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अबकी बार कड़ाके की सर्दी पड़ेगी, मौसम विभाग ने चेता दिया है!

'ला नीना' का सर्दी पर क्या असर होता है, ये भी समझ लीजिए.

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मौसम विभाग का कहना है कि इस बार सर्दी अधिक पड़ेगी. (सांकेतिक फोटो-पीटीआई)
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, IMD ने बुधवार, 14 अक्टूबर को कहा कि इस साल सर्दी अधिक पड़ने की संभावना है. मौसम विभाग के डीजी मृत्युंजय महापात्रा ने कहा कि इस बार पहले के मुकाबले अधिक सर्दी पड़ेगी. इसका मुख्य कारण 'ला नीना' कंडिशन है. महापात्रा ने कहा,
कमजोर नीना हालत के कारण हम इस साल और अधिक ठंड की उम्मीद कर सकते हैं. भारत में मौसम के रुख को तय करने में 'अल नीनो' और 'ला नीना' की स्थिति एक प्रमुख भूमिका निभाती है. 'ला नीना' की स्थिति शीतलहर के लिए अनुकूल है, जबकि 'अल नीनो' की स्थिति इसके लिए प्रतिकूल होती है. 
महापात्र ने कहा कि ठंड की वजह से सबसे ज्यादा मौतें राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार में होती हैं. उन्होंने कहा कि हर साल नवंबर में मौसम विभाग आधिकारिक तौर पर सर्दियों का पूर्वानुमान जारी करता है.

'ला नीना' क्या है 

दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर दो देश हैं- पेरू और इक्वाडोर. यहा के तटों पर दक्षिण से उत्तर की ओर हम्बोल्ट नाम की ठंडी जलधारा बहती है. ऊपर से भूमध्य रेखा से एक गर्म जलधारा आकर मिलती है. सामान्य परिस्थितियों में जब धारा ठंडी रहती है, तो एक साइकिल चलती है. ये ठंडी धाराएं प्रशांत महासागर के पश्चिमी तट यानी कि ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट, फिलिपींंस आदि तक जाती हैं और वर्षा कराती हैं. लेकिन अक्सर पांच या छह साल में किन्हीं कारणों से गर्म जल की धाराएं आकर ठंडी जल धाराओं को हटा देती है. इससे वहां का तापमान बढ़ जाता है. तीन से चार डिग्री सेल्सियस. तापमान बढ़ने की इस प्रक्रिया को 'अल नीनो' कहते हैं. ये दिसंबर के आसपास शुरू होता है. 'अल नीनो' जब आता है, तो पेरू के आसपास भारी वर्षा कराता है, जिससे यहां से ऑस्ट्रेलिया की ओर गुजरने वाली व्यापारिक पवनों में पर्याप्त नमी की कमी हो जाती है. 'अल नीनो' का ठीक उल्टा 'ला नीना' होता है. यानी पेरू में ठंडी जलधारा सही से बहेगी, तो ऑस्ट्रेलिया और फिलिपींस में अच्छी बारिश होगी. भारत में आने वाली मॉनसूनी जलधारा ऑस्ट्रेलिया से होकर आती है. कोरल इफेक्ट की वजह से भूमध्य रेखा से घूमकर भारत में आकर बारिश कराती है. इसकी वजह से मॉनसून अच्छा रहता है. यहां भी जमकर बारिश होती है.

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