'भीड़ द्वारा हत्या के सबसे ज्यादा मामले 2011 से 2013 के दौरान सामने आए. और तब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी. तब इस तरह के सवाल नहीं उठाए गए.'मीडिया से सवाल करते हुए अमित शाह बोले, 'आपके पास एक भी ऐसी घटना नहीं है, जिसमें गिरफ़्तारी न हुई हो. हर मामले में दोषियों पर कार्रवाई हुई है.' (ये भी पढ़िए : भीड़ ने महिला को पीटकर मार डाला, लोग हंसते रहे, वीडियो बनाते रहे ) एक के बाद एक कई बीफ की अफवाहों को लेकर भीड़ ने हत्याएं की हैं. 29 जून को ही झारखंड के रामगढ़ इलाके में मोहम्मद अलीमुद्दीन को भीड़ ने मार दिया. इन घटनाओं को लेकर ही सवाल पूछने पर अमित शाह ने मौतों का तुलनात्मक अध्ययन पेश किया. अमित शाह का कहना था,
'हाल में हुई घटनाओं की तुलना नहीं करना चाहता और न ही इनको कम करके आंकता हूं. मैं इस मामले में गंभीर हूं, लेकिन 2011, 2012 और 2013 में भीड़ द्वारा हत्या करने के सबसे ज्यादा मामले हुए.' शाह ने कहा कि हमारी तीन साल की सरकार में जितनी लिंचिंग की घटनाएं हुई हैं, उससे ज्यादा एक-एक साल में हुई है. मगर ये सवाल कभी नहीं उठा था.बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यह बातें गोवा में नगर निकायों और पंचायतों के प्रतिनिधियों के एक कार्यक्रम के दौरान कहीं. गोवा में बीफ बैन को लेकर भी उन्होंने जवाब दिया. किसी ने गोवा में बीफ को लेकर सवाल पूछ लिया तो अमित शाह बोले अच्छा मसला पूछ लिया, इसमें मीडिया के लिए रस है. शाह ने कहा, 'गोवा में जहां तक बीफ पर प्रतिबंध की बात है, तो इसे लागू करने वाली भाजपा नहीं है. गोवा में पहले से गौहत्या पर पाबंदी है. यह साल 1976 से है और यह तब हुआ था, जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन किसी ने कांग्रेस से सवाल नहीं पूछा.' अमित शाह के ये जवाब इस तरह के हैं, कि 84 में कहां थे. उस वक़्त कहां थे. उनके ये जवाब सुनकर ऐसा लगता है कि सवाल करना बंद कर दिया जाए. बस मीडिया उनका गुणगान करता रहे. कि रामराज्य आ रहा है. बीजेपी देश में बहार ला रही है. 'क्या', 'क्यों' और 'कैसे' शब्द उनके सामने नहीं दोहराए जाएं. जिस तरह से उन्होंने हत्याएं कर रही भीड़ पर जवाब दिया, उससे ऐसा मतलब निकलता है कि मीडिया को तब तक खामोश रहना चाहिए, जब तक उनके मुताबिक 2011, 12 और 13 से ज्यादा हत्याएं न हो जाएं. जब वो रिकॉर्ड टूट जाए. तब मीडिया सवाल उठाए. बाकी देश में बहार है. शाह का ये जवाब तो अपनी नाकामी को छिपाने वाला लगता है. अमित शाह जी आपका जवाब ये होना चाहिए था. हम इससे निपटने के लिए करेंगे या कर रहे हैं न कि ये तब सवाल क्यों नहीं पूछे. अगर ऐसे तुलना करेंगे तो वो विकास, वो रामराज कहां और कैसे आएगा, जो आपने चुनावी रैलियों में लाने का वादा किया था. डेटा वेबसाइट इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट की माने, तो मौत के आंकडें चौंकाने वाले हैं. इसके मुताबिक 2010 से 2017 के बीच गाय के नाम पर हुई हिंसा में निशाने पर आए लोगों में से 57% मुस्लिम हैं. हिंसा की घटनाओं में मारे गए 86% मुस्लिम थे. आठ सालों में ऐसी 63 घटनाएं हुईं, जिनमें 28 लोगों की जान ले ली गई. गाय के नाम पर होने वाली हिंसा के 97% मामले 2014 में नई सरकार बनने के बाद हुए हैं. ये आंकड़े 25 जून 2017 तक हुई हिंसा पर आधारित हैं.
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