अब्दुल प्रेमिका से बिछड़ने पर दिन रात एक टीले पर बैठे रहते. किसी ने बताया तो घर वाले जबरन लेकर गए. लेकिन इश्क की आग इत्ती जल्दी कहां ठंडी पड़ने वाली थी. एक रात घर छोड़कर भाग गए. कई साल तक संतों के साथ रहे. जब कई साल बाहर रहकर गम को भूल कुछ ज्ञान पा गए तो घर वापसी की: 'शाह जो रीसालो' की भूमिका में फतेहचंद वासवानी'जहां न पहुंचे रवि. वहां पहुंचे कवि.' पुरानी कहावत है. ऐसे ही महान सूफी संत थे शाह अब्दुल लतीफ. सिंधी भाषा में गुनते, बोलते और लिखते. सिंधी भाषा का रौला दुनिया के सामने टाइट किया. लतीफ का 'शाह जो रीसालो' कालजयी काव्य-संकलन है. जिसकी वजह से पूरी दुनिया में शाह पहचाने गए. आपको बताते हैं खुदा के इसी बंदे के बारे में, जिसकी रचनाओं को आज भी सिंधी जुबां के लोग धड़कन की तरह मानते हैं और सिंधी में इन्ही के लिखे गानों को गुनगुनाते हैं.... सुनें 'शाह जो रीसालो' का एक हिस्सा... https://www.youtube.com/watch?v=T8Jp168n7tc फारसी में रूमी, पंजाबी में फरीद, इंग्लिश में चौसर को जिस नजर से देखा जाता है. सिंधी भाषा में वही पोजिशन अब्दुल लतीफ की है. लतीफ का जन्म 1689 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत के हैदराबाद के हाला तालुका के पास भारपुर गांव में हुआ. ये तब की बात है, जब औरंगजेब का शासन था.
अधूरे इश्क से सूफियाने का सफर लतीफ के सूफी बनने से जुड़ा एक औैर किस्सा है. लतीफ किसी लड़की से मुहब्बत करते थे. लड़की के पिता के टांग अड़ाने से फाइनल बात नहीं बन पाई थी. इसके बाद लतीफ रेगिस्तान में भटकने लगे. रेगिस्तान में भटकते-भटकते बलूचिस्तान, मुल्तान, कच्छ, हिंगलाज में घूमे. गोरखनाथ के चेलों के साथ दोस्ती हुई. ज्ञान बांटा, बढ़ाया. ''मैं बाबीओं की तरह मरुंगा, लू के थपेड़ों से अगर मैं कभी अपने प्रिय को भूल जाऊंगा'' उर्दू, फारसी तक नहीं रह गईं कविताएं काले धागों से सिला लंबा कुर्ता पहनते थे लतीफ. कविताएं उस दौर में उर्दू या फारसी में ज्यादा लिखी जाती थीं. सिंधी भाषा में भी कोई लिखता तो उर्दू फारसी घुसेड़ देता. उर्दू और फारसी से आजादी दिलाते हुए सिंधी में कविताओं को नया मुकाम लतीफ ने दिलवाया. लतीफ के लिखे का ही कमाल था कि 'शाह जो रीसालो' को कई भाषाओं में ट्रांसलेट किया गया. उर्दू से लेकर अंग्रेजी तक. 'कांटों की तरह दुखों ने मेरे दिल को फांस लिया है जैसे पानी में नमक वैसे ही प्रेम और मेरा दिल नीम की डाली की तरह उन्होंने मेरे हृदय को उखाड़ फेंका' अब्दुल लतीफ का कलाम और अबीदा परवीन-रफी की आवाज सिंधी भाषा को समझने वालों के बीच अब्दुल लतीफ का काफी क्रेज है. उनके लिखे कलामों को कई सिंगर्स ने आवाज दी. सिंधी में लतीफ के गानों की भरमार है. इंडिया में जिन दो सिंगर्स का खूब नाम है, उन्होंने भी लतीफ के गानों को गाया. अबीदा परवीन और मोहम्मद रफी. करकश आवाज की मल्लिका अबीदा परवीन ने भी अब्दुल लतीफ का कलाम 'मंद प्रिय दे मो बहला' गाया. मोहम्मद रफी ने भी लतीफ का लिखा गाना दरदन जी मारी सिंधी में गाया. दरदन जी मारी: मोहम्मद रफी https://www.youtube.com/watch?v=FFpbdNLNWFs मंद प्रिय दे मो बहला: अबीदा परवीन https://www.youtube.com/watch?v=6UEqxd0YwEc तो कर्बला में होती अब्दुल लतीफ की कब्रगाह? 1752 के गर्मी भरे दिन थे. लाठी के सहारे अब्दुल लतीफ कर्बला की तरफ बढ़ रहे थे. तभी रेगिस्तान में मिले एक ऊंट सवार ने पूछा, आप कहां जा रहे हैं शाह. जवाब मिला, कर्बला. मेरा दिल कर्बला जाने के लिए तरस रहा है. ऊंट सवार ने कहा, 'जिंदगी भर आप जन्मभूमि में रहने की बात करते थे. अब ऐसा क्या हुआ कि आखिरी वक्त पर आप कर्बला जा रहे हैं.' सुनकर शाह का दिल बदल गया. वो वहीं से सिंध के भींत लौट गए. https://www.youtube.com/watch?v=aAeB34nUxJw कुछ लक्त बाद सूफियाने संगीत में लीन रहते हुए आखिरी सांस ली. शाह की मजार पर अाज भी लोगों की भीड़ रहती है. दीवाने सूफी संगीत सुनते हुए इश्क मिजाजी में डूबे रहते हैं. इश्क खुदा से, किसी अपने से. पूरे 3 दिन पाकिस्तान से लोगों की भीड़ इस मजार पर जुटती है. अब्दुल लतीफ के बारे में राजमोहन गांधी ने अपनी किताब ‘Understanding the Muslim Mind’ में लिखा कि शाह अपना मजहब पूछने पर कहते- कोई नहीं. फिर कुछ रुककर कहते सभी मजहब मेरे मजहब हैं. 'घास के इन तिनकों की वफा देखिए, या तो वे डूबते हुए को बचा लेते हैं या फिर प्रवाह में उसके साथ ही डूब जाते हैं' शाह अब्दुल लतीफ भिटाई पर बनी शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री https://www.youtube.com/watch?v=a6a4SJqKxyQबचपन से अब्दुल लतीफ रेगिस्तान में जोगियों के साथ भटकता रहता. इसी दौर में संत शाह इनायत का दीदार हुआ. यहीं से जिंदगी पलटी.
भिटाई का जन्म 18 नवंबर 1689 को हुआ था और इंतकाल 1 जनवरी 1752 को.













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