पूरी दुनिया में मुसलमानों को शक की निगाहों से देखने का चलन हाल के सालों में बहुत ज़्यादा बढ़ा है. ख़ास तौर से पश्चिमी देशों में एक अजीब तरह की नफ़रत बड़े संगठित तरीके से फैलाई जा रही है. जहां एक तरफ अतिवादी मुस्लिम ग्रुप्स ने हैवानियत का नंगा नाच दिखाते हुए इस्लाम के शांति का मज़हब होने के दावों के परखच्चे उड़ा दिए हैं, वहीं इस खूंरेज़ी का विरोध करती मुस्लिम अवाम की आवाज़ को स्पेस ना देकर मीडिया ने भी इस पूर्वाग्रह को पनपने में हद से ज़्यादा मदद की है. ऐसी ही एक घटना हाल के दिनों में हुई, लेकिन जिसकी चर्चा कहीं नहीं थी.
पिछले रविवार और सोमवार को कर्बला में लाखों की संख्या में निकले अर्बाइन जुलूस का ज़िक्र मुख्यधारा की मीडिया से नदारद होना खटकता भी है और चिंता भी पैदा करता है. आख़िर क्या वजह है जो मुसलमानों का एक साहसिक कदम यूं नज़रअंदाज़ किया गया! विश्वपटल पर अलग-थलग होती जा रही मुस्लिम बिरादरी की ऐसी किसी सकारात्मक पहल को अगर यूं ज़ाया जाने दिया गया तो आतंक के खिलाफ़ लड़ाई में समूची दुनिया कमज़ोर ही रहेगी.
हर साल इमाम हुसैन की शहादत का शोक मनाने के आखिरी यानी चालीसवें दिन कर्बला में इस अर्बाइन जुलूस का आयोजन होता है. जहां दुनिया भर से शिया मुसलमान इकठ्ठा होते हैं और अपनी संवेदनाएं प्रकट करते हैं. पिछले कुछ सालों में इस आयोजन को ISIS के विरोध के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. जबसे ISIS ने शिया मुसलमानों के साथ एक ज़हरीली विचारधारा के तहत कत्लेआम का सिलसिला शुरू किया तबसे इस आयोजन पर हमेशा से ख़तरे के बादल मंडराते हैं. इसके बावजूद भी लोग ना सिर्फ घर से निकले बल्कि बड़ी संख्या में निकले. लाखों लोगों ने इस आयोजन में बिना ख़तरे की परवाह किए हिस्सा लिया. बच्चे, बूढ़े,औरतें सभी ने. और ये तब जब महज़ एक हफ्ते पहले ही कर्बला के पास ISIS के सुसाइड बॉम्बर हमले में लगभग अस्सी लोगों की मौत हो गई थी.
जिस जगह मौत मंडरा रही हो, कब किसी कोने से निकल कर कोई आप पर हमला कर दे इसका भरोसा न हो, ऐसी जगह बड़ी संख्या में इकट्ठा होना दर्शाता है कि मुसलमानों का एक विशाल वर्ग खूंरेज़ी के इस खेल से आज़िज़ आ चुका है और अपना विरोध दर्ज कराना चाहता है. चाहे जिस तरह हो. ऐसे में मेनस्ट्रीम मीडिया का फ़र्ज़ बनता है कि वो उनकी आवाज़ बने.
हमेशा स्याह पहलू दिखाने वाले सफ़ेद को भी देखें. आतंकवादी घटनाओं में मुसलमानों की शिरकत की खबरें जिस दिलचस्पी से दिखाई-पढ़ाई जाती हैं उसी दिलचस्पी से मुसलमानों द्वारा की जा रही मुखालफ़त को भी दिखाया जाए. ये फ़र्ज़ है मीडिया का. अपने पेशे के प्रति भी और मनुष्यता के लिए भी.