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युवक को बेवजह जेल में रखा, UP सरकार को हाईकोर्ट का आदेश, '10 लाख जुर्माना भरो'

इस मामले में SC ने, भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) पर विचार करने के बाद फैसला दिया था. कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को, उसकी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दिए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माना कि व्यक्ति को गलत अरेस्ट किया गया (PHOTO-Wikipedia)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख का जुर्माना लगाया है. ये जुर्माना एक व्यक्ति को 3 महीने तक गैर कानूनी तरीके से हिरासत में रखने पर लगाया गया है. मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच कहा कि अरेस्ट मेमो में केवल केस नंबर लिखा था लेकिन गिरफ्तारी के ठोस कारण नहीं बताए गए थे. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को 27 जनवरी 2026 से गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार करके रखा गया है. 29 अप्रैल 2026 तक वह जेल में ही है, यानी 3 महीने से ज्यादा समय हो चुका है.

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मामले में आदेश देते हुए बेंच ने कहा,

पीड़ित के 3 महीने से ज्यादा समय तक चली अवैध कैद को ध्यान में रखते हुए कोर्ट का आदेश है कि राज्य पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाए.

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कोर्ट ने कहा- गिरफ्तारी ही अवैध

कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता को उस प्रक्रिया का पालन किए बिना गिरफ्तार किया गया था, जिसका निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में दिया था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) पर विचार करने के बाद फैसला दिया था. कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दिए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा. हाईकोर्ट ने आगे कहा कि मजिस्ट्रेट का रिमांड आदेश याचिकाकर्ता की अवैध गिरफ्तारी पर आधारित था, इसलिए उसे भी रद्द किया जाना चाहिए. 

सरकार पर जुर्माना

कोर्ट के पिछले निर्देश का पालन न करने पर बेंच ने स्टेट पर नाराजगी जाहिर की. कोर्ट ने पूछा कि उन पर जुर्माना क्यों न लगाया जाए? इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने पाया कि एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (गृह) कोई भी उचित कारण बताने में विफल रहे. उन्होंने इस मामले में अपने विवेक का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया. कोर्ट के मुताबिक,

अदालत को यह कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (गृह) इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने में विफल रहे हैं. उन पर भारी जुर्माना (exemplary costs) क्यों न लगाया जाए. एडिशनल चीफ सेक्रेटरी ने अदालत के पिछले आदेश को पढ़ने की भी जहमत नहीं उठाई. उस आदेश में उनसे यह जवाब मांगा गया था कि याचिकाकर्ता को लगभग तीन महीने तक जेल में अवैध रूप से बंद रखने के लिए उन पर भारी जुर्माना क्यों न लगाया जाए. 

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कोर्ट ने कहा कि एडिशनल चीफ सेक्रेटरी की ओर से दाखिल पर्सनल हलफनामे से संकेत मिलता है कि रिपोर्ट मिलने के बाद उचित कार्रवाई की जा रही है या की जाएगी. लेकिन इस हलफनामे में इस बात का जरा भी जिक्र नहीं है कि उन पर भारी जुर्माना क्यों न लगाया जाए? अगर गृह विभाग के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी के स्तर पर ही विवेक का ऐसा अभाव देखने को मिलता है, तो इससे राज्य के भीतर काम करने वाले अन्य अधिकारियों के कामकाज को लेकर भी चिंताएं पैदा होती हैं.

कोर्ट ने आगे कहा कि पिछले आदेश के बावजूद अधिकारी कोई कार्रवाई करने में विफल रहे. इसके चलते याचिकाकर्ता को अवैध रूप से जेल में बंद रखने का सिलसिला जारी रहा. कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुआवजे के तौर पर 10 लाख रुपये का भुगतान करें. यह राशि चार हफ्ते के भीतर याचिकाकर्ता को सौंप दी जाए. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले राशि राज्य सरकार अदा करेगी. फिर नियमों के अनुसार सरकार इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों से इसे वसूल करने को आजाद है.

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