठ पा रहा था. मायावती कहती थीं कि ऐसे लोगों को लाओ जो टिकट के लिए पैसा दें, मैं ऐसे लोगो को माया से नहीं मिला पा रहा था, इसलिए पार्टी से इस्तीफा दे रहा हूं.

आरके चौधरी.
थोड़ा सा चौधरी के बारे में
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आरके चौधरी छोटे-मोटे पद पर नहीं थे. महासचिव थे. बसपा के फाउंडिंग मेंबर थे. 1981 से कांशीराम के साथ थे. चार बार विधायक रहे हैं. चार बार उन्हें प्रदेश सरकार में मंत्री बनाया गया है.2
लेकिन वो पहले भी पार्टी से निकाले जा चुके हैं. 21 जुलाई 2001 को मायावती ने उन्हें गुडबाय कहकर पार्टी से निकाल दिया था. फिर चौधरी ने अपनी पार्टी बना ली थी 'राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी'. 'बहुजन समाज स्वाभिमान संघर्ष समिति' के नाम से एक संगठन भी बनाया था.3
सियासत के रंग सिचुएशन के हिसाब से चढ़ते हैं. 11 अप्रैल 2013 को आरके चौधरी बसपा में वापस ले लिए गए. 2014 लोकसभा चुनाव में उन्हें लखनऊ की मोहनलालगंज सीट से टिकट मिला. हार गए. बसपा का एक्कौ कैंडिडेट नहीं जीता.4
चौधरी पासी (दलित) समुदाय से आते हैं. वाराणसी और इलाहाबाद के जोनल कॉर्डिनेटर थे. उनका कहना है कि बीएसपी का मिशनरी वर्कर खफा है क्योंकि मायावती ने टिकट बांटने में प्रॉपर्टी डीलर्स, जमीन माफिया और ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया है.5
आरके चौधरी ने नहीं बताया कि वो किस पार्टी में जा रहे हैं. इतना जरूर कहा कि 11 जुलाई को लखनऊ में एक मीटिंग करके आगे की रणनीति तय करेंगे.मौर्य के जाने पर मायावती खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आई थीं. अब पार्टी ने बस प्रेस रिलीज के जरिये अपना पक्ष रख दिया. चौधरी को बिकाऊ और स्वार्थी बताते हुए बसपा ने कहा कि वो मोहनलालगंज से विधानसभा का टिकट मांग रहे थे. उनके जाने से पार्टी को न तो पहले फर्क पड़ा था, न अब पड़ेगा.
थोड़ा मौर्य के बारे में
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मौर्य चार बार से विधायक हैं. संगठन का काम देखते रहे हैं. मायावती सरकार में मंत्री भी रहे थे. सन 80 में राजनीति में आए. 1996 में जब बीएसपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, तब मौर्य पहली बार विधायक बने. एक साल बाद ही लाल बत्ती मिल गई. क्योंकि बीजेपी और बीएसपी की छह छह महीने मुख्यमंत्री वाली सरकार बन गई.2
2001 में मायावती ने उन्हें विधानसभा में बीएसपी विधायक दल का नेता बनाया. 2003 में बीजेपी के सपोर्ट से मायावती फिर मुख्यमंत्री बनीं और मौर्य फिर मंत्री. और 2007 में जब मायावती अपने दम पर बहुजन के नारे पर सवार हो पूर्ण बहुमत से लौटीं तो मौर्य फिर मंत्री बने. मगर दो साल बाद ही उन्हें संगठन में काम करने को कह दिया गया. इस दौरान वह विधान परिषद के रास्ते सदन में पहुंचे.
स्वामी प्रसाद मौर्य
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पैदाइश प्रतापगढ़ की है. पढ़ाई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से की. वहीं एलएलबी की पढ़ाई की. फिर कांशीराम के मिशन के संपर्क में आए. और शुरुआती दौर में ही मायावती के विश्वासपात्र बन गए. पूर्वांचल में बीएसपी के प्रदर्शन का श्रेय बीते सालों में उन्हीं को दिया गया है.4
स्वामी प्रसाद मौर्य ‘बुद्धिज्म’ को फॉलो करते हैं. वह अंबेडकरवाद और कांशीराम के सिद्धांतों को मानने वाले नेताओं मे रहे हैं.सब प्रशांत किशोर का किया धरा है?
आरके चौधरी के बसपा छोड़ने में स्वामी प्रसाद मौर्य इंपैक्ट नहीं है, यह मानने की कोई वजह नहीं है. सारी घटनाएं एक दूसरे के क्रम में हो रही हैं. किसी ने फेसबुक पर हवा उड़ा दी कि दोनों कांग्रेस में जाएंगे और ये सब प्रशांत किशोर का किया-धरा है.लेकिन अभी सीन बहुत साफ नहीं है. मौर्य बसपा में अलग-थलग पड़े नेताओं और काफी पहले निकाले गए नेताओं को एकजुट करके ताकत बटोर रहे हैं. ताकि जिस पार्टी से भी उनकी बातचीत चल रही है, वो वहां बेहतर नेगोसिएशन की स्थिति में रहें.
अखिलेश यादव ने जब स्वामी प्रसाद मौर्य की तारीफ की तो लगा कि वे सपा में जाएंगे. पर लग रहा है कि बात अभी पटी नहीं है. जिस तेजी से मौर्य बसपा के रूठे दलित-पिछड़ों को जोड़ रहे हैं और जिस जोर-शोर से बीजेपी दलित-पिछड़ों को साधने में लगी है, हैरत नहीं कि भूतपूर्व नीले और वर्तमान भगवे का मेल हो जाए. ऐसे समय पर इतिहास गौण हो जाता है. सब भूल जाते हैं कि पहले कौन किसके लिए क्या कहता था.
'जाति को तोड़ो, हिंदू को जोड़ो' वाला दलित प्रेम
इधर एक और खबर आई है. एक बीजेपी सांसद ने एक कांग्रेसी के लिए भारत रत्न मांगा है. ये हैं राज्यसभा सांसद तरुण विजय. बताते हैं कि आलाकमान से उन्हें दलित-पिछड़ों को बीजेपी से जोड़ने के मेगा-प्रोजेक्ट पर काम करने का आदेश मिला है. उन्होंने कह दिया है कि दलित नेता बाबू जगजीवन भारत रत्न डिजर्व करते हैं. बाबू जगजीवन राम पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के पिता थे. कांग्रेस के टॉप दलित लीडरों में थे. तरुण विजय ही थे जो दलितों को लेकर उत्तराखंड के एक मंदिर में घुस गए थे, जहां दलितों का प्रवेश मना था. लौटते समय मंदिर के पास ही तरुण विजय पर हमला हो गया था. उनका सिर फूट गया और किसी तरह जान बची.तरुण विजय ने बाबू जगजीवन राम के जीवन के बारे में जो बात हाईलाइट की, उससे आप बीजेपी का दलित-पिछड़ों पर नजरिया समझ सकते हैं. उन्होंने कहा, 'उन्होंने भारी जातीय नफरत और अपमान का सामना किया, फिर भी वे अडिग रहे और हिंदू धर्म नहीं छोड़ा. अगर वह सवर्णों के अत्याचार के खिलाफ हिंदू धर्म छोड़ देते तो इससे भारत में एक सामाजिक भूकंप आ सकता था.'आरके चौधरी ने बसपा छोड़ने के तुरंत बाद स्वामी प्रसाद मौर्य के बारे में कुछ नहीं कहा. हो सकता है वो भी पहले कोई और संभावना तलाशने के चक्कर में हों. फिर भी बसपा के लिए यह 'सेटबैक' तो है ही. ये अब साफ हो गया है कि मौर्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता. उनके साथ दो पूर्व बसपा नेता भी आ गए हैं. दो साल पहले बसपा छोड़ने वाले पूर्व मंत्री और पूर्व विधायक दद्दू प्रसाद ने उनसे हाथ मिला लिया है. उधर वाराणसी से सिटिंग MLA उदय प्रताप मौर्य भी स्वामी के पाले में आ गए हैं. पिछले महीने ही उन्हें बसपा से सस्पेंड किया गया था.
भूकंप का पता नहीं, लेकिन फिलहाल चुनावों से पहले बसपा के समीकरण तोड़ने की कोशिश शुरू हो गई है. माना यही जाता है कि पासी समुदाय मायावती से खुश नहीं रहता, क्योंकि उसे लगता है कि वो अपने जाटव समाज को ज्यादा फेवर करती हैं. इस बात को बीजेपी ने समझ लिया है और हाल के अपने हिंदुत्ववादी कार्यक्रमों में पासी वोटरों पर खूब डोरे डाले हैं. यूपी में कुल 21 फीसदी दलित वोट हैं, इनमें 66 उपजातियां हैं. इनमें करीब 56 फीसदी जाटव हैं और 16 फीसदी पासी. याद रहे आरके चौधरी पासी समाज से आते हैं.
इसलिए मौर्य के हौसले बुलंद हैं और वो तीखी बातें करने से नहीं चूक रहे. शुक्रवार को एक कदम आगे जाते हुए उन्होंने मायावती को 'गद्दारों की नानी' कह डाला. आरोप लगाया कि वो विजय माल्या की तरह हजारों करोड़ रुपया लेकर देश से भाग सकती हैं.
ये तो बातें हैं, कही जाती हैं. लेकिन मायावती अगर यूपी की कुर्सी की ओर बढ़ रही हैं तो इन झटकों ने उन्हें खींचकर चार अंगुल पीछे तो कर ही दिया है. अभी चुनाव में काफी वक्त है और सूरत बदल सकती है. लखनऊ में गोले और बम तो नहीं फूटे हैं, लेकिन छिटपुट पटाखों की आवाज़ आने लगी है. मैं संभावित नारों के बारे में सोच रहा हूं.
























