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पारसी समुदाय में ऐसे होता है अंतिम संस्कार, गिद्धों के सामने रख दी जाती है डेड बॉडी

लेकिन साइरस मिस्त्री का अंतिम संस्कार पारंपरिक तरीके से क्यों नहीं हुआ?

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बीते 4 सितंबर को एक सड़क हादसे में साइरस मिस्त्री की मौत हो गई. (फोटो: सोशल मीडिया)

टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री (Cyrus Mistry) का मंगलवार, 6 सितंबर को अंतिम संस्कार किया गया. उनका अंतिम संस्कार मुंबई के वर्ली श्मशान घाट में हुआ. जब से वर्ली क्रिमेटोरियम खुला है, तभी से मुंबई के ज्यादातर पारसी मृतकों को पारंपरिक तरीके से ‘टावर्स ऑफ साइलेंस’ पर रखकर गिद्धों के हवाले करने की जगह ये विकल्प चुना जा रहा है.

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इससे पहले 4 सितंबर को एक सड़क हादसे में साइरस मिस्त्री की मौत हो गई थी. मिस्त्री के साथ उनके मित्र और जाने-माने बिजनेस पर्सन जहांगीर पंडोले की भी उसी सड़क हादसे में मौत हुई. साइरस मिस्त्री के पार्थिव शरीर को मंगलवार, 6 सितंबर की सुबह वर्ली श्मशान घाट ले जाकर अंतिम संस्कार किया गया. वहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक जहांगीर पंडोले का अंतिम संस्कार 6 सितंबर की शाम मालाबार हिल के डोंगरवाड़ी ‘टावर ऑफ साइलेंस’ में पारंपरिक पारसी तरीके से होगा.

क्या होता है 'टावर ऑफ साइलेंस'?

'टावर ऑफ साइलेंस' को आम भाषा में दखमा भी कहा जाता है. इसे पारसी समुदाय का कब्रिस्तान कह सकते हैं. ये गोलाकार खोखली इमारत के रूप में होता है. पारसी समुदाय किसी की मौत के बाद उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए 'टावर ऑफ साइलेंस' ले जाते हैं. यहां पार्थिव शरीर को रख दिया जाता है. 

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Yazd Tower of Silence, Iran
ईरान के याज्द प्रदेश में स्थित एक दखमा, अब इसका इस्तेमाल नहीं होता (फोटो: विकिपीडिया)
पारसियों में ये अंतिम संस्कार का पारंपरिक तरीका है

पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार का तरीका काफी अलग है. पारसी समुदाय में न तो पार्थिव शरीर को हिंदू धर्म की तरह अग्नि के हवाले किया जाता है और ना ही इस्लाम और ईसाई धर्म की तरह दफनाया जाता है. दरअसल, पारसी समुदाय के लोग पृथ्वी, जल और अग्नि को बहुत पवित्र मानते हैं. इसलिए समाज के किसी व्यक्ति के मर जाने पर उसकी देह को इन तीनों के हवाले नहीं करते. ऐसे में पार्थिव शरीर को 'टावर ऑफ साइलेंस' के ऊपर रख दिया जाता है. 

आजतक के शोएब राणा से बातचीत में जोरास्ट्रियन स्टडीज इंस्टिट्यूट के एक एक्सपर्ट ने बताया कि पारसी समुदाय में पार्थिव शरीर को सूरज की किरणों के सामने रख दिया जाता है, जिसके बाद उसे गिद्ध, चील और कौए खा लेते हैं. उन्होंने बताया कि पारसी धर्म में किसी पार्थिव शरीर को अग्नि के हवाले करना या दफनाना प्रकृति को गंदा करने जैसा माना जाता है. 

गिद्धों की कमी से पारसियों से परेशानी  

हालांकि, पारसी समुदाय के लोगों को एक नई परेशानी का सामना भी करना पड़ रहा है. दरअसल, भारत में गिद्धों की संख्या काफी कम हो गई है. शहरों में तो मुश्किल से ही कोई गिद्ध अब नजर आता है. ऐसे में पारसी समाज को अंतिम संस्कार के रीत रिवाजों को पूरा करने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

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रिपोर्ट के मुताबिक, एक पारसी पुजारी रमियार करनजिया कहते हैं कि गिद्ध तेजी के साथ इंसान का मांस खा जाते हैं. लेकिन अब गिद्ध न होने की वजह से इसमें काफी मुश्किल हो रही है. जो काम गिद्ध पहले कुछ घंटों में कर लेते थे, अब उसे होने में काफी दिन लग जा रहे हैं. इससे कई दिनों तक लाश सड़ती रहती है और दुर्गंध आने लगती है. 

गिद्धों की कमी की वजह से पारसी समाज नए साधनों पर टिकने को मजबूर है. देश के कई हिस्सों में शव को जल्दी गलाने के लिए पारसी लोग अब सोलर कंसंट्रेटर का सहारा भी ले रहे हैं. लेकिन ये तरीका परमानेंट नहीं है. 

शवों को जलाने लगे हैं कुछ पारसी लोग

हैदराबाद और सिकंदराबाद में पारसी अंजुमन के ट्रस्टी रहे और पेशे से सीए जहांगीर ने एक इंटरव्यू में बताया कि पिछले कुछ सालों में कुछ पारसी लोग अपने रिवाज को छोड़कर शवों को जलाकर अंतिम संस्कार भी कर रहे हैं. ये लोग शवों को अब ‘टावर ऑफ साइलेंस’ के ऊपर नहीं रखते हैं बल्कि हिंदू श्मशान घाट या विद्युत शवदाह गृह में ले जाते हैं.

वीडियो- दी लल्लनटॉप शो: हादसे के समय कार में पीछे बैठे थे साइरस मिस्त्री, फिर किस कारण से हुई मौत?

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