मामला क्या है?
इंडिया टुडे से जुड़े आशीष पांडेय की रिपोर्ट के मुताबिक मामला 16 सितंबर 2019 का है. उस दिन हैदराबाद में मुरली कुमार नाम का एक छात्र शहर के एक पिज्जा आउटलेट पर गया था. उन्होंने पिज्जा टेकअवे का ऑर्डर दिया था. मतलब पैक करा के साथ ले जाने वाला ऑर्डर. ये तो आप जानते ही हैं कि आजकल शॉपिंग वगैरा के दौरान ब्रैंड नेम वाले बैग्स के लिए कंपनियां पैसा लेती हैं. सो मुरली से भी लिए गए.हालांकि मुरली कुमार का कहना था कि वो पिज्जा कंपनी के ब्रैंड नेम वाला प्लास्टिक कैरी बैग नहीं खरीदना चाहते थे, आउटलेट ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया. छात्र के मुताबिक आउटलेट ने 7.62 रुपये में उसे कैरी बैग दिया.
बस इसके बाद आउटलेट की उपभोक्ता फोरम पर वाट लग गई. मुरली ने शिकायत दर्ज कराई कि उन्हें कैरी बैग खरीदने के लिए फोर्स किया गया, जबकि वो उसे नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने उपभोक्ता फोरम में पिज़्ज़ा आउटलेट द्वारा उत्पीड़न का आरोप लगाया. फोरम के सामने उन्होंने दावा किया कि उन्हें पहले से इस बात की जानकारी नहीं थी कि कैरी बैग प्लास्टिक का है और उस पर कंपनी का लोगो छपा हुआ है. उन्होंने इसे तब देखा जब आर्डर उस लोगो वाले कैरी बैग के साथ पैक हो गया, जिसकी कीमत 7.62 रुपये थी.
मुरली के मुताबिक इसके बाद उन्होंने आउटलेट से एक सादा कैरी बैग देने का अनुरोध किया, लेकिन उन्हें ऐसा कोई बैग नहीं दिया गया और कैरी बैग खरीदने के लिए मजबूर किया गया.
सांकेतिक तस्वीरफोरम ने क्या कहा?
हालांकि आउटलेट ने मुरली कुमार के सभी दावों और आरोपों से इनकार कर दिया था. लेकिन दो साल के लंबे वक्त के बाद फोरम ने मुरली के पक्ष में फैसला सुनाया और पिज्जा आउटलेट वालों को मुरली को 11 हजार रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया. फैसला देते हुए फोरम की पीठ ने कहा कि पिज्जा आउटलेट वालों को ग्राहकों से कंपनी लोगो वाले बैग की लागत नहीं वसूलनी चाहिए. ये भी कहा कि कंपनी ग्राहक को अपनी विज्ञापन एजेंसी के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकती.(ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहीं आरुषि ने लिखी हैं.)













