अमेरिका ने जब ईरान पर हमला किया, तो उसने इसका सबसे बड़ा कारण न्यूक्लियर खतरा बताया था. अमेरिका शुरू से कह कहा है कि वो ईरान का 'एनरिच्ड यूरेनियम' हासिल करके रहेगा. लेकिन भले ही अमेरिका ईरान के साथ उसके एनरिच्ड यूरेनियम को सौंपने का कोई समझौता कर ले, लेकिन उस मैटेरियल को ईरान से बाहर निकालना, इस पूरी कवायद का मुश्किल काम साबित हो सकता है. क्योंकि इसमें जरा सी चूक न सिर्फ जानलेवा होगी, बल्कि ये पूरे वेस्ट एशिया को मुसीबत में डाल सकती है.
US यूरेनियम को पहले निकाल चुका है, पर ईरान से निकालने में पसीना नहीं, उसका खून छूट जाएगा!
Iran का Uranium Enriched है. इसका अधिकतर हिस्सा सिलेंडरों के अंदर स्टोर किया गया है. एक्सपर्ट कहते हैं कि टीमों को सबसे पहले यह जांच करनी होगी कि क्या वो सिलेंडर सुरक्षित हैं? अगर हमले में उन्हें नुकसान पहुंचा है, तो इससे रेडिएशन का खतरा काफी बढ़ जाता है. अगर वो सुरक्षित भी हैं तो भी उन्हें लेकर जाना आसान नहीं है.


वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूरेनियम को हैंडल करने की समस्या केवल राजनीतिक नहीं है. यह पूरी तरह से एक लॉजिस्टिकल, तकनीकी समस्या है. अगर ईरान का यूरेनियम अमेरिका को मिल भी गया, तो उसे हैंडिल करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी. जरा सी लापरवाही की भी गुंजाइश नहीं है. हालांकि ईरान के नेता ये लगातार कह रहे हैं कि वो किसी भी हाल में अपना एनरिच्ड यूरेनियम अमेरिका को नहीं देंगे.

यूं तो ईरान में कई ऐसी जगह हैं, जहां उसके परमाणु ठिकाने हैं. लेकिन माना जाता है कि ईरान का अधिकतर यूरेनियम इस्फहान और नतान्ज जैसी जगहों पर रखा है. पिछले कुछ महीनों में, अमेरिका और इजरायल ने इन दोनों जगहों पर हमले किए हैं. इन हमलों से हुए नुकसान की वजह से, अब वहां पहुंचना मुश्किल हो गया है. ईरान ने अपनी न्यूक्लियर साइट्स को जमीन के नीचे बनाया है. इन ठिकानों पर सुरंगों का एक जाल है. लेकिन कई बार की बमबारी ने सुरंगों के दरवाजों को और मजबूत बना दिया है, या फिर उन्हें मिट्टी से ढक दिया है. अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों के लोग पिछले कई महीनों से इन जगहों पर नहीं जा पाए हैं. आसान भाषा में कहें, तो इन ठिकानों पर रखे यूरेनियम को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना ही मुश्किल नहीं, बल्कि वहां तक पहुंचना भी बहुत मुश्किल है.
जिस यूरेनियम की बात हो रही है, वो साधारण नहीं बल्कि एनरिच्ड यूरेनियम है. इसका अधिकतर हिस्सा सिलेंडरों के अंदर गैस रूप में स्टोर किया गया है. एक्सपर्ट कहते हैं कि टीमों को सबसे पहले यह जांच करनी होगी कि क्या वो कंटेनर सुरक्षित हैं? अगर हमले में उन्हें नुकसान पहुंचा है, तो इससे रेडिएशन का खतरा काफी बढ़ जाता है. न्यूक्लियर साइट्स पर पड़े मैटेरियल का आंकलन करने और उसे निकालने के लिए रिमोट से चलने वाले टूल्स और रोबोट जैसे कई स्पेशल एक्विपमेंट्स की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे मिशंंस में हफ्ते लग जाते हैं. और किसी हमले के बाद, जब न्यूक्लियर साइट्स पर मलबा बिखरा पड़ा तो ये काम और मुश्किल हो जाता है.

वैसे देखा जाए तो किसी भी समय, यूरेनियम को ट्रांसपोर्ट करना एक बड़ी चुनौती है. और अभी तो जंग का माहौल है. ऐसे में ये खतरा और बढ़ जाता है. इससे पहले 90 के दशक में कजाकिस्तान से हथियार-ग्रेड यूरेनियम को हटाने के लिए अमेरिका ने मिशन लॉन्च किया था. तब के मिशन ऐसी परिस्थितियों में किए गए थे, जब सब कुछ कंट्रोल में था. लेकिन ईरान का मामला कहीं अधिक जटिल है. इसे निकालने से पहले अमेरिका को सुरक्षा, एयर ट्रैफिक की व्यवस्था और मैटेरियल के उजागर होने के खतरों को ध्यान में रखना होगा.
एक सवाल यह भी है कि यूरेनियम को जब्त किया गया, तो कहां भेजा जाएगा? ईरान ने इसे अमेरिका भेजने पर कड़ी आपत्ति जताई है. इसके अलावा रूस या कजाकिस्तान की फैसिलिटीज हैं, जहां पूरे मैटेरियल को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में पतला करके स्टोर किया जा सकता है.
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