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'जेडी वेंस भारतीय सेना की यूक्रेन में तैनाती चाहते थे, ट्रंप हंसने लगे', किताब में बड़े दावे

अमेरिकी पत्रकारों मैगी हैबरमैन और जोनाथन स्वान की एक किताब आई है, ‘रिजीम चेंज : इनसाइड द इम्पीरियल प्रेसिडेंसी ऑफ डॉनल्ड ट्रंप’. इस किताब में दावा किया गया है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस यूक्रेन में शांति सेना के तौर पर भारत सेना की भागीदारी चाहते थे, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने उनके सुझाव को खारिज कर दिया.

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अमेरिकी राष्ट्रपति जेडी वेंस के प्रस्ताव को डॉनल्ड ट्रंप ने खारिज कर दिया. (इंडिया टुडे)

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  • मैगी हैबरमैन और जोनाथन स्वान की किताब 'रिजीम चेंज' में बताया गया है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सुझाव दिया था कि भारत की सेना को यूक्रेन में शांति सेना का हिस्सा बनाया जाए, जिसे डॉनल्ड ट्रंप ने ठुकरा दिया।
  • रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने युद्ध खत्म करने की अमेरिकी भूमिका पर 30 जनवरी 2025 को ओवल ऑफिस में बैठक की, जिसमें नाटो देशों के पीसकीपिंग ट्रूप्स को भेजने का प्रस्ताव था लेकिन रूस की नाराजगी के कारण भारत समेत गैर-यूरोपीय देशों को नामित करने का सुझाव आया।
  • ट्रंप ने भारत के प्रस्तावित शांति मिशन में शामिल होने की संभावना को अस्वीकार किया और कहा कि भारत इस प्रकार के अभियान की लागत नहीं उठाएगा, जबकि भारत ने युद्ध समाप्ति के लिए बातचीत पर ही जोर दिया है और फरवरी 2025 में पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाकात भी हुई थी।

सत्ता के अंत:पुर के किस्सों में सबकी दिलचस्पी होती हैं. यहां से देश-दुनिया को प्रभावित करने वाले फैसले होते हैं. लेकिन ये किस्से कम ही बाहर आ पाते हैं. और जब आते हैं तो खूब चर्चा बटोरते हैं. दो अमेरिकी पत्रकारों मैगी हैबरमैन और जोनाथन स्वान की लिखी किताब 'रिजीम चेंज' ऐसे ही किस्सों के चलते चर्चा में है. इस किताब में दावा किया गया है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस चाहते थे कि भारत की सेना यूक्रेन में पीस कीपिंग फोर्स यानी शांति सेना का हिस्सा बने. लेकिन राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इस सुझाव को हंसकर टाल दिया था.

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भारत की सेना यूक्रेन में चाहते थे जेडी वेंस?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, मैगी हैबरमैन और जोनाथन स्वान की नई किताब, ‘रिजीम चेंज : इनसाइड द इम्पीरियल प्रेसिडेंसी ऑफ डॉनल्ड ट्रंप’ आई है. इसमें बताया गया है कि 30 जनवरी 2025 को राष्ट्रपति ट्रंप ने वॉइट हाउस के ओवल ऑफिस में एक बैठक की. यह बैठक उनके राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के 10 दिन बाद हुई थी. बैठक रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिकी भूमिका को लेकर थी. 

किताब में इस घटना के बारे में लिखा है, 

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याद कीजिए डॉनल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर क्या वादा किया था. उन्होंने दो बार कहा था कि मैं इसे एक दिन में सुलझा दूंगा और 24 घंटे के भीतर यह युद्ध खत्म हो जाएगा. राष्ट्रपति बनने के 10 दिन बाद उन्होंने बैठक बुलाई. बैठक का मकसद ये तय करना था कि युद्ध खत्म करने में अमेरिका की भूमिका क्या होगी.

ट्रंप ने ठुकराया जेडी वेंस का सुझाव

इस बैठक में रूस और यूक्रेन के लिए अमेरिका के विशेष दूत लेफ्टिनेंट जनरल कीथ केलॉग भी मौजूद थे. कीथ केलॉग की इस योजना को ट्रंप्स हिस्टोरिक पीस डील नाम दिया गया था. इसके तहत यूक्रेन में ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे नाटो (NATO) देशों के शांति सैनिकों (पीसकीपिंग ट्रूप्स) को यूक्रेन में भेजने का प्रस्ताव आया.

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लेकिन जेडी वेंस ने इस पर प्रस्ताव पर आपत्ति जताई. उनका कहना था कि नाटो सैनिकों को यूक्रेन भेजने से रूस नाराज हो सकता है. इस बैठक से एक हफ्ते पहले ही रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा भी था कि इस युद्ध में किसी भी भूमिका में नाटो सैनिकों की मौजूदगी मंजूर नहीं होगी.

किताब के मुताबिक, इसके बाद जेडी वेंस ने सुझाव दिया कि क्यों न गैर यूरोपीय देशों से मदद ली जाए. वेंस ने इस काम के लिए सऊदी अरब और भारत का नाम आगे बढ़ाया. लेकिन जेडी वेंस का सुझाव सुनते ही राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप हंस पड़े. किताब के मुताबिक उन्होंने कहा, 

भारतीय ऐसा कभी नहीं करेंगे. वे इस तरह की चीज के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च नहीं करेंगे.

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रिजीम चेंज (इंडिया टुडे)

किताब में आगे बताया गया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा, 

प्रधानमंत्री मोदी मुझे बहुत पसंद करते हैं और वो मुझसे मिलने आना चाहते हैं. लेकिन भारत इस तरह के अभियान की कीमत नहीं चुकाएगा.

भारत सरकार इस मुद्दे पर लगातार कहती रही है कि रूस-यूक्रेन युद्ध का पूरी तरह से अंत होना चाहिए. दोनों देशों के बीच सभी मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाना चाहिए. फरवरी 2025 में पीएम मोदी और राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की वाशिंगटन में मुलाकात हुई थी. यह मुलाकात किताब में बताई गई वॉइट हाउस की बैठक के कुछ दिन बाद हुई थी. उस समय विदेश मंत्रालय ने भारत के पुराने रूख का जिक्र किया था कि किसी भी संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं हो सकता. 

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