केरल में स्थानीय निकाय के लिए हुए चुनाव में वोटों की गिनती जारी है. आज यानी 16 दिसंबर को 1199 स्थानीय निकाय के नतीजे आएंगे. इनमें 941 ग्राम पंचायत, 152 ब्लॉक पंचायत, 14 जिला पंचायत, 86 नगर पालिका और 6 नगर निगम शामिल हैं. वोटिंग के दौरान की एक तस्वीर-PTI
केरल. यहां स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों में CPM-led LDF ने शानदार प्रदर्शन किया है. 941 ग्राम पंचायत में से 500 से ज्यादा पर जीत हासिल की है. वहीं जिला पंचायत की 14 में से 10 और 152 ब्लॉक पंचायत में 108 सीटों पर जीत हासिल की है. केवल नगरपालिका के मामले में LDF पर UDF को बढ़त मिली है. इस चुनाव में वामपंथी दलों के नेतृत्व वाले (LDF) कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) और BJP चुनाव मैदान में थे. नतीजों के मुताबिक स्थिति ये हैः
ग्राम पंचायत: सीटें-941
CPIM-led LDF-514
Congress-led UDF-375
अन्य-29
NDA-23
Corporation: सीटें-6
LDF-3
UDF-3
म्युनिसिपलिटी: सीटें-86
UDF-45
LDF-35
OTH-4
NDA-2
जिला पंचायत: सीटें-14
LDF-10
UDF-4
NDA-0
ब्लॉक पंचायत: सीटें-152
LDF-108
UDF-44
NDA-0
OTH-0 केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने ट्वीट किया,
थैंक्यू केरल. LDF में भरोसा जताने के लिए शुक्रिया. हम केरल के लोगों के भरोसे और आत्मविश्वास को विनम्रता से स्वीकार करते हैं. यह धर्मनिरपेक्षता और समावेशी विकास की जीत है. सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को मेरी हार्दिक बधाई.
न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, केरल के मुख्यमंत्री ने कहा कि LDF को स्थानीय निकाय चुनावों में शानदार जीत मिली. यह राज्य के लोगों की जीत है. यह चुनाव परिणाम उन लोगों को जवाब है जो केरल को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं. केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग करके सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करने वालों के प्रयासों को पराजित किया गया है. परिणामों से पता चलता है कि UDF और उसकी अवसरवादी राजनीति के लिए केरल में कोई जगह नहीं है. कांग्रेस BJP के साथ झूठे अभियान चला रही थी और LDF को बदनाम कर रही थी. यह सफल नहीं हुआ. केरल BJP के चीफ के सुरेंद्रन ने ANI से बातचीत में कहा,
निकाय चुनाव में पार्टी का सीट शेयर बढ़ा है. लोगों ने पीएम मोदी की कल्याणकारी योजनाओं को स्वीकार किया है. पिछले इलेक्शन में तिरुवनंतपुरम कॉर्पोरेशन में कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं. लेकिन इस बार उसे सिर्फ 8 सीटें मिली हैं. राज्य में CPI(M) और BJP के बीच मुकाबला है.
पिछली बार के नतीजे क्या थे? 2015 के निकाय चुनाव में 941 ग्राम पंचायतों में से LDF ने 551 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि UDF ने 362 पंचायत पर कब्जा जमाया था. NDA ने 17 पर जीत हासिल की थी. 152 ब्लॉक पंचायतों में से LDF ने 88, UDF ने 62, एक NDA और एक अन्य के खाते में गई थी. 14 जिला पंचायतों में से LDF और UDF ने 7-7 पर जीत दर्ज की थी, जबकि NDA का खाता नहीं खुला था.
LDF के लिए जीत के मायने क्या हैं?.
स्थानीय निकाय चुनावों में मतों की गिनती अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है. केरल में सत्तारूढ़ LDF को गांव, ब्लॉक, जिला पंचायतों, नगरपालिका और निगम परिषदों में स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है. LDF ने 2015 में अधिकांश स्थानीय निकायों में जीत हासिल की थी. LDF ने या तो अपनी मौजूदा संख्या को बरकरार रखा है या अपनी अपनी टैली में सुधार किए हैं. LDF की जीत मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के लिए बड़ी जीत है, जो पार्टी के साथ-साथ सरकार के भी चेहरे हैं. विजयन को 2019 में लोकसभा चुनाव में झटका लगा था, जब LDF को 20 में से केवल एक सीट मिली थी. हालांकि दोनों चुनावों की तुलना एक तरह के बेइमानी है, लेकिन इन परिणामों को विजयन की सरकार पर जनमत संग्रह के रूप में देखा जा रहा है. आने वाले छह महीने में राज्य में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. स्थानीय निकाय के चुनाव ऐसे समय में हुए थे जब विजयन सरकार के साथ ही माकपा भी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी. स्थिति विजयन के लिए प्रतिकूल रही थी. उनका कार्यालय सोने की तस्करी के घोटाले में घिर है. यहां तक कि पार्टी के राज्य सचिव कोडिएरी बालाकृष्णन को भी ड्रग मामले में उनके बेटे को जेल जाने के बाद जबरदस्ती छुट्टी पर भेजना पड़ा.
LDF को विधानसभा में फायदा मिलेगा?
विपक्ष ने CMO और सरकार पर गंभीर आरोप लगाए. लेकिन विजयन ने अलग रास्ता अख्तियार किया. उनका ध्यान सरकार की उपलब्धियों, विशेष रूप से कल्याणकारी योजनाओं पर रहा. खासकर कल्याणकारी योजनाओं पर. जो उनके शासन के तहत शुरू की गईं. इसमें गरीबों के लिए घर जैसी योजनाएं शामिल हैं. नतीजों से पता चलता है कि सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का असर जनता पर उतना नहीं पड़ा. ये भी कहा जा रहा है कि जिस तरह के सरकार ने कोविड को मैनेज किया है उसका भी असर नतीजों में देखने को मिल रहा है. निकाय चुनाव को अगले साल होने वाले केरल विधानसभा चुनाव का लिटमस टेस्ट माना जा रहा थां जिसमें LDF शानदार अंको से पास होता दिख रहा है. स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस और माकपा को केरल में धर्मनिरपेक्ष राजनीति की विरासत को लेकर एक दूसरे पर वार करते देखा गया. धर्मनिरपेक्ष राजनीति केरल में किसी भी चुनाव में महत्वपूर्ण मुद्दा होता है. जमात-ए-इस्लामी वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) के साथ चुनाव लड़ने के कांग्रेस के फैसले ने CPI (M) को यह दिखाने का मौका दिया कि UDF सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर काम कर रहा है. इस तरह के अभियान ने विजयन को 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर LDF से दूर जाने वाले हिंदू मतदाताओं के एक हिस्से को वापस लाने में मदद की. साथ ही ईसाइयों के एक वर्ग, विशेष रूप से कैथोलिक समुदाय ने मुस्लिम संगठनों के खिलाफ आवाज उठाई. यूडीएफ की राजनीति। एलडीएफ द्वारा विद्युतीकरण में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। जो राज्य में किसी भी चुनाव को जीतने के लिए हमेशा महत्वपूर्ण है। जमात-ए-इस्लामी वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) के साथ चुनावी समझ के लिए जाने के कांग्रेस के फैसले ने CPI (M) को यह दिखाने का मौका दिया कि UDF सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर काम कर रहा है। उस अभियान ने विजयन को 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर एलडीएफ से दूर जाने वाले हिंदू मतदाताओं के एक हिस्से को वापस लाने में मदद की. BJP ने केरल में अपनी पैठ जमाने के लिए 612 अल्पसंख्यक समुदाय के प्रत्याशियों पर दांव लगाया था. जिनमें 500 ईसाई समुदाय से और 112 मुस्लिम थे. 2014 के बाद से हर एक चुनाव में BJP का ग्राफ केरल में बढ़ा है. BJP का राज्य में कोई सांसद और विधायक नहीं है, लेकिन वोट 15 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है. केरल में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 46 फीसदी है. इसमें 27 फीसदी मुसलमान और 19 फीसदी के करीब ईसाई हैं. BJP जानती है कि केरल में अगर उसे सत्ता तक पहुंचना है तो हिंदू मतदाताओं के साथ ईसाई समुदाय को भी साधकर रखना होगा. यही वजह है कि पार्टी ने केरल में बड़ी तादाद में इस बार अल्पसंख्यकों को टिकट दिया है.