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ISRO के बनाए 'पुष्पक' विमान की सफल लैंडिंग, जानें काम क्या करेगा

ISRO ने बताया कि भारत स्पेस में कचरा कम करने की तरफ भी कदम उठा रहा है. पुष्पक विमान भी उस तरफ एक कदम है.

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एयरोप्लेन की तरह दिखने वाले इस 6.5 मीटर के विमान का वजन 1 हजार 750 किलो है. (फोटो- ट्विटर)

स्पेस मिशन के सेगमेंट में ISRO पिछले कुछ सालों से काफी नए एक्सपेरिमेंट्स करता आ रहा है. इस कड़ी में उसने अब एक और कीर्तिमान हासिल कर लिया है. नए जमाने का ‘पुष्पक’ रॉकेट बना कर (ISRO Pushpak RLV). इसे ‘स्वदेशी स्पेस शटल’ भी कहा जा रहा है. कर्नाटक में 22 मार्च को इसका सफल परीक्षण हुआ.

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‘पुष्पक’ नाम के इस रॉकेट का टेस्ट एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से किया गया. ISRO चीफ एस सोमनाथ ने बताया कि रॉकेट टेस्ट के परिणाम सटीक रहे हैं. एनडीटीवी में छपी रिपोर्ट के अनुसार स्पेस एजेंसी ने बताया,

“ISRO ने फिर झंडे गाड़ दिए. पंखों वाला विमान पुष्पक (RLV-TD) रनवे पर स्वायत्त रूप से उतरा.”

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एजेंसी ने ये भी बताया कि हाई स्पीड लैंडिंग कंडीशन को RLV ने सफलतापूर्वक सिम्युलेट किया और स्पेस से वापस उतरा. ISRO ने कहा,

“पुष्पक विमान भारतीय वायुसेना के चिनूक हेलीकॉप्टर द्वारा लिफ्ट किया गया था. जिसके बाद इसे 4.5 किलोमीटर की ऊंचाई से रिलीज किया गया. रनवे से 4 किलोमीटर की दूरी पर इसे रिलीज किया गया, जिसके बाद ये विमान अपने आप रनवे पर उतरा. विमान काफी सटीक तरह से रनवे पर लैंड किया. पैराशूट ब्रेक, लैंडिंग गियर ब्रेक्स और नोज़ व्हील स्टीयरिंग सिस्टम के इस्तेमाल से ये रुका.”

रिपोर्ट के अनुसार ये पुष्पक विमान की तीसरी फ्लाइट थी. इसे ऑपरेशनल होने में अभी कई साल लग सकते हैं. ISRO चीफ सोमनाथ ने बताया,

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“पुष्पक लॉन्च व्हीकल अंतरिक्ष यात्रा को किफायती बनाने का भारत की तरफ से एक साहसी प्रयास है. ये भविष्य का Reusable Launch Vehicle (RLV) है. विमान की अपर स्टेट में सबसे महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स लगाए गए हैं, जिन्हें रीयूजेबल बनाया गया है. इसका इस्तेमाल सैटेलाइट की रीफ्यूलिंग के लिए किया जा सकता है, इसके साथ ही सैटेलाइट्स की मरम्मत के लिए भी उन्हें लाया जा सकता है.”

एजेंसी ने बताया कि भारत स्पेस में कचरा कम करने की तरफ भी कदम उठा रहा है. पुष्पक विमान भी उस तरफ एक कदम है.

बता दें कि RLV को पहली बार साल 2016 में उड़ाया गया था. तब ये बंगाल की खाड़ी में वर्चुअल रनवे पर सफलतापूर्वक उतरा था. योजना के अनुसार, विमान समुद्र में डूब गया और फिर कभी वापस रिकवर नहीं किया गया. इसका दूसरा परीक्षण 2023 में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया था. उस वक्त इसने स्वायत्त लैंडिंग की थी.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार इस स्पेस शटल को बनाने का काम 10 साल पहले शुरू किया गया था. एयरोप्लेन की तरह दिखने वाले इस 6.5 मीटर के विमान का वजन 1 हजार 750 किलो है. इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार ने 100 करोड़ रुपये का निवेश किया है.

वीडियो: आसान भाषा में: ISRO के एलन मस्क से हाथ मिलाने के बाद अंतरिक्ष में क्या होने वाला है?

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