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ये औरतें मॉब लिंचिंग करने वालों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा हैं

एक हिन्दू औरत, एक मुसलमान. इन दोनों ने जो किया, वो हमारा सिर ऊंचा कर देगा.

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Credit: Reuters
मेरे मन में अक्सर ख्याल आता है कि हर बड़ी लड़ाई आदमियों की क्यों होती है. औरतों के बीच कोई वर्ल्ड वॉर क्यों नहीं हुई. या कभी सुना हो कि दो देशों की औरतें आपस से जूझ गईं ज़मीन के किसी हिस्से को लेकर. औरतें 'कमज़ोर' होती हैं इसलिए तो नहीं? मुझे तो लगता है कि उनके पास टाइम ही नहीं होता लड़ने का. वो घर-मोहल्ले की छोटी-मोटी लड़ाइयों में ही अपना 'फ्रशटेशन' निकाल लेती हैं. औरतों की दुनिया अब भी बहुत हद तक उनके अपनों तक सिमटी है. ये बात कई बार बहुत कुछ अच्छा कर जाती है. ऐसा ही कुछ हुआ है मेरठ में.
जहां झुमका गिरना आम बात है, उसी बरेली से 49 साल की सरोज मेरठ के एक निजी अस्पताल पहुंचीं. उसके पति जूनियर इंजीनियर लाल करन को किडनी दान करने. लाल करन एक लोकल बिजली विभाग में काम करते हैं.
50 साल की सायरा बानो जो अमरोहा से हैं, वो भी उसी अस्पताल में पहुंचीं अपने पति को किडनी देने के लिए.
दोनों के पति को एक जैसी समस्या थी. दोनों की किडनियां फेल हो चुकी थीं. औरतों ने अपने-अपने पति को किडनी दान करने की सोची.
सरोज, अपने परिवार के साथ. Credit: Mail today
सरोज, अपने परिवार के साथ. Credit: Mail today
मेल टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सरोज ने बताया कि, मेरा ब्लड ग्रुप मेरे पति से और सायरा का ब्लड ग्रुप उसके पति से मैच नहीं कर रहा था. बार-बार अस्पताल में मिलने से सायरा और सरोज दोस्त बन गए थे. सायरा ने बताया कि हमने अच्छे काम के लिए किडनियां बदलने का फैसला किया. सरोज की बहू शिवांगी ने बताया कि इस फैसले के बाद हम डॉक्टर की राय लेने अस्पताल गए. और इसके बाद हमें सरकार की सहमति का इंतज़ार था.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2 लाख लोग किडनी के लिए बाट जोह रहे हैं और 30000 लोगों को लिवर दान करने वालों का इंतजार है.
एरिया डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट राघवेंद्र विक्रम सिंह ने कहा कि हमने स्टेट ह्यूमन ऑर्गन ट्रांसप्लांट अथॉरिटी (SHOTA) को रिपोर्ट भेजी. सरकारी आदेश मिलने के बाद उसी अस्पताल में दोनों किडनी ट्रांसप्लांट किए गए. सायरा के शौहर असलम ने सरोज का शुक्रिया अदा किया,
मैं ठेकेदार हूं और सरोज जी का आभारी हूं कि वो इस ट्रांसप्लांट के लिए राज़ी हो गईं और मेरी ज़िंदगी बचा ली.

नहीं करते अंगदान

विशेषज्ञों का मानना है कि कई लोग धर्म की आस्थाओं की वजह से अंगदान करना नहीं चाहते. उन्हें लगता है कि पता नहीं किसी दूसरे के शरीर का अंग हमारे शरीर पर क्या असर डालेगा. लेकिन उत्तर प्रदेश की दो औरतों ने न धर्म सोचा न किसी अंधविश्वास पर ध्यान दिया. उनका मक़सद सिर्फ जान बचाना था.
ये वही उत्तर प्रदेश है जहां दादरी का एक बुज़ुर्ग पीट-पीट कर मार डाला जाता है. क्योंकि उसके फ्रिज़ में कहने को बीफ़ रखा था. ये वही उत्तर प्रदेश है जहां मुजफ्फरनगर दंगों में 40 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. न जाने कितने बेघर हो गए थे. त्योहार में घर जा रहे किसी बच्चे को मार देने या दो मासूम बच्चों को ज़िंदा जला देने से क्या मिलता होगा ये वो ही जानें जो ये सब कर पाने की 'हिम्मत' जुटा पाते हैं.
सरोज और सायरा को क्या मिला ये उनका परिवार ही जानता है. किसी की जान बचा पाना या किसी को नई ज़िंदगी दे पाना बहुत मुश्किल काम है. सबके हिस्से में ये नेमत नहीं आती.


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