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क्या गुजरात में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के कर्मचारियों को सैलरी नहीं दे पा रही है सरकार?

इस पूरे मामले में सरकार और कर्मचारियों के अलावा तीसरा पक्ष भी है.

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फोटो - thelallantop
गुजरात के नर्मदा जिले में सरदार बल्लभभाई पटेल की एक प्रतिमा बनी. इसे दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति कहा गया है जिसकी ऊंचाई 182 मीटर है. स्टेच्यू ऑफ यूनिटी नाम से इस विशालकाय मूर्ति को 1 नवंबर 2018 को आम जनता के लिए खोला गया. इसको लेकर कई विवाद भी सामने आए. जैसे आरोप लगे कि सरकार ने कई पीएसयू यानी सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रमों से सीएसआर का पैसा इसमें लगवा दिया. साथ ही यहां के आदिवासी समुदाए के कई लोगों ने भी कई आपत्तियां जताईं. खैर, ये बनकर तैयार हो गया और जनता के लिए खोल भी दिया गया.
कई मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी छपा कि यहां दूर दूर से लोग घूमने आ रहे हैं और स्टेच्यू के रख-रखाव के लिए खूब पैसा इकट्ठा हो रहा है. मसलन, 11 नवंबर 2018 को इकनोमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 11 दिनों में ही स्चेच्यू की 1.28 लाख रूपए की कमाई हो गई थी. वहीं यूनियन टूरिज्म मिनिस्टर केजे एल्फॉन्स ने संसद में सदन को बताया था कि जनवरी 2019 तक यहां लोगों के आने से यानी विजिटर्स से करीब 19.47 करोड़ रुपए की कमाई हुई है.
मगर अब खबर चल रही है कि यहां काम करने वाले 100 से ज्यादा कर्मचारियों को 4 महीने से सैलरी नहीं मिली है. इसके लिए वो हड़ताल पर चले गए हैं और मोदी सरकार को इसके लिए दोषी मान रहे हैं. न्यूज वेबसाइट न्यूजक्लिक के मुताबिक ये सारे कर्मचारी गुजरात सरकार के कर्मचारी नहीं हैं. ये एक प्राइवेट कंपनी के कर्मचारी हैं जिसे स्टेच्यू ऑफ यूनिटी की साइट के रख-रखाव यानी मेंटेनेंस का ठेका दिया गया है. इस कंपनी का नाम है अपडेटर सर्विसेज लिमिटेड. जिन कर्मचारियों को पिछले 3 महीने से वेतन नहीं मिला है, इनमें सिक्युरिटी गार्ड्स, माली, सफाईकर्मी, लिफ्टमैन, टिकट चैकर आदि शामिल हैं और ये कॉन्ट्रैक्चुअल हैं. इन लोगों को जब तीन महीने से सैलरी नहीं मिली तो इन्होंने स्टेच्यू के चारों ओर एक ह्यूमन चेन बनाई और अपने वेतन की मांग की."
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विंध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच नर्मदा नदी के किनारे पर बनी इस मूर्ति पर करीब 2389 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं.

इस बात में ये तो सच है कि इन कर्मचारियों के वेतन को लेकर दिक्कत आ रही है. मगर इंडिया टुडे की गुजरात ब्यूरो चीफ गोपी मनियार ने बताया, "ये सभी कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारी हैं और पिछले तीन महीने से वो सैलरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. कुछ कर्मचारियों को निर्धारित सैलरी की आधी रकम दी जा रही थी, और कुछ को बिल्कुल भी नहीं. 12 मार्च को जब इन्होंने ह्यूमन चेन बनाकर प्रदर्शन किया तो स्थानीय मीडिया में इसे रिपोर्ट किया गया. तब सरकार ने उस प्राइवेट कंपनी और इन कर्मचारियों के बीच मामले को सेटल करवा दिया और अब सभी कर्मचारी काम पर लौट आए हैं."
किसी भी टूरिस्ट साइट को चलाने के लिए इसी तरह का सेटअप होता है जहां प्राइवेट कंपनी को ठेका दिया जाता है. देश में एयरपोर्ट से लेकर, बस टर्मिनल्स, टूरिस्ट साइट्स समेत कई ऐसी जगहें हैं जहां प्राइवेट कंपनियां अपने कर्मचारी रखती हैं और काम करवाती हैं. ऐसे में ये कहना कि मोदी सरकार इन कर्मचारियों को सैलरी नहीं दे पा रही तो गलत है, मगर साथ ही ये भी सच है कि इस तरह की कंपनियों पर भी नकेल कसनी चाहिए जो न्यूनतम वेतन भी कर्मचारियों को नहीं देती हैं. इस मामले में कर्मचारियों को ह्यूमन चेन बनाकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की भी जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी.


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