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सर्फ़ एक्सल का ऐड पसंद करने वाले उसमें ये कमियां नहीं देख पाए!

सर्फ़ एक्सल का ये ऐड कतई नहीं बनना चाहिए था.

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फोटो - thelallantop
सर्फ़ एक्सल के ऐड से लोगों को दिक्कतें हैं. होनी भी चाहिए. यहां किसी चीज पर दिक्कत न हो तो बड़ी दिक्कत होगी. फिर लोग रोजगार वगैरह की मांग करने लगेंगे. बेहतर है कि वो सर्फ़ एक्सल ऐड जैसे जरूरी मुद्दों पर कुकुरझांव करें. 7-8 साल के बच्चों में लव जिहाद जैसी चीजें खोज कर उसी पर रेलमपेल लगे रहें. मुझे भी ऐड बुरा लगा है. वाकई बहुत बुरा लगा है. ये कैसा ऐड है जिसमें अमिताभ बच्चन नहीं हैं. इस ऐड को बायकॉट होता देख पता चला कि चुनाव शुरू हो चुका है. लोगों ने अपने डिटर्जेंट पाउडर चुनना शुरू भी कर दिया है. मुझे जो सबसे बड़ी प्रॉब्लम लगी इस ऐड में कि ये पूरी तरह लॉजिक को खूंटी पर टांगकर बनाया गया है. क्या क्या गलती से मिस्टेक्स हुई हैं, प्वाइंट्स में जान लो.
1. रंग खतम नहीं होता
रंग दिवाली का पड़ाका तो है नहीं जो महंगा मिले. हजार- दो हजार का पड़ाका फुंक जाता है, बच्चे शांत हो जाते हैं. होली के रंगों के साथ ये नहीं होता. न होली खेलने वाले बच्चे इतने शांत चित्त होते हैं. उनका रंग इतनी आसानी से खतम नहीं होता. हो भी जाता है तो वो पानी भर भर मारने लगते हैं. हमने खेली है, हमको पता है. तो भैया खतम होने का तो बोलो ही मत.
रंग खतम
रंग खतम

2. रंग एक्सचेंज होता है
ऐड में दिखाया कि लड़का आकर साइकिल पर खड़ा हो जाता है और लड़की के कंधे पर हाथ रखकर मस्जिद तक जाता है. वो बच्ची इतना सारा कलर पोते हुए है कि उससे पांच इंच दूर से निकले कोई तो उसको भी रंग लग जाए. लेकिन ये सफेद कुरते पाजामे वाला चमत्कारी बच्चा बिना रंग का एक कतरा छुए नमाज़ पढ़ने चला जाता है. थोड़ा दिमाग लगाओ यार.
on cycle

3. खटारा साइकिल खतरनाक होती है
लड़का साइकिल पर खड़ा होकर सफर कर रहा है. साइकिल पर करियर छोड़ो, मडगार्ड भी नहीं है. पूरी रोड रंग, कीचड़ और पानी से भरी होगी. लेकिन साइकिल पर खड़े बालक के गंदगी छू नहीं गई. जनता को छुच्छू समझ रखा है क्या?
देखो देखो साइकिल की हालत देखो
देखो देखो साइकिल की हालत देखो

4. होली में रंगे कपड़े धोए नहीं जाते
इस ऐड की बुनियाद ही हिली हुई है. होली में रंग से भीगे कपड़े धोए नहीं जाते. वो पेड़ों पर टांग दिए जाते हैं. हमारे यहां तो कपड़ा फाड़ होली होती है. उसमें तो कपड़े बचते ही नहीं धोने के लिए. फिर भी जो धोते हैं उन मक्खीचूसों को होली खेलना आता नहीं. होली के लिए अलग से कपड़े निकालकर रखे जाते हैं. जिनको होली के दिन बरबाद करने के लिए ही पहना जाता है. और जब वो कपड़े धोने ही नहीं हैं, उनको दाग मिटाने ही नहीं हैं तो दाग अच्छे हों या गंदे. वाशिंग पाउडर सर्फ एक्सल हो या घड़ी घंटा, क्या फर्क पड़ता है यार.
होली खेलने के बाद किसी को कपड़ों की फिक्र नहीं रहती.
होली खेलने के बाद किसी को कपड़ों की फिक्र नहीं रहती.

इतना लिख गया तो ध्यान आया कि यार इस पर तो पड़ताल होनी चाहिए थी. लेकिन नहीं की ये भी अच्छा किया. जब इतने लोग सर्फ एक्सल को धो रहे हैं तो हम किसी कमजोर को कोप का भाजन क्यों बनाएं आंय?


अब एक वीडियो भी देखनाइच पड़ेगा. अच्छा लगे तो औरों को भी दिखाना.

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