इजरायल में चुनाव के नतीजे आ गए हैं. लेकिन नई सरकार कौन बनाएगा, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है. लेकिन खबर है कि नेतन्याहू की पुरानी सहयोगी पार्टी यूनाइटेड टोरा जुडाइज्म यानी UTJ अब आइज़ेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन देने का प्रस्ताव रख सकती है. हालांकि, इसके लिए उसने एक बड़ी शर्त रखी है. ऐसी शर्त, जिसे मानना आइज़ेनकोट के लिए आसान नहीं होगा. लेकिन शर्त समझें, उससे पहले इजरायल में सीटों का पूरा गणित समझ लेते हैं.
नेतन्याहू की सहयोगी पार्टी अब आइजेनकोट के साथ? जानिए इजरायल में किसकी बन सकती सरकार
इजरायल की संसद में कुल 120 सीटें हैं. सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है. नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं. यानी उन्हें बहुमत के लिए 8 और सांसद चाहिए. दूसरी तरफ आइज़ेनकोट के गठबंधन के पास 48 सीटें हैं. उन्हें 13 और सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. यानी दोनों खेमों को अब ऐसे दलों की जरूरत है, जिनके साथ उनके राजनीतिक मतभेद हैं.

इजरायल की संसद में कुल 120 सीटें हैं. सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है. नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं. यानी उन्हें बहुमत के लिए 8 और सांसद चाहिए. दूसरी तरफ आइज़ेनकोट के गठबंधन के पास 48 सीटें हैं. उन्हें 13 और सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. यानी दोनों खेमों को अब ऐसे दलों की जरूरत है, जिनके साथ उनके राजनीतिक मतभेद हैं.
अब आते हैं UTJ के ऑफर पर. UTJ लंबे समय से नेतन्याहू के गठबंधन का हिस्सा रही है. इस बार उसके पास 7 सीटें हैं. लेकिन अब पार्टी नेतन्याहू का साथ छोड़कर आइज़ेनकोट को समर्थन देने पर विचार कर रही है. इजरायली मीडिया यनेट (Ynet) की रिपोर्ट के मुताबिक, UTJ के एक सीनियर लीडर ने कहा है कि पार्टी आइज़ेनकोट के सामने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखेगी. लेकिन इसके बदले एक कानून बनाने की मांग होगी.
इस कानून का संबंध हरेदी समुदाय से है. हरेदी इजरायल का एक अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय है. इसके धार्मिक शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को लंबे समय से सैन्य सेवा से छूट मिलती रही है. इजरायल में ज्यादातर यहूदी नागरिकों के लिए सेना में सेवा करना जरूरी है. लेकिन हरेदी समुदाय के छात्रों को इस मामले में विशेष छूट मिलती रही है. UTJ चाहती है कि ये छूट जारी रहे और इसे कानूनी सुरक्षा मिले. नेतन्याहू सरकार इस मुद्दे पर कानून पास नहीं करा पाई. इससे UTJ नाराज है. अब पार्टी को लगता है कि नेतन्याहू के साथ बने रहने से उसे कोई फायदा नहीं हो रहा.
लेकिन आइज़ेनकोट के लिए इस मांग को मानना मुश्किल है. क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान आइज़ेनकोट ने साफ किया था कि वे सैन्य सेवा को लेकर किसी तरह की छूट के पक्ष में नहीं हैं. उनका जोर इस बात पर रहा है कि हरेदी समुदाय के लोगों को भी सेना या राष्ट्रीय सेवा में योगदान देना चाहिए. यानी UTJ का समर्थन लेने के लिए उन्हें अपने ही चुनावी वादे से पीछे हटना पड़ सकता है.
कैसे बनेगी इजरायल में सरकार?मान लीजिए कि आइज़ेनकोट UTJ की 7 सीटें हासिल कर भी लेते हैं, तब भी उनके पास कुल 55 सीटें ही होंगी. बहुमत के लिए उन्हें 6 और सांसदों की जरूरत पड़ेगी. इतना ही नहीं, उनके मौजूदा सहयोगी अविग्दोर लिबरमैन भी अति-रूढ़िवादी पार्टियों के साथ सरकार बनाने के खिलाफ रहे हैं. आइज़ेनकोट के पास दूसरा रास्ता अरब पार्टियां हैं. इजरायल में दो अरब समर्थित पार्टियां हैं. दोनों को मिलाकर 19 सीटें होती हैं. अगर आइज़ेनकोट का गठबंधन इन दोनों पार्टियों का समर्थन हासिल कर लेता है, तो उसके पास 67 सीटें हो सकती हैं. यानी बहुमत से 6 ज्यादा.
लेकिन यहां भी एक पेंच है. चुनाव प्रचार के दौरान आइज़ेनकोट के खेमे के कई नेताओं ने अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने का विरोध किया था. हालांकि, आइज़ेनकोट ने अब इस विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं किया है. उन्होंने कुछ शर्तों के साथ अरब पार्टियों के सहयोग की संभावना खुली रखी है.
नेतन्याहू के पास क्या रास्ते हैं?पहला रास्ता अरब पार्टियों का समर्थन लेना है. लेकिन नेतन्याहू चुनाव प्रचार के दौरान इन पार्टियों के साथ सरकार बनाने का विरोध करते रहे हैं. ऐसा करने पर उनके अपने सहयोगी नाराज हो सकते हैं. दूसरा रास्ता राष्ट्रीय एकता की सरकार बनाना है. यानी विपक्षी दलों के साथ मिलकर सरकार चलाना. लेकिन आइज़ेनकोट पहले ही नेतन्याहू के नेतृत्व में सरकार में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं.
इस बीच नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने चुनाव में धांधली और विदेशी दखल के आरोप भी लगाए हैं. पार्टी ने दावा किया कि चुनाव में धांधली हुई है. हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा है कि धांधली के आरोप बेबुनियाद हैं. मामले में विदेशी दखल की आशंकाओं की जांच हो रही है, लेकिन इससे घोषित नतीजों पर असर नहीं पड़ेगा. फिलहाल चुनाव की गिनती पूरी हो चुकी है. लेकिन नतीजों का ऑफिशियल अनाउंसमेंट बाकी है. चुनाव आयोग 4 नवंबर को आधिकारिक नतीजे राष्ट्रपति इसाक हर्जोग को सौंपेगा. इसके बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.
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कुल मिलाकर नेतन्याहू और आइज़ेनकोट, दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुमत जुटाने की है. लेकिन जिन पार्टियों के समर्थन से सरकार बन सकती है, उनकी शर्तें दोनों नेताओं की राजनीति से टकरा रही हैं. अब देखना होगा कि इजरायल में सरकार बनाने के लिए कौन अपने सिद्धांतों से समझौता करता है और किसकी कुर्सी बचती है.
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