
रूपम अपनी कहानी से और महिलाओं को इस मुहिम से जुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं. (फोटोः एनॉक्टस एसआरसीसी)
अप्रैल 2018. लालबाग में पानी साफ करने का आरओ प्लांट लगा. इस प्लांट के जरिए स्थानीय लोगों को साफ पानी तो मिला ही, इसने रूपम के सपनों को भी फिर से जिंदा कर दिया. रूपम को आरओ प्लांट का ऑपरेटर नियुक्त किया गया. रूपम ने इसे कर्मचारी की तरह नहीं बल्कि अपने खुद के प्रोजेक्ट की तरह लिया. रूपम सफलतापूर्वक आरओ प्लांट तो चला ही रहीं हैं, साथ ही अपने घर के कामकाज भी देखती हैं. ये संभव हो पाया है एनॉक्टस एसआरसीसी (श्रीराम कॉमर्स कॉलेज) की बदौलत.
एनॉक्टस क्या है? एनॉक्टस एक वैश्विक नॉन प्रॉफिट संस्था है. ये दुनिया की 1700 यूनिवर्सिटीज़ में काम कर रही है. इसकी खासियत ये है कि ये कॉलेज में ही एक सोसायटी बनाती है जो कम्यूनिटी डेवलपमेंट के लिए काम करती है. इसके जरिए सोशल वेलफेयर के काम किए जाते हैं. एनॉक्टस की ऐसी ही एक सोसायटी दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉमर्स कॉलेज में भी है. यहां इसकी शुरुआत 2007 में हुई थी.

एनॉक्टस श्रीराम कॉमर्स कॉलेज की टीम. (फोटोः एनॉक्टस एसआरसीसी)
हाल ही में हुए वर्ल्ड कप कॉम्पीटिशन में इस टीम को तीसरा स्थान मिला है. 2007 से अब तक ये 14 प्रोजेक्ट चला चुके हैं. जिनमें से 11 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं. जो अभी चल रहे हैं उनमें से प्रमुख हैं - प्रोजेक्ट असबाह और प्रोजेक्ट विरासत.
प्रोजेक्ट असबाह प्रोजेक्ट असबाह श्रीराम कॉमर्स कॉलेज के छात्रों की एक मुहिम है. जिसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति तक साफ पीने का पानी पहुंचाना है. वो भी बेहद किफायती दाम में. 20 लीटर पानी जो कि मार्केट में 60-80 रुपए में मिलता है वो यहां केवल 4 रुपए में उपलब्ध है.
प्रोजेक्ट असबाह की शुरुआत अप्रैल 2018 में हुई थी. इस समय प्रोजेक्ट के जरिए कबीर नगर और लालबाग में दो आरओ प्लांट काम कर रहे हैं. जो प्रतिदिन 5000 लोगों तक साफ पीने का पानी पहुंचा रहे हैं. इसके लिए बाकायदा लालबाग में आरओ प्लांट भी लगाया गया है. जिसे स्थानीय लोगों की सहायता से ही ऑपरेट किया जाता है. इस प्रोजेक्ट को अभी छह और जगह शुरू किया जाना है. इसके लिए जगह भी चिन्हित कर ली गई है.
प्रोजेक्ट विरासत जंदियाला गुरू. अमृतसर शहर का एक कस्बा. इसी कस्बे में एक गली है. कश्मीरी गली. यहां ठठेरों का बाजार लगता है. कहते हैं कि 1883 में महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीरी ठठेरों को यहां बसाया था. लेकिन बाद में ये पूरा इलाका बर्तन की कारीगरी के लिए मशहूर हो गया. ये भारत का एकमात्र ऐसा क्राफ्ट है जिसे यूनेस्को ने मानवता की अमूर्त धरोहरों की लिस्ट में शामिल कर रखा है.

कश्मीरी गली बाजार में बर्तनों पर कारीगरी करते ठठेरे. (फोटोः एनॉक्टस एसआरसीसी)
यहां के ठठेरे अपने हाथ से जस्ता, पीतल और कांसे के बर्तन बनाते हैं और कलाकारी करते हैं. लेकिन ये कला धीरे-धीरे मरती नजर आ रही थी. एनॉक्टस का प्रोजेक्ट विरासत इसी कला को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है. इसके अंतर्गत प्रोडक्ट्स को मार्केट के हिसाब से मोडिफाई किया जाता है. इसमें इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि उसके मूल स्वरूप में कोई बदलाव न हो. इसे प्रदर्शनियों में लगाया जाता है. और ये रिटेल आउटलेट में भी उपलब्ध है. प्रोजेक्ट विरासत मुहिम का ये असर हुआ है कि कई सारे ऐसे कलाकार जो इसे छोड़कर दूसरे कामों में लग गए थे वे अब वापस आ रहे हैं.

प्रोजेक्ट विरासत के तहत तराशे गए बर्तन . (फोटोः एनॉक्टस एसआरसीसी)
वीडियो देखें: देश के सभी प्राइमरी स्कूलों को ऐसी टीचर मिल जाए तो उनकी तस्वीर बदल जाएगी










