लॉकडाउन में शराब के लत वाले लोग लगातार नशा मुक्ति हेल्पलाइन में शरीर में आ रहे बदलावों की शिकायत कर रहे हैं. सांकेतिक फोटो. India Today
अल्कोहॉलिक. माने वो लोग, जिन्हें शराब की बुरी लत लग जाती है. जिन्हें शराब न मिले, तो हालत खराब हो जाए. ऐसा सिर्फ शराब के साथ नहीं, नशे की दूसरी चीज़ों- ड्रग्स, कोकेन, हेरोइन जैसी चीजों के साथ भी है. अल्कोहल की बात करें, तो लॉकडाउन में नशा मुक्ति हेल्पलाइन नंबर पर अल्कोहॉलिक लोगों के फोन बहुत आ रहे हैं. इसमें ड्रग्स वाले भी शामिल हैं. ये लोग शरीर में आ रहे बदलावों को लेकर शिकायत कर रहे हैं. 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के मुताबिक, इन कॉल्स में 200 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मिनिस्ट्री के मुताबिक, 15-21 मार्च के बीच टोल फ्री नंबर 1800110031 पर मार्च के अंत से 5 अप्रैल तक औसतन 266 कॉल प्रतिदिन आईं. 5 अप्रैल से 12 अप्रैल के बीच ये औसतन 236 रहीं, जबकि 15 मार्च से 21 मार्च के बीच औसतन 9 कॉल ही आई थीं.
क्या होते हैं Withdrawl Symptoms शराब मिल नहीं रही है. ऐसे में लत वाले लोग बेचैन हैं. उनके शरीर में कई तरह के बदलाव आ रहे हैं. इन बदलावों को 'विदड्रॉल सिम्प्टम्स' कहा जाता है. माने ऐसे लक्षण, जो शराब की तय मात्रा शरीर को न मिलने पर दिखते हैं. अल्कोहल नर्वस सिस्टम पर असर डालता है. लगातार अल्कोहल लेने से शरीर का नर्वस सिस्टम इसके मुताबिक एडजस्ट कर लेता है. अल्कोहॉलिक आदमी का ब्रेन नर्वस सिस्टम को डायरेक्ट करने में ज़्यादा मेहनत करता है. जब अचानक अल्कोहल लेवल गिरता है, तो ब्रेन को इसकी आदत नहीं होती. वो पहले की ही स्थिति में होता है. ऐसे में कुछ बदलाव आते हैं शरीर में. शरीर के ये बदलाव व्यक्ति की अलग-अलग क्षमता पर निर्भर करते हैं.
लक्षण और इलाज दिल्ली के एक नशा मुक्ति केंद्र के काउंसलर केपी सिंह कहते हैं,
इन लक्षणों में घबराहट होना, हाथ कांपना, सिर दर्द होना, मितली आना या उल्टी होना, नींद न आना, खूब पसीना आना जैसी शिकायतें होती हैं. सीरियस कंडीशन में अगर आदमी को दो दिनों तक अल्कोहल न मिले, तो उसे भ्रम होने लगते हैं. कुछ भी दिख सकता है. कुछ भी सुनाई दे सकता है.
वो कहते हैं,
अगर ये तीन से पांच दिन हो जाएं, तो ऐसी स्थिति आ सकती है, जिसे Delirium Temens (DT) कहते हैं. इसमें शरीर कांपना, कन्फ्यूजन, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट बीट बढ़ना, एंग्जाइटी, बुखार, भ्रम होते हैं. तब आदमी को इलाज की ज़रूरत होती है. इसके लिए रिहैबिलेशन करना होता है.
ज़्यादातर मामलों में ये समस्या मानिसक होती है. इसमें काउंसलिंग के लिए मनोचिकत्सक की भी ज़रूरत पड़ती है.
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