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जब ईरान-इजरायल ने अमेरिका के खिलाफ जाकर एक साझा दुश्मन से जंग की

Israel Iran: भले से सुनने में कल्पना से परे लगे, लेकिन एक समय था जब इज़रायल और ईरान ने एक साझा दुश्मन से लड़े थे. वो भी अमेरिका के ख़िलाफ़ जाकर.

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वर्तमान Iran और Israel के प्रमुख. (फ़ोटो - AP)

मिडिल ईस्ट में तनाव (Middle East Crisis) चरम पर है. अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं. करार जवाब देने में ईरान भी पीछे नहीं है. उसने इजरायल समेत अमेरिका के कई मित्र अरब देशों पर अपनी अत्याधुनिक और घातक मिसाइलें दागी हैं. इस युद्ध के पीछे वही पुराना दावा है कि ईरान जल्दी ही परमाणु बम बना लेगा और उसकी मिसाइलों की जद में इजरायल क्या अमेरिका तक आ जाएगा.

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इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दशकों से यही दावा कर अमेरिका और ईरान का कूटनीतिक तौर पर आमना-सामना कराते रहे. लेकिन अब कूटनीति फेल हो चुकी और मिसाइलें आसमान नाप रही हैं.

लेकिन ईरान और इजरायल के बीच ऐसी दुश्मनी है हमेशा से नहीं थी. भले ये सुनने में कल्पना से परे लगे, लेकिन एक समय था जब इज़रायल और ईरान एक साझा दुश्मन से लड़े थे. वो भी अमेरिका के ख़िलाफ़ जाकर.

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दरअसल, 1960 के दशक में इज़रायल और ईरान दोनों का एक कॉमन विरोधी हुआ. वो विरोधी था इराक़. उस समय इज़रायल अरब देशों के ख़िलाफ़ एक बड़े संघर्ष में उलझा हुआ था. ईरान में मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी का शासन था. ईरान, इराक़ के नेतृत्व को अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए सीधा ख़तरा मानता था. तभी उस युग की सबसे सीक्रेट पार्टनरशिप में से एक की नींव रखी गई.

कुर्द ग्रुप को बल देना

इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद और ईरान की सीक्रेट पुलिस SAVAK. दोनों ने इराक़ी शासन के ख़िलाफ़ कुर्द विद्रोहियों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कुर्द ग्रुप को इराक़ के अरब राष्ट्रवादी नेतृत्व की कमज़ोर कड़ी के रूप में देखा गया. कुर्द समूह को बल देना इराक़ी सरकार को भीतर से कमजोर करने के लिए ज़रूरी था. इज़राइल और ईरान के बीच सहयोग त्रिपक्षीय ख़ुफ़िया अलायंस के गठन के साथ नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया. इसका कोड नाम था- ट्राइडेंट. तुर्की भी इसमें शामिल था.

अमेरिका के पास जाना ईरानी मकसद

1958 में शुरू हुए ट्राइडेंट में इन तीन ग़ैर अरब शक्तियों ने महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया जानकारियों का लेन देन किया. ये रिश्ता जैसे-जैसे पक्का हुआ, इज़रायल और ईरान और क़रीब आए. इससे गहरे सैन्य और ख़ुफ़िया संबंध बने. ये शाह के शासनकाल तक जारी रहा. शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी न सिर्फ़ जियोपॉलिटिकल इंट्रेस्ट से प्रेरित थे, बल्कि अमेरिका में इज़रायल के प्रभाव को भी मानते थे. उन्होंने इज़रायल को अमेरिका के साथ संबंधों को बढ़ाने के संभावित साधन के रूप में देखा. ख़ासकर तब, जब कैनेडी प्रशासन ने उनके शासन के बारे में चिंता जताई थी.

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इज़रायल-ईरानी संबंधों के बढ़ने से ईरान को पश्चिम के साथ जुड़ने की रणनीति में भी मदद मिली. नतीज़ा ये रहा कि 1960 के दशक के मध्य में तेहरान (ईरान की राजधानी) में एक स्थायी इज़रायली प्रतिनिधिमंडल की स्थापना हुई. जो एक वास्तविक एंबेसी के रूप में काम करता था. हालांकि, इन रिश्तों में कई बार खट्टापन भी आया. अरब दुनिया में व्यापक इज़रायल विरोधी भावना प्रभावित थी. ये जानकारी शाह को भी थी, इसीलिए उन्होंने सावधानीपूर्वक ईरान के इज़रायल के साथ संबंधों के चेहरे को सार्वजनिक नहीं किया. वो रिश्तों को बरतकर चलते थे.

1967 में जब छह दिवसीय युद्ध ( अरब-इज़रायल) चला, तो ईरान, इजरायल के प्रति कुछ ज़्यादा आलोचनात्मक हो गया. लेकिन उसके रणनीतिक हित वैचारिक या कूटनीतिक पदों से ज़्यादा जरूरी बने रहे.

इस्लामिक क्रांति

ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई. इसने देश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया. अब ईरान एक इज़रायल विरोधी इस्लामिक गणराज्य बन गया. अयातुल्लाह खोमैनी सत्ता में आए. हालांकि, इसके बाद भी नई सरकार भी इज़रायल के साथ चुपचाप सहयोग करती रही. क्योंकि इनके सामने फिर एक कॉमन दुश्मन इराक़ खड़ा था. जैसे-जैसे ईरान-इराक़ युद्ध (1980-1988) आगे बढ़ा, दोनों देशों (ईरान-इज़रायल) को सद्दाम हुसैन (तत्कालीन इराक़ी तानाशाह) के ख़िलाफ़ एक साथ काम करने में फ़ायदा महसूस हुआ.

इज़राइल को भी ईरान की मदद करने में एक मौक़ा दिखा. वो सद्दाम हुसैन को अपनी सुरक्षा के लिए ज़्यादा 'तात्कालिक और ख़तरनाक' थ्रेट मानता था. इराक़ की दुर्जेय सेना दोनों के लिए एक जोखिम थी. इज़राइल का ईरान को हथियारों की खेप पहुंचाना, इराक़ की ताक़त को कम करने के लिए एक सुनियोजित फ़ैसला था. ये सीक्रेट आर्म डील उस अमेरिकी नीति के बावजूद की गई, जिसके तहत तेहरान में बंधक बनाए गए अमेरिकी लोगों की रिहाई तक ईरान को सैन्य सहायता देने पर रोक थी.

इज़रायली सैन्य मदद के बदले में खोमैनी ने बड़ी संख्या में ईरानी यहूदियों को इज़रायल या अमेरिका में इमिग्रेशन को मंजूरी दी. ये ऐसी रियायत थी, जिससे दोनों के संबंधों की एक झलक मिली.

ईरान को मदद की ज़रूरत

1980 के दशक के मध्य तक ईरान को और ज़्यादा सैन्य सहायता की ज़रूरत पड़ने लगी. क्योंकि इराक के युद्ध ने देश के संसाधनों को ख़त्म कर दिया था. उसकी अर्थव्यवस्था पतन के कगार पर थी. इसी बीच, ईरान-कॉन्ट्रा मामला सामने आया. एक सीक्रेट ऑपरेशन, जिसमें हथियारों की बिक्री शामिल थी. इज़रायल के लिए ये हथियार का सौदा रणनीतिक रूप से फ़ायदेमंद था. क्योंकि इससे इराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध में ईरान के गुप्त सहयोगी के रूप में इसकी भूमिका और बढ़ी. हथियारों और संसाधनों के लिए बेताब ईरान, इज़रायल और अमेरिका दोनों के साथ जुड़ने को तैयार था. जबकि वो सार्वजनिक रूप से इजरायल की निंदा करता रहा.

इज़रायल-ईरानी साझेदारी पारंपरिक हथियारों के सौदे से आगे तक फैली हुई थी. इसमें, सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में से एक ऑपरेशन फ्लावर भी था. एक सीक्रेट मल्टी बिलियन डॉलर की पहल, जो 1977 में शाह के शासन के तहत शुरू हुई. इस प्रोजेक्ट में सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों का मोडिफिकेशन करना शामिल था, जिन्हें ईरान को बेचा जाना था. ये संभवतः परमाणु वारहेड हो सकती थीं. हालांकि, प्रोजेक्ट के परमाणु वाले पहलू को आगे नहीं बढ़ाया गया.

1986 की न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, इस सौदे के तहत ईरान ने 1978 में इज़रायल को 260 मिलियन डॉलर का तेल भेजकर एक बड़ा अग्रिम भुगतान किया था. इस मिसाइल प्रोग्राम पर काम 1979 में इस्लामिक क्रांति तक जारी रहा. हालांकि, खोमैनी के शासन ने अचानक सहयोग रोक दिया. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट 1981 की है. इसमें बताया गया कि अक्टूबर 1980 में ईरान, इराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध कर रहा था. तब इज़रायल ने सीक्रेट रूप से ईरान को अमेरिका में बने F-4 फाइटर जेट्स के लिए 250 स्पेयर टायरों की आपूर्ति की थी.

सितंबर 1980 में सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया. इसके बाद इज़राइल अजीब स्थिति में फंस गया. 250 रिट्रेड टायरों की इज़राइली बिक्री (क़ीमत लगभग 300,000 डॉलर). ये ईरान की एयर फ़ोर्स को मजबूत करने के उद्देश्य से एक सीक्रेट लेनदेन था. ईरान की सेना का एक प्रमुख घटक F-4 फैंटम जेट टूट-फूट के कारण बंद कर दिया गया था. ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए हुए थे. इसीलिए, ये रिट्रेड टायर (इज़राइल में बनाए गए) सीक्रेट रूप से फ्रांस ले जाए गए. यहां से उन्हें चार्टर्ड विमानों के जरिए ईरान भेजा गया.

फिर बदल गई कहानी

ये लेन-देन अमेरिका-ईरान संबंधों के लिए एक नाजुक दौर में हुआ. जबकि 52 अमेरिकी राजनयिक तब भी तेहरान के बंधक थे. जिमी कार्टर प्रशासन उनकी रिहाई को सुरक्षित करने के लिए उत्सुक था. उसने बंधकों के रिहा होने तक ईरान के साथ आगे के सैन्य सौदों को सस्पेंड करने के लिए इज़राइल से आग्रह किया. तब इज़रायल के प्रधान मत्री मेनाकेम बेगिन ने अमेरिकी दबाव पर सहमति जताई और (युद्ध में इराक़ी जीत को रोकने में इजरायल के रणनीतिक हितों के बावजूद) सभी सैन्य सौदे रोक दिए.

क्षेत्रीय सत्ता की राजनीति से परे, इजरायल की एक और व्यक्तिगत चिंता थी. वो थी ईरान में यहूदी आबादी का भविष्य. उस समय ईरान में लगभग 60,000 यहूदी रहते थे. इज़रायल को ये डर था कि वो यहूदी नए शासन के तहत दमन या उत्पीड़न का शिकार ना बनें. ईरान के साथ किसी तरह के बैक-चैनल कम्यूनिकेशन को बनाए रखना, इन यहूदी समुदायों की रक्षा करने का एक तरीका माना जाता था.

1990 के दशक तक इजरायल और ईरान के बीच सहयोग का युग लगभग ख़त्म हो गया. भू-राजनीतिक कारक, जो कभी उन्हें एकजुट करते थे गायब हो गए थे. ये कारक थे अरब समाजवाद, सोवियत प्रभाव और इराक का खतरा. बाद में निरंतर सहयोग के लिए दोनों के बीच बहुत कम इंट्रेस्ट बचा. ईरान ने इजरायल विरोधी विचारधारा को अपना लिया है. उसने यहूदी राज्य के साथ संघर्ष में हिज़बुल्लाह और हमास जैसे समूहों का समर्थन किया.

वीडियो: दुनियादारी: यूक्रेन में ईरान के हथियारों से कितनी तबाही? अमेरिका क्या बोल रहा है?

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