
महेंद्र कर्मा के बेटे आशीष कर्मा दिल्ली मेें पढ़ाई कर रहे हैं.
क्यों दी गई नियुक्ति?
आशीष कर्मा दिवंगत कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के तीसरे बेटे हैं. 25 मई 2013 को बस्तर के जीरम घाटी में नक्सली हमला हुआ था. इस हमले में पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा के अलावा 29 और लोग मारे गए थे. इसमें 10 सुरक्षाकर्मी भी शामिल थे. उस वक्त की बीजेपी की सरकार ने सभी को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का फैसला किया था. ये मामला उसी वक्त से पेंडिंग चल रहा था.
लेकिन अनुकंपा के आधार पर सीधा डिप्टी कलेक्टर बनाए जाने पर कई लोगों ने नाराजगी जताई है. खुद कलेक्टर रह चुके और बीजेपी नेता ओपी चौधरी ने इस नियुक्ति को लाखों युवाओं के साथ अन्याय बताया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर कांग्रेस सरकार से सवाल करते हुए लिखा:
मैं महेन्द्र कर्मा का बहुत सम्मान करता हूं. कर्मा के बाद उनके परिवार से विधायक रहे, नगर पंचायत अध्यक्ष हैं, जिला पंचायत में भी प्रतिनिधित्व है, लोकसभा में भी उनके परिवार से चुनाव लड़ा गया. यह सब अपनी जगह है, लेकिन अब उनके एक पुत्र को कांग्रेस सरकार ने सीधा डिप्टी कलेक्टर बना दिया. कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि कर्मा परिवार को लोकसभा की टिकट की दावेदारी से रोकने के लिए कांग्रेस ने तुष्टिकरण का यह कदम उठाया है.यहां आपको जानकारी दे दें कि आशीष कर्मा के दोनों बड़े भाई और मां देवती कर्मा राजनीति में ऐक्टिव हैं. देवती कर्मा 2013 में विधायक बन गई थीं, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में वो हार गईं. खबरें ये भी है कि सरकार ने उनके परिवार के एक सदस्य को थर्ड ग्रेड की नौकरी ऑफर की थी, लेकिन उनके परिवार ने इसे लेने से मना कर दिया.
ओपी चौधरी ने सोशल मीडिया पर आगे लिखा:
यदि कर्मा होते तो शायद वो अपने बेटे को काबिलियत के आधार पर कलेक्टर या डिप्टी कलेक्टर बनाना पसंद करते न कि तुष्टिकरण की राजनीति के तहत. बेहतर होता कि कांग्रेस की सरकार तुष्टिकरण की राजनीति करके लाखों युवाओं के साथ अन्याय करने की बजाय कर्मा के परिवार की आर्थिक सुरक्षा हेतु अनुकंपा का कोई अन्य उपाय करती. इस परिवेश में मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें सार्वजनिक करना अपना धर्म समझता हूं.बीजेपी नेता ओपी चौधरी ने सरकार के इस फैसले पर 4 सवाल उठाए हैं-
1.इस बार छत्तीसगढ़ पीएससी परीक्षा में डिप्टी कलेक्टर के लिए सिर्फ 3 पद निकाले गए हैं. क्या ये फैसला उन लाखों युवाओं के साथ अन्याय नहीं है, जो सालों से प्रदेश के सर्वोच्च प्रशासनिक पद को अपनी योग्यता से प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं?
2.क्या झीरम कांड के अन्य शहीदों के परिवारों को कांग्रेसी सरकार के तुष्टिकरण के इस निर्णय से पीड़ा नहीं हुई होगी?
3.हजारों जाबांज जवान नक्सलियों से सीधे लड़ते हुए शहीद हुए हैं. उनके परिवारों को दर्द नहीं हो रहा होगा?
4.बस्तर के सभी दलों के सामान्य जनप्रतिनिधि और आम आदिवासी भाई-बहन हर रोज माओवादी हिंसा से प्रभावित हो रहे हैं. दंतेवाड़ा के एजुकेशन सिटी के आस्था गुरुकुल में नक्सल हिंसा से अनाथ हुए सैकड़ों आदिवासी बच्चे अपने बेहतर भविष्य के लिये पढ़ाई कर रहे हैं. क्या इन सब लोगों के साथ कांग्रेस सरकार का यह निर्णय अन्याय नहीं है??
दूसरी तरफ कांग्रेस इस फैसले के बाद कह रही है कि उन्होंने कर्मा परिवार को सम्मान देने की कोशिश की है, इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. वैसे छत्तीसगढ़ सरकार इससे पहले भी एक आईपीएस के बेटे को डिप्टी कलेक्टर बना चुकी है. 2009 में राजनांदगांव के एसपी रहे वीके चौबे नक्सलियों के हमले में शहीद हो गए थे, जिसके बाद उनके बेटे को सरकार ने अनुकंपा के तहत डिप्टी कलेक्टर की नौकरी दी थी.
























