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बंदे हैं हम उसके हमपे किसका जोर, भारत माता की जय का नहीं करेंगे शोर!

दारुल उलूम देवबंद की हिस्ट्री रिच है. उसे पढ़ने का मौका आ गया है. क्योंकि उसकी तरफ से फतवा आया है "मुसलमान भारत माता के नारों से अलग हों"

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फोटो - thelallantop
राष्ट्रभक्ति राष्ट्रीय समस्या हो रखी है. अपनी ढपली अपना राग वाला हाल है. नया स्टैंड आया है दारुल उलूम देवबंद का. स्टैंड नहीं जनाब फतवा. "मुसलमान भारत माता की जय के नारे से खुद को अलग करें." अब एक बार फिर सारी लड़ाई एक तरफ जय भारत माई एक तरफ होंगी.
दारुल उलूम देवबंद के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी बोले कि देश की आजादी में उलेमाओं का योगदान है. पूर्ण स्वराज आंदोलन की नींव इस मदरसे ने डाली. अब बताओ. इंसान ही इंसान को पैदा करता है. फिर धरती मां कैसे हुई? हमारा अल्लाह एक है. उसके अलावा हम किसी की पूजा नहीं करते. देश से प्यार है बेशक. लेकिन इबादत सिर्फ एक ईश्वर की.
कुछ दिन पहले एक फतवा और आया था इनका. कि मुसलमान इंडेपेन्स डे पर अपने घरों पर तिरंगा फहराएं. दारुल उलूम देवबंद क्या है दारुल उलूम देवबंद एक इस्लामिक स्कूल है. एशिया का सबसे बड़ा मदरसा. इसको विचारधारा कह सकते हो. देवबंद एक जगह का नाम है. जो पड़ती है यूपी में. सहारनपुर और मुजफ्फरनगर के बीच में. वहीं से दारुल उलूम अलख जगाए है. दुनिया भर में इस्लाम को उसके असली रूप में फैलाने के लिए.
Source: Wikipedia
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इस्लाम धर्म मानने वालों में दारुल उलूम देवबंद का अच्छा खासा दबदबा है. सुन्नी मुसलमानों के लिए गुरु का काम करता है.  दारुल उलूम के बिना देवबंद सिर्फ एक गांव होता. सिर्फ कुछ आदमजात आबादी का छोटा सा टुकड़ा. लेकिन इस मदरसे की वजह से दुनिया के बड़े हिस्से में इसका भौकाल है. अंधविश्वास, गंदी धार्मिक प्रथाओं, कुरीतियों को इस्लाम से निकालने का जिम्मा इसने ले रखा है. 30 मई सन 1866 में हाजी आबिद हुसैन और मौलाना कासिम नानौतवी ने इस मदरसे की नांव रखी. दारुल उलूम देवबंद की रिच हिस्ट्री सन 66 में जब ये मदरसा शुरू हुआ तो अंग्रेज बंपर बवाल काटे हुए थे. 1857 की क्रांति दबाई जा चुकी थी. लेकिन भारतीयों के उस प्रयास से दुश्मनी पाले अंग्रेज भरपूर ज्यादतियां कर रहे थे. उस वक्त दारुल उलूम देवबंद ने बड़ा जानदार काम किया. लोगों को एकजुट किया. कि वो धरम जाति की गांठें खोल खुले दिल से देश के लिए कुर्बानी दें. देशभक्ति का एकदम अलग माहौल तैयार किया. जिसमें एक हिंदुस्तानी सिर्फ हिंदुस्तानी था. बाकी धरम, फिरका सबका नंबर बाद में आता था.
एक थे मौलाना महमूद अल हसन. इसी मदरसे के टीचर थे. उनको शैखुल हिंद की उपाधि मिली हुई थी. शैखुल हिंद माने भारतीय विद्वान. ऐसे ही नहीं इतनी इज्जत मिली थी. अपनी कलम, ज्ञान और जिंदगी का इस्तेमाल उन्होंने गुलामी की बेड़ियां काटने के लिए किया. भारी दौड़ भाग की. अफगानिस्तान, टर्की, सऊदी अरब से लेकर मिस्र तक रपट मारी. अंग्रेजों की ज्यादती की कहानी हर जगह सुनाई और रिक्वेस्ट की कि इस लड़ाई में वो हिंदुस्तान का साथ दें. अपनी पॉलिटिकल स्किल का इस्तेमाल करते हुए ईरान और अफगानिस्तान को इस बात के लिए राज़ी किया कि वो टर्की की सेनाओं को अपनी जमीन से होकर भारत आने देंगे. जहां वो अंग्रेजों से लड़ेंगे.
मौलाना उबैदुल्ला सिंधी का नाम आता है. 1914 में अफगानिस्तान गए. अंग्रेजों के खिलाफ मूवमेंट जारी रखा. काबुल में रहते हुए हिंदुस्तान की आजाद सरकार बना दी. उसके राष्ट्रपति हुए राजा महेंद्र प्रताप.
Molana_Sindhi

ऐसी कितनी ही जानी अनजानी कहानियां हैं दारुल उलूम देवबंद की. जो ये दिखाती हैं कि हिंदुस्तान की आजादी में उसका बड़ा रोल था. आजादी के बाद भी इस्लाम से ढोंग पाखंड को काटने के लिए अच्छा काम कर रहा है. फतवा क्या है फतवा अरबी भाषा का शब्द है. इसका मतलब होता है राय. एक ओपीनियन. इसे जारी करने का हक शैखुल इस्लाम का होता है. माने इस्लाम का सर्टिफाइड जानकार. या फिर मुफ्ती. उसे मानना अनिवार्य है या नहीं ये जारी करने वाली संस्था पर डिपेंड करता है. लेकिन याद रहे कि फतवा सिर्फ राय है, जजमेंट नहीं. फिर भी फतवा जब निकलता है तो भैया बवाल मचता जरूर है.

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