ज़्यादातर लोग बेहतर मौकों की तलाश में पलायन करते हैं. फिर चाहे बिहार से मुंबई आने वाला राजमिस्री हो. या मुंबई से अमेरिका जाने वाला आर्किटेक्ट. लेकिन अगर अमेरिका भी शिकायत करने लगे कि बाहर से आए लोग उनकी नौकरियां छीन लेते हैं, तो? अगर वो 'अमेरिकन्स फर्स्ट' कहकर बाहर के कामगारों पर पाबंदी लगा दे, तो? अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ऐसा ही एक ऐलान किया है. ये पूरा मामला क्या है? इससे किसको नुकसान होगा? इस ख़बर में यही बता रहे हैं हम आपको.
ट्रंप का फेवरिट- ट्वीट ट्वीट राष्ट्रपति ट्रंप का पसंदीदा प्लेटफॉर्म है ट्विटर. वो ख़ूब सक्रिय रहते हैं इसपर. कई बार बड़े-बड़े ऐलान सीधे यहीं कर देते हैं. 21 अप्रैल को भी उन्होंने ऐसा ही किया. सुबह के तकरीबन साढ़े सात बजे उनका एक ट्वीट आया. इसमें लिखा था-
अदृश्य दुश्मन (यानी कोरोना) द्वारा किए गए हमले और महान अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां बचाने के मद्देनज़र, मैं एक एक्ज़िक्यूटिव आदेश पर दस्तख़त करने जा रहा हूं. इसके द्वारा अमेरिका में होने वाले इमिग्रेशन पर फिलहाल रोक लगा दी जाएगी.नई दिल्ली और वॉशिंगटन डीसी की घड़ियां करीब साढ़े नौ घंटे आगे-पीछे हैं. यानी, ट्रंप ने 20 अप्रैल की रात 10 बजे ये ट्वीट करके अपनी गुडनाइट की. मगर उनके वक़्त से साढ़े नौ घंटे आगे चल रहे भारत में सुबह का मज़ा ख़राब कर दिया. इस मसले पर वाइट हाउस ने कोई ब्योरा नहीं दिया है. इस नियम की क़ानूनी वैधता क्या होगी. ये भी नहीं पता अभी.
एक शब्द है इमिग्रेंट्स. यानी, एक देश से दूसरे देश में जाने वाले. ये जाना अक्सर लंबे समय के लिए होता है. कभी कामकाज के लिए लंबे समय तक वहां रहना पड़ता है. तो कई लोग नागरिकता लेकर हमेशा के लिए वहां बस जाते हैं. एक देश से दूसरे देश जाने की प्रक्रिया इमिग्रेशन कहलाती है. रक्षा और आर्थिक नीतियों की तरह हर देश की अपनी एक इमिग्रेशन पॉलिसी भी होती है. कई बार जब सरकारें बदलती हैं, तो वो अपने हिसाब से इमिग्रेशन की नीतियां भी बनाती-बदलती हैं. जैसा कि ट्रंप के आने के बाद अमेरिका में हुआ.
एक त्वरित नियम भी था. इसके तहत ग़ैरकानूनी तरीके से अमेरिका में घुस आए लोगों को फौरन निकाल बाहर करने की व्यवस्था थी. मगर इसका इस्तेमाल कम ही होता था. इसके पीछे वजह थी अमेरिकी संविधान. जो कि किसी भी इंसान को ड्यू प्रोसेस का अधिकार देती है. ड्यू प्रोसेस, माने न्याय व्यवस्था के सामने अपनी बात रखने का अधिकार. आवेदन पर सुनवाई का अधिकार.
फिर 2014 में ओबामा प्रशासन ने ग़ैरक़ानूनी तरीके से रह रहे विदेशियों को वापस भेजने से जुड़े कुछ दिशानिर्देश जारी किए. इसमें आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों को निकाल बाहर करने पर फोकस था. मतलब ऐसे लोग, जिनसे अमेरिका और वहां रहने वालों की सुरक्षा पर ख़तरा हो सकता था.
ट्रंप द्वारा कई मुस्लिम बहुल देशों पर लगाए गए यात्रा प्रतिबंध की काफी आलोचना हुई. इस फैसले की कानूनी वैधता को चुनौती भी दी गई. मगर सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप को जीत मिली. ये सुप्रीम कोर्ट के बाहर इमिग्रेंट्स अधिकारों के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे अमेरिकियों की एक तस्वीर है (फोटो: AFP)ऐंड आफ्टर... जनवरी, 2017 को ट्रंप ने राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाला. वो सख़्त इमिग्रेशन नियमों की बात करते थे. आते के साथ उन्होंने अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी बदल दी. उनके सीधे निशाने पर थे इलिगल इमिग्रेंट्स. अपराधी हो या न हो. बालिग हो कि नाबालिग. अब किसी को कोई छूट नहीं थी. फिर चाहे वो सालों से अमेरिका में रह रहे इलिगल इमिग्रेंट्स हों. या युद्ध और हिंसा प्रभावित देशों से जान बचाकर आए शरणार्थी. ट्रंप ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर कई मुस्लिम आबादी वाले देशों पर यात्रा प्रतिबंध लगा दिया. अमेरिका के भीतर और बाहर काफी आलोचना हुई उनकी. मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा. जून 2018 में कुछ मामूली बदलावों के साथ ट्रंप की इस नीति को अदालत की भी हरी झंडी मिल गई.
एक बड़ा असर अमेरिका में रहकर काम करने वाले परदेसियों पर भी पड़ा. इसकी एक बड़ी वजह थी H-1B वीज़ा के बदले गए नियम. इस कैटगरी के वीज़ा की मदद से अमेरिकी कंपनियां स्पेशलाइज़्ड सेक्टर्स में विदेशी कामगारों की भर्ती कर पाती हैं. ये H-1B वीज़ा भारतीय IT क्षेत्र के लोगों, ख़ासतौर पर युवाओं के बीच बड़ा पॉपुलर था. ट्रंप की बदली नीतियों ने यहां भी वार किया. कागज़ी कार्रवाई और सख़्तियां भी बढ़ा दी गईं. H-1B वीज़ा पर रिजेक्शन रेट बढ़ गया. 2015 में भारतीय IT कंपनियों के H-1B वीज़ा आवेदनों पर रिजेक्शन रेट जहां छह फीसद था. वहीं 2018 में ये बढ़कर 24 पर्सेंट हो गया. पहले H-1B वीज़ा में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीयों के हिस्से जाता था. मगर पिछले कुछ सालों में इसमें काफी गिरावट आई है. ऐसी भी ख़बरें आईं कि इसमें भारतीयों का हिस्सा घटाकर 10 से 15 फीसद तक कर दिया जाएगा. भारत और अमेरिका में सरकारों की आपसी बातचीत में भी H-1B का मुद्दा कई बार उठ चुका है.
चाहे देश के अंदर दूसरे राज्यों से आए मज़दूरों-कामगारों को अपने अवसरों पर ख़तरा मानने वाले लोग हों. या डॉनल्ड ट्रंप. ये लोग भूल जाते हैं कि ग्लोबलाइज़ेशन सीमाओं के खुलने का सिस्टम है. चाहे बाज़ार हो. या फिर नौकरियों के मौके. एक सीमा से आगे बढ़कर जब आप अपने लोगों या अपने यहां बने सामान को 'प्रॉटेक्ट' करते हैं, तो गेम फेयर नहीं रह जाता.
जाते-जाते आपको एक कहानी सुनिए... कहानी, 16 साल के एक लड़के फ्रेडरिक की. जो सन् 1885 में पानी के एक जहाज में बैठकर जर्मनी से अमेरिका आया और वहीं बस गया. एक कहानी 18 बरस की मैरी की भी है. जो 1930 में स्कॉटलैंड से अमेरिका आई. अपनी उस बहन के साथ रहने, जो ब्याह करके अमेरिका में बस गई थी. 1936 में मैरी की शादी हुई फ्रेडरिक के बेटे फ्रेड से. मैरी और फ्रेड, इनके बेटे ने सालों बाद बड़ा नाम कमाया. वो अमेरिका का राष्ट्रपति बन गया. वो राष्ट्रपति, जो अमेरिका आने वाले विदेशियों को अमेरिकी आवाम के लिए ख़तरा बताने लगा. कहने लगा, अमेरिका फर्स्ट. क्या उस शख्स का नाम बताने की ज़रूरत है?
वुहान शहर के जिस लैब से कोरोना वायरस के निकलने की आशंका, वहां अमेरिका क्यों गया?














