"इराक में युद्ध एक बहुत बड़ी गलती है… हमने दो ट्रिलियन डॉलर खर्च किए, हजारों जानें (गईं)." अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में यह बयान देकर पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को घेरा था. उन्होंने बुश पर 2001 में न्यूयॉर्क पर हुए 9/11 के आतंकवादी हमलों के नतीजों से निपटने में नाकाम रहने का आरोप लगाया था. उन्होंने अमेरिकियों को उम्मीद दी थी कि उनकी लीडरशिप में अमेरिका बाहरी देशों में दखल देकर अपना वक्त और पैसा बर्बाद नहीं करेगा.
दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका 42 साल में 8 देशों पर चढ़ाई कर चुका है
America Attacked Countries: Venezuela पर हमले के बाद एक बार फिर उन देशों की चर्चा होने लगी है, जो कभी ना कभी अमेरिकी दखल का शिकार बने हैं. दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद से कई देशों को अमेरिकी हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा है.


ट्रंप ने 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा दिया. अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का फैसला किया. ईरान के साथ परमाणु संधि तोड़ी. माने, बस अमेरिका ही अमेरिका. लेकिन, यही वे ट्रंप हैं, जिन्होंने 2017 में अमेरिकी सेना को लीबिया में एयरस्ट्राइक करने का आदेश दिया था. इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) और अल कायदा के ठिकानों पर ये हमले किए गए थे.
ट्रंप का भय खुला. बाद में उनके निशाने पर पाकिस्तान और सीरिया में पनप रहे अमेरिकी खतरे आए. उनके शासन में इन दोनों देशों में अमेरिका ने हमले किए. अब अमेरिका के लिए यह नई बात थोड़ी है. अमेरिका पर तो लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वो शांति के नाम पर दूसरे देशों में दखल देता और हमले करता है. कुछ देशों में तो सरकार तक बदल देता है.
अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला करके उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर लिया है. ऐसे में एक बार फिर उन देशों की चर्चा होने लगी है, जो कभी ना कभी अमेरिकी सैन्य दखल का शिकार बने हैं.
पहले और दूसरे वर्ल्ड वॉर के दौरान दुनिया ने अमेरिका की ताकत देखी. उसके बाद भी कई देशों को अमेरिकी आक्रामकता का सामना करना पड़ा. लेकिन क्यों? वही, लोकतंत्र की बहाली, साम्यवाद का खात्मा, आतंकवाद, शांति, स्थिरता वगैरह. ये सभी शब्द अलग-अलग देशों पर अमेरिकी हमलों के पीछे का कारण बताने में फिट हो सकते हैं.
इन देशों पर अमेरिका ने सीधा हमला किया
1983: ग्रेनेडा
1983 में अमेरिकी सेना ने ग्रेनेडा में सैन्य हस्तक्षेप किया, जिसे 'ऑपरेशन अर्जेंट फ्यूरी' कहा गया. इसका मकसद एक कथित क्यूबा समर्थित सरकार को उखाड़ फेंकना था. प्रधानमंत्री मौरिस बिशप की हत्या कर दी गई थी, जिसके जवाब में यह ऑपरेशन शुरू हुआ.
अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के चलते रिवॉल्यूशनरी मिलिट्री काउंसिल के प्रमुख हडसन ऑस्टिन को सत्ता से हटा दिया गया. उनकी जगह निकोलस ब्रैथवेट को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया.
1989: पनामा
1989 में अमेरिका ने पनामा पर सैन्य हमला किया. इसे 'ऑपरेशन जस्ट कॉज' कहा गया. इसका मकसद पनामा के तानाशाह मैन्युएल नोरिएगा को सत्ता से हटाना था और पनामा में अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था. अमेरिकी सेना ने सफलतापूर्वक नोरिएगा को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया था.
1991: इराक (पहला खाड़ी युद्ध)
1990 में इराक ने कुवैत पर आक्रमण करके कब्जा कर लिया. फिर 1991 में अमेरिका ने एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के तहत इराक पर सैन्य हमले शुरू किए. यह ऑपरेशन 'ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म' के नाम से जाना गया. इसके तहत कुवैत को इराकी कब्जे से आजाद कराया गया.
1999: यूगोस्लाविया (कोसोवो युद्ध)
1991 में कोसोवो में आजादी के पक्ष में रिफ्रेंडम हुआ. यूगोस्लाविया ने नहीं माना. उस समय के फेडरल रिपब्लिक ऑफ यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविक ने कोसोवो के अल्बानियाई लोगों पर कड़ी कार्रवाई की.
कोसोवो के अल्बानियाई लोगों के खिलाफ जातीय जुल्म को देखते हुए 1999 में अमेरिका ने नाटो के साथ मिलकर फेडरल रिपब्लिक ऑफ यूगोस्लाविया के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन चलाया. युद्ध के बाद कोसोवो संयुक्त राष्ट्र के अधीन आ गया.
फेडरल रिपब्लिक ऑफ यूगोस्लाविया 2003 में स्टेट यूनियन ऑफ सर्बिया और मोंटेनेग्रो बना. 2006 में सर्बिया और मोंटेनेग्रो अलग होकर आजाद देश बने. 2008 में कोसोवो ने भी खुद को आजाद घोषित कर दिया, जिसे अमेरिका और कई पश्चिमी देशों ने मान्यता दी. हालांकि, सर्बिया आज भी उसे अपना हिस्सा मानता है. भारत ने कोसोवो को मान्यता नहीं दी है.
2001: अफगानिस्तान
9/11 के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका ने 2001 में अफगानिस्तान में 'ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम' शुरू किया. इसके तहत तालिबान सरकार और अल-कायदा पर हमले किए गए. 2001 में अमेरिका ने मु्ल्ला उमर की तालिबानी सरकार को उखाड़ फेंका. हालांकि, अगस्त 2021 में तालिबान फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया.
2003: इराक (दूसरा खाड़ी युद्ध)
2003 में अमेरिका ने इराक पर फिर से हमला बोला. इसे 'ऑपरेशन इराकी फ्रीडम' कहा गया. इसका मकसद सद्दाम हुसैन की सरकार को हटाना था, जो अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन (WMDs) यानी सामूहिक विनाश के हथियार विकसित कर रहा था.
बगदाद की गद्दी से सद्दाम को तो अमेरिका ने हटा दिया, लेकिन WMDs हथियार मिलने की पुष्टि नहीं हुई. सद्दाम हुसैन को 1982 में दुजैल शहर में 148 विरोधियों की हत्या के जुर्म में इराक की एक अदालत ने नवंबर 2006 में मौत की सजा सुनाई थी. 30 दिसंबर 2006 को सद्दाम को फांसी दी गई.
2011: लीबिया
2011 में अमेरिका और नाटो ने लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप किया, जहां तत्कालीन शासक मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ संघर्ष चल रहा था. 20 अक्टूबर 2011 को सिर्ते में गद्दाफी की हत्या कर दी गई. दावा किया जाता है कि विद्रोहियों ने उनकी हत्या की.
2025: ईरान
बीते साल अमेरिका ने अयातुल्ला खामेनेई शासित ईरान को निशाना बनाया. जब ईरान, इजरायल पर ताबड़तोड़ मिसाइलें दाग रहा था, तो अमेरिका को बीच में कूदना पड़ा. 22 जून 2025 को यूनाइटेड स्टेट्स एयर फोर्स और नेवी ने 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' के तहत ईरान में तीन न्यूक्लियर फैसिलिटी- फोर्डो, नतांज और इस्फहान पर हमला किया.
अमेरिका ने तीनों न्यूक्लियर ठिकाने तबाह करने का दावा किया. ईरान ने भी तीनों साइट पर हमले की पुष्टि की, लेकिन यह भी कहा कि उसने संवर्धित यूरेनियम को पहले ही सुरक्षित जगह पर पहुंचा दिया था.
वीडियो: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस की पूरी कहानी











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