अच्छा सोचिए. आप सुबह उठे हैं सो कर. आप पूरी तैयारी के साथ घर से काम के लिए निकलते हैं. और रास्ते पर कहीं आपका पैर पड़े और एक ब्लास्ट हो जाए. उस बलास्ट के बाद शरीर का कोई हिस्सा काम करना बंद कर दे. कंबोडिया में कुछ ऐसा ही हो रहा है सालों से. और अब भी जारी है. लेकिन कुछ लोग बड़े दिलवाले होते हैं. ये कहानी उन्ही 'हिम्मतवालियों' की है.एशियाई देश कंबोडिया इंडिया से बहुत दूर नहीं है. थाईलैंड और वियातनाम जैसे देशों की सीमा से जुड़ा है. कंबोडिया ने लगभग 30 सालों तक युद्ध झेला. वियतनाम युद्ध के वक्त कंबोडिया को भी बहुत कुछ झेलना पड़ा. वॉर के वक्त जगह-जगह लैंडमाइंस बिछाए गए थे. जो आज भी कहीं भी कभी भी फट जाते हैं. जिन्हें हटाने का काम 10 सालों से ज्यादा वक्त से चल रहा है. लेकिन इसका दुखद पहलू ये है कि अब तक 25 हजार से ज्यादा लोग इस वजह से विकलांग हो चुके हैं. कंबोडिया सरकार आज भी लगभग 40-50 लाख लैंडमाइंस को खोजकर खत्म करने में लगी हुई है. कंबोडियो की पहली व्हील चेयर बॉस्केट बॉल टीम तैयार है. टीम में वो लड़कियां शामिल हैं, जिन्होंने लैंडमाइंस धमाकों में अपने पैर गंवाए थे. टीम में शामिल होने से पहले घर में भेदभाव का सामना करना पड़ता. लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं हारी. चेयर बॉस्केटबॉल टीम में शामिल हो गईं. अब जब मन करता है. खेलती हैं. खुश होती हैं. चहकती हैं. और घर के लिए पैसे भी कमाती हैं.
लोस निमोल पैरों से विकलांग हैं. बास्केटबॉल खेलती हैं. कहती हैं, 'माइंस विस्फोट की वजह से मैं विकलांग हो गई. और मेरे पति मुझे छोड़ चुके थे. मैं घर में पड़ी रहती थी.घर वाले मुझे घर का काम करने को कहते थे. बाजार जाने को कहते थे. फिर वूमेन्स बास्केटबॉल टीम की कोच ने मुझे बास्केटबॉल खलेने को कहा. अब मैं खुश खुश रहती हूं. देखिए लैंडमाइंस में पैर गंवा चुकी महिलाओं की कहानी https://youtu.be/k3TXLN5OB_w (ये स्टोरी दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहे शिवेंदु ने तैयार की है.)कंबोडियन वूमेन व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम की खिलाड़ी लोस निमोल ने कहा, 'विकलांग होना कोई रुकावट नहीं है. विकलांग लोग वो सब कुछ कर सकते हैं जो एक साधारण आदमी कर सकता है.'













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