सौरव सरकार नाम का एक लड़का. 11वीं का स्टूडेंट. न जाने किन लोगों ने उसे मजहब के बारे में क्या-क्या बता दिया कि इतवार (2 जुलाई) की शाम उसने फेसबुक चलाते हुए उसने पैगंबर मोहम्मद के बारे में बुरा-भला लिख दिया. जिस उम्र में बच्चों को काशी और काबा का फर्क नहीं पता होता, उस उम्र में सौरव मोहम्मद के बारे में लिख रहा था. उसकी पोस्ट देखकर मुस्लिम बिफर गए. घरों से निकलकर करीब दो हजार की तादाद में इकट्ठे हो गए. पुलिस की गाड़ियां जला दीं. दुकानें तोड़ डालीं. हिंदुओं के घर फूंक डाले. किसी ने कुछ नहीं कहा. क्योंकि कुछ की हिम्मत जवाब दे गई थी और कुछ को ये रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. बात पश्चिम बंगाल के नॉर्थ 24 परगना जिले के बसीरहाट इलाके की.
ममता बनर्जी, राज्यपाल की टोन नहीं, बसीरहाट के गुंडों का बुरा मानिए
इस बार का बदला तो ले लिया गया है.


देश के किसी भी कोने में अगर ऐसा होता है, तो कोई क्या करेगा? आप क्या करेंगे? आपको कोई चीज बुरी लगी, तो आप पुलिस के पास जाएंगे. वहां सुनवाई नहीं होगी, तो कोर्ट जाएंगे. लेकिन खुद डंडा लेकर सब कुछ ठीक करने तो नहीं लग जाएंगे न. लोकतांत्रिक समाज में रह रहे हैं, तो भीड़तंत्र तो नहीं अपनाएंगे. लेकिन कुछ लोगों को शर्म आनी बंद हो जाती है. क्या कश्मीर, क्या यूपी और क्या पश्चिम बंगाल. बेशर्मी आंख का पानी ऐसे सुखा देती है कि ये दोबारा जिंदा ही नहीं होता. जरा-जरा सी बात पर ऐसे भड़क जाते हैं कि सब कुछ मिटाने पर आमादा हो जाते हैं. खुद. बसीरहाट में यही हुआ. गौर कीजिए.

रविवार की शाम जब सौरव को पता चला कि उसकी पोस्ट पर बवाल हो गया है, तो वो इलाके से भाग निकला. लेकिन, सोमवार सुबह तक पुलिस ने उसे पकड़ लिया. जो लोग अपने सामने ये सब होते देख रहे थे, वो बताते हैं कि करीब दो हजार की तादाद में इकट्ठा हुए मुस्लिम थाने पहुंचे और पुलिसवालों से सौरव को मांगने लगे. वो सारे के सारे खुद सौरव को सजा देना चाहते थे, क्योंकि उनकी निगाह में कोर्ट इस बात की हकदार नहीं है. जब पुलिसवालों ने सौरव को उनके सुपुर्द करने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने थाने में खड़ी पुलिस की गाड़ियों के साथ तोड़-फोड़ की और फिर निकल गए.
थाने से निकलकर ये मुस्लिम बादुरिया रोड को ब्लॉक करके बैठ गए. कुछ घंटे और यही सब चलता रहता, तो शायद मामला शांत हो जाता. लेकिन तभी वहां से कुछ हिंदू एक अर्थी लेकर निकले. मुस्लिमों ने उन्हें रोक दिया. बोले कि इधर से नहीं जाने देंगे. यहीं बात बिगड़ गई. फिर बवाल शुरू हुआ. इस बार घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया. मंगलवार बीतते-बीतते हालात ऐसे हो गए कि हिंदू इलाका छोड़कर भाग जा रहे हैं. कोई भरोसा नहीं कि कब किसका घर जला दिया जाए.

अब इस पर क्या बात की जाए! 2017 में भी जब इंसान ये समझने को राजी नहीं है कि किसी भगवान या अल्लाह को उसकी सुरक्षा की जरूरत नहीं है, तो क्या किया जाए. जैसा जेएनयू के पीएचडी स्कॉलर तारा शंकर लिखते हैं,
'पश्चिम बंगाल से खबर आ रही है कि 11वीं कक्षा के एक स्टूडेंट ने फेसबुक पर मुस्लिमों के किसी पवित्र स्थान के बारे में अपमानजनक पोस्ट कर दिया, जिसके विरोध में हजारों कट्टर मजहबी कूद पड़े कोहराम मचाने. दंगे की स्थिति बनी हुई है. उस भीड़ में से कुछ तो उस स्टूडेंट को पत्थर मारने की इजाजत मांग रहे हैं. एक नाबालिग की छोटी सी गलती को हजारों मजहबी बर्दाश्त नहीं कर सके. माफ करने के बजाय सड़कों पर बवाल काटने उतरे. एक पोस्ट से क्या बिगड़ गया उस पवित्र स्थान का भाई? एक तरफ अल्लाह को सबसे रहमदिल कहते हो और खुद इतने कमजर्फ नफरत-दिल हो. ठेका ले रखे हो अल्लाह का? शर्म नहीं आती!'

बसीरहाट के हालात इतने बेकाबू हो गए कि पुलिस के संभाले नहीं आ रहे. ऐसे में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र से मदद मांगी, जिसके बाद BSF की चार कंपनियां तैनात की गईं. ये वही ममता बनर्जी हैं, जो खुद को स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति के तौर पर प्रदर्शित करती हैं. इस विवाद के बीच वो गवर्नर हाउस गईं और वहां से लौटकर बोलीं कि राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने उनका अपमान किया है.
जब ममता राज्यपाल को तमीज सिखा रही थीं, उस समय पश्चिम बंगाल की सड़कों पर कुछ मुस्लिम तमीज की ऐसी-तैसी कर रहे थे. ये समाज का वही वर्ग है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे ममता का खुला संरक्षण है. वहीं हिंदुओं की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है. मुद्दा बैलेंसवाद का नहीं है कि यूपी में हिंदुओं की आलोचना होगी, तो पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों की आलोचना जरूरी है. जो जहां गलत है, उसे वहां हर मुमकिन तरीके से समझाया जाएगा. उसके खिलाफ लिखा जाएगा. सुना है उत्पाती लोगों को लिखे जाने से बड़ी तकलीफ होती है.

ये वही पश्चिम बंगाल है, जो मालदा, वीरभूम, मिदनापुर और न जाने क्या-क्या देख चुका है. हर दो-तीन महीने में यहां से सांप्रदायिक तनाव की खबरें आती हैं. कभी थाने फूंके जाते हैं, तो कभी बसों को आग लगाई जाती है. ममता मार्क्सवादियों को सत्ता से हटाने का क्रेडिट ले सकती हैं, लेकिन उनके इतिहास की बराबरी नहीं कर सकतीं. वाम सरकार में भले तमाम खामियां रही हों, लेकिन पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक सद्भाव को उन्होंने बरकरार रखा. ममता कुछ नहीं कर रही हैं. और अगर वो कुछ करने का दावा करती हैं, तो ये और शर्मनाक है, क्योंकि कुछ बेहतर होता दिख नहीं रहा.
ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के नेता बीजेपी के कैलाश विजयवर्गीय को कोस रहे हैं कि वो मामले को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं. कैलाश को बीजेपी ने पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाया है, जिन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंदू बहन-बेटियों की इज्जत खतरे में है. अरे विपक्ष का तो काम ही राजनीति करना है. उनसे ममता को और क्या उम्मीद है. लेकिन खुद उनकी सरकार क्या सत्तू छानने के लिए चुनी गई है.
ऐसे जाहिलों को सड़कों पर घूमने ही क्यों दिया जाता है, जो एक फेसबुक पोस्ट से ऐसे आहत हो जाते हैं, जैसे उनकी किडनी निकाल ली गई हो. इनकी चिंता होनी चाहिए कि इन्हें रातों में फाका करके न सोना पड़े, इनके बच्चे स्कूल जा सकें, इनके घर की महिलाओं की एनीमिया से मौत न हो जाए. लेकिन इन्हें तो अल्लाह का बदला लेना है. जो दिखता भी नहीं, इन्हें लगता है कि वो इनके भरोसे है. सुलगता हुआ बसीरहाट इन्हीं जाहिलों की देन है.
देशभर में पहले से हायतौबा मची हुई है. भीड़ इकट्ठा होती है और किसी को भी ठोंक-पीटकर बराबर कर देती है. समझ नहीं आ रहा है कि लोगों को क्या हुआ है और कैसे इसे रोका जाए. इतनी छीछालेदर के बीच पश्चिम बंगाल की पुलिस के रहते हुए मुस्लिमों ने जुलूस निकाल दिया, इससे तो अच्छा है कि सरकार बंगाल की खाड़ी में जल-समाधि ले ले.
ये भी पढ़ें: 'रात में भोपाल में दंगे' की असल कहानी सहारनपुर: यहां महाराणा प्रताप और अंबेडकर के लिए दंगे होते हैं यूपी की वो जगह, जहां दंगे हुए कुशवाहा को अख्तर ने अपने घर में पनाह दी





















