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अपना खून देकर 24 लाख बच्चों की जान बचाने वाला दुनिया छोड़ गया

ऑस्ट्रेलियन रेड क्रॉस ब्लड सर्विस ने बताया कि हैरिसन जब 14 साल के थे तब उनकी छाती में बड़ी सर्जरी हुई थी. उस समय उन्हें काफी मात्रा में खून चढ़ाया गया था. उसी दौरान उनके खून में दुर्लभ एंटीबॉडी का पता चला था. इसके बाद जेम्स ने तय किया था कि वो ब्लड डोनर बनेंगे.

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दुनिया के सबसे बड़े ब्लड डोनर्स में से एक जेम्स हैरिसन की मौत हो गई. (तस्वीर-Australian Red Cross Lifeblood )

इंसान की रगों में दौड़ता खून बह जाए तो मौत, और किसी शख्स को मिल जाए तो जिंदगी. इसीलिए कहते हैं कि 'रक्तदान महादान' होता है. यानी इससे बड़ा कोई 'दान’ नहीं है. ऐसा है तो जेम्स हैरिसन से बड़ा महादानी मिलना मुश्किल है. इस शख्स ने अपनी सारी जिंदगी रक्तदान को समर्पित कर दी. उनके खून की एक-एक बूंद सैकड़ों-हजारों नहीं, बल्कि लाखों बच्चों की जिंदगियां बचाने में काम आई हैं. ऑस्ट्रेलिया की ये महान हस्ती अब इस दुनिया को अलविद कह गई है. जेम्स हैरिसन का 88 साल की उम्र में निधन हो गया है.

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BBC की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े ब्लड डोनर्स में से एक जेम्स हैरिसन के खून में दुर्लभ एंटीबॉडी एंटी-डी की मौजूदगी थी. इसके चलते करीब 24 लाख से अधिक बच्चों की जान बचाई जा सकी. तभी तो जेम्स को पूरी दुनिया में 'मैन विद द गोल्डन आर्म' के नाम से जाना जाता है. हैरिसन की मौत 17 फरवरी को ही हो गई थी. लेकिन परिवार ने सोमवार, 3 मार्च को इसकी जानकारी दी. बताया कि हैरिसन ने सोते समय प्राण छोड़ दिए. 

ऑस्ट्रेलियन रेड क्रॉस ब्लड सर्विस ने बताया कि हैरिसन जब 14 साल के थे तब उनकी छाती में बड़ी सर्जरी हुई थी. उस समय उन्हें काफी मात्रा में खून चढ़ाया गया था. उसी दौरान उनके खून में दुर्लभ एंटीबॉडी का पता चला था. इसके बाद जेम्स ने तय किया था कि वो ब्लड डोनर बनेंगे.

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रिपोर्ट के मुताबिक हैरिसन ने 18 साल की उम्र में ब्लड प्लाज्मा डोनेट करना शुरू किया. वह 81 साल की उम्र तक हर दो हफ्ते बाद रक्तदान करते रहे. साल 2005 में उनके नाम सबसे अधिक रक्तदान करने का रिकॉर्ड बना. जो 17 साल बाद 2022 में जाकर टूटा. इस रिकॉर्ड को एक अमेरिकी शख्स ने तोड़ा था.

जेम्स हैरिसन की बेटी ट्रेसी मैलोशिप ने बताया कि उनके पिता ने लाखों जानें बचाईं. उन्हें हमेशा इस बात की बहुत खुशी रही. रिपोर्ट के मुताबिक खुद हैरिसन की बेटी मैलोशिप को एंटी-डी की दवा दी गई थी. वहीं हैरिसन के दो पोते-पोतियों की जान भी एंटी-डी दवा से ही बचाई गई थी.

एंटी-डी एंटीबॉडी क्या है?

एंटी-डी दवा को 1960 के दशक में बनाया गया था. इसकी खुराक जन्मे बच्चों को Haemolytic नामक बीमारी से बचाती है. इसे HDFN भी कहा जाता है. यह जानलेवा ब्लड डिसऑर्डर है. जो भ्रूण के लिए बेहद खतरनाक होता है. यह स्थिति गर्भावस्था के दौरान तब पैदा होती है जब मां के खून की लाल रक्त कोशिकाएं उसके बढ़ते हुए भ्रूण की रक्त कोशिकाओं के साथ मेल नहीं खातीं. तब गर्भवती मां का इम्यून सिस्टम भ्रूण की लाल रक्त कोशिकाओं को एक खतरे के रूप में देखता है. और उन पर हमला करने के लिए एक एंटीबॉडी रिलीज करता है.

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यह एंटीबॉडी भ्रूण के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है. इसमें अजन्मे बच्चे में खून की कमी, हार्ट फेल जैसी बड़ी दिक्कत होती है. यहां तक कि उसकी मौत भी हो सकती है.  

हैरिसन के खून में एंटी-डी की वजह?

हैरिसन के खून में इतनी अधिक मात्रा में एंटी-डी की उपलब्धता की वजह वैज्ञानिकों को पता नहीं चल सकी. लेकिन कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि 14 साल की उम्र में हैरिसन को जब अधिक मात्रा में ब्लड चढ़ाया गया था, शायद उसी दौरान उनके शरीर में एंटी-डी की प्रचुरता हो गई थी.

ऑस्ट्रेलियन रेड क्रॉस ब्लड सर्विस ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया में 200 से भी कम एंटी-डी डोनर्स हैं. इनकी वजह से हर साल लगभग 45 हजार गर्भवती महिलाओं और उनके अजन्मे बच्चों की जान बचाई जाती है.

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