10 साल में सात प्रधानमंत्री. वाकई ब्रिटेन 'ग्रेट' तो है. यहां की पॉलिटिक्स बीते एक दशक में काफी अस्थिर रही है. हर दूसरे साल में किसी नए नेता को प्रधानमंत्री बनते देखा जा रहा है. इस बार जिनके नए ब्रिटिश पीएम बनने की प्रबल संभावना और चर्चा है उनका नाम एंडी बर्नहैम (Andy Burnham). जिन लोगों ने 'Game of Thrones' देखी है, वो इस पूरे घटनाक्रम की तुलना इसी सीरीज़ की स्टोरीलाइन से कर रहे हैं. एंडी बर्नहैम को 'King of the North' बता रहे हैं. ऐसा क्यों और हो क्या रहा है UK की राजनीति में, बताते हैं.
ब्रिटेन के पीएम पद के दावेदार एंडी बर्नहैम को लोग 'King of the North' क्यों कहते हैं?
यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोमवार, 22 जून को अपने पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया. उन्होंने यूके के प्रधानमंत्री निवास डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर मीडिया के सामने इस्तीफे की घोषणा की. अब यूके की सत्ताधारी लेबर पार्टी का नया लीडर चुना जाएगा. जो यूके का अगला प्रधानमंत्री होगा.


दरअसल, यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोमवार, 22 जून को अपने पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया. उन्होंने यूके के प्रधानमंत्री निवास डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर मीडिया के सामने इस्तीफे की घोषणा की. अब यूके की सत्ताधारी लेबर पार्टी का नया लीडर चुना जाएगा. जो यूके का अगला प्रधानमंत्री होगा. तब तक स्टार्मर प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे. स्टार्मर ने बताया कि पार्टी के नए लीडर के लिए 9 जुलाई से नॉमिनेशन शुरू होंगे. सितंबर में ब्रिटिश पार्लियामेंट का ऑटम सेशन शुरू होने से पहले देश को नया प्रधानमंत्री मिल जाएगा. यानी 10 साल के भीतर यूके में 7वां नया प्रधानमंत्री होगा.
डेविड केमरून आखिरी ब्रिटिश पीएम थे, जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया था. 2016 में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही साल में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. तब से ब्रिटेन में कोई भी लीडर 3 साल से ज्यादा समय के लिए प्रधानमंत्री पद पर नहीं टिक पाया है. 2024 में कीर स्टार्मर की लीडरशिप में लेबर पार्टी को 27 साल बाद सबसे बड़ी जीत मिली थी. इसके बाद उम्मीद थी कि कम से कम वो तो अपना कार्यकाल जरूर पूरा करेंगे, लेकिन 2 साल के भीतर ही उन्हें भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.
इस बीच ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहैम ने स्टार्मर के पद को चैलेंज करने की तैयारी शुरू कर दी. ब्रिटेन में प्रधानमंत्री पद को चुनौती देने के लिए सांसद बनना जरूरी होता है. इसलिए एंडी बर्नहैम का रास्ता बनाने के लिए मेकरफील्ड सीट से तत्कालीन सांसद जोश सिमन्स ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद बर्नहैम ने यहां से बाई-इलेक्शन लड़ा और जीत दर्ज की. अब वो यूके के अगले प्रधानमंत्री बनने के सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे हैं.
बर्नहैम रेस में सबसे मजबूत कैसे?लेबर पार्टी के कई नेता और समर्थक कीर स्टार्मर का विकल्प तलाश रहे थे. 56 वर्षीय एंडी बर्नहम इन लोगों के बीच एक मजबूत चेहरे के तौर पर उभरे. ऐसे कई लोग हैं जो आने वाले वक्त में उन्हें पार्टी की कमान संभालने वाला नेता भी मानते हैं. इसकी नींव साल 2020 से पड़ गई थी. कोविड-19 महामारी के दौरान कंजर्वेटिव सरकार के साथ उनके टकराव हुए. इससे उन्हें 'उत्तरी इंग्लैंड की आवाज़' के रूप में पहचान मिलने लगी. यहीं से उनकी लोकप्रियता उनके क्षेत्र से निकलकर कर पूरे देश में फैल गई. यहीं से उनकी अलग राजनीतिक पहचान बननी शुरू हो गई.
बर्नहैम के समर्थकों का मानना है कि वो ऐसे नेता हैं जो लेबर पार्टी को फिर से मजदूर वर्ग और उन इलाकों से जोड़ सकते हैं, जिन्हें अक्सर लगता है कि लंदन उनकी अनदेखी करता है. दूसरी तरफ, उनके आलोचकों का कहना है कि "किंग ऑफ द नॉर्थ" की छवि को राष्ट्रीय नेतृत्व में बदल पाना आसान नहीं होगा.
अंदरूनी मतभेद और घटती लोकप्रियता, लेबर पार्टी इन दिनों ऐसी कई चुनौतियों का सामना कर रही है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या "किंग ऑफ द नॉर्थ" ब्रिटिश राजनीति की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंच पाएंगे. अगर पहुंचे तो क्या हालिया कई प्रधानमंत्रियों की तरह उनके कार्यकाल पर भी जल्दी ही विराम लग जाएगा? या वो लंबे समय तक टिककर कोई बड़ी छाप छोड़ सकेंगे?

एंडी बर्नहैम का जन्म जनवरी 1970 में इंग्लैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के Merseyside में हुआ था. वो लंबे वक्त से लेबर पार्टी से जुड़े रहे हैं. साल 2001 से 2017 तक Leigh से सांसद रहे. इस दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री Gordon Brown की सरकार में कई अहम जिम्मेदारियां संभालीं. वो चीफ सेक्रेटरी टू द ट्रेजरी, कल्चरल सेक्रेटरी और हेल्थ सेक्रेटरी जैसे पदों पर रहे.
बर्नहैम ने दो बार लेबर पार्टी का नेता बनने की कोशिश की. पहली बार 2015 में, जब लेबर पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी से चुनाव हार गई थी. दूसरी बार 2017 में. हालांकि, दोनों बार उन्हें सफलता नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने वेस्टमिंस्टर की राजनीति में बने रहने के बजाय अलग रास्ता चुना. 2017 में वो ग्रेटर मैनचेस्टर के पहले सीधे चुने गए मेयर बने. ये पद उनके राजनीतिक करियर के लिए बड़ा मोड़ साबित हुआ. इसी के बाद उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत हुई.
'किंग ऑफ द नॉर्थ' कैसे बने?बर्नहैम को 'किंग ऑफ द नॉर्थ' कहे जाने की शुरुआत भी Covid-19 महामारी के दौरान हुई थी. साल 2020 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की सरकार को खुली चुनौती दी थी. वो उत्तरी इलाकों की आर्थिक सहायता के लिए सरकार से टक्कर ले रहे थे, जो लॉकडाउन प्रतिबंधों से बुरी तरह प्रभावित हुए थे. बर्नहैम का आरोप था कि सरकार की नीतियां लंदन और दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड को ज्यादा फायदा पहुंचा रही हैं, जबकि उत्तरी इंग्लैंड के कर्मचारियों और कारोबारों को जरूरत के मुताबिक मदद नहीं मिल रही है.
इस विवाद से ब्रिटेन में लंबे समय से चली आ रहीं क्षेत्रीय असमानताएं भी सामने आईं. उत्तरी इंग्लैंड में कई लोगों की ऐसी राय है कि पॉलिटिकल पावर, इन्वेस्टमेंट और आर्थिक अवसरों का बड़ा हिस्सा लंदन और उसके आसपास के इलाकों में ही केंद्रित है.
बर्नहैम के इस टकराव को मीडिया में व्यापक कवरेज मिली. धीरे-धीरे वे उन लोगों के नेता के रूप में उभरे, जो लंदन-केंद्रित राजनीतिक व्यवस्था का विरोध करते थे. उनके समर्थकों ने उन्हें 'किंग ऑफ द नॉर्थ' कहना शुरू कर दिया. जो कि टीवी सीरीज़ Game of Thrones से प्रेरित है. इस सीरीज़ में भी नॉर्थ के शासक अक्सर राजधानी 'किंग्स लैंडिंग' में बैठे सत्ता केंद्र को चुनौती देते हैं. तब से ही बर्नहैम के साथ भी 'किंग ऑफ द नॉर्थ' उपनाम जुड़ गया.
मेयर कार्यकाल कैसा रहा?मेयर बनने के बाद Andy Burnham ने ग्रेटर मैनचेस्टर में स्थानीय अधिकारों और सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत करने पर खास ध्यान दिया. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी बी नेटवर्क का विस्तार. यह ग्रेटर मैनचेस्टर की एकीकृत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है. इसके तहत बसों और ट्राम सेवाओं को एक ही ढांचे में लाया गया. इसमें किराया व्यवस्था को भी आसान बनाया गया.
बर्नहैम ने कौशल विकास कार्यक्रमों, स्थानीय आर्थिक विकास और सस्ते घरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी काम किया. उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने ग्रेटर मैनचेस्टर को नेशनल लेवस पर नई पहचान दिलाई. उनका मकसद ये दिखाना था कि स्थानीय प्रशासन को ज्यादा अधिकार देने से बेहतर नतीजे मिल सकते हैं.
हालांकि, उनकी सभी योजनाएं सफल नहीं रहीं. आलोचकों का कहना है कि बेघर लोगों की समस्या से जुड़े कई लक्ष्य पूरे नहीं हो सके. कुछ लोग ये भी कहते हैं कि परिवहन सुधारों की कई योजनाएं बर्नहैम के मेयर बनने से पहले ही तैयार की जा चुकी थीं.
फिर भी, उनके कार्यकाल ने उनकी छवि ऐसे नेता की बनाई, जो वेस्टमिंस्टर की सत्ता की राजनीति में उलझने के बजाय स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहा था.
पूरे देश के लीडर बन पाएंगे?बर्नहैम को लेकर सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या उनकी लोकप्रियता उत्तरी इंग्लैंड से आगे भी असर दिखा पाएगी. उनकी राजनीतिक पहचान क्षेत्रीय अधिकारों, स्थानीय स्तर पर ज्यादा फैसले लेने की ताकत और मजदूर वर्ग के मुद्दों से जुड़ी हुई है. यही वजह है कि ग्रेटर मैनचेस्टर और उत्तरी इंग्लैंड के दूसरे इलाकों में उनका मजबूत समर्थन आधार है.
लेकिन ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने के लिए सिर्फ उत्तरी इंग्लैंड नहीं, बल्कि इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के वोटर्स का भरोसा भी जीतना जरूरी है. कुछ आलोचकों का मानना है कि मेयर के तौर पर उनका प्रदर्शन भले प्रभावशाली रहा हो, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे राष्ट्रीय स्तर पर भी उतने ही सफल नेता साबित हों.
वीडियो: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इस्तीफ़ा क्यों दिया?
















