राम कुमार की कहानी शुरू होती है एक साल पहले. जब वो मथुरा से पंडितई करने के लिए दिल्ली आया था. अलीगढ़ के रहने वाले हरीश को भी अपने साथ लटका लाया था. इसके अलावा राम कुमार पंडितई करने वाला ड्रेस, भोपू, चटाई और तंबू लाया था. दोनों साउथ-वेस्ट दिल्ली की कॉलनी में घूमते और लोगों से भगवद गीता का पाठ कराने को कहते. ऐसे घूमते-घामते और पाठ करते हुए दोनों को लगभग सात महीने हो गए. एक दिन दोनों पाठ करा के लौट रहे थे. रास्ते में हरीश को एक बाइक मिली. जिसका कोई मां-बाप उसे नजर नहीं आया. दोनों ने बाइक उड़ा ली. उसे लेकर मथुरा गए और वहां बेच दिया.शेर के मुंह एक दफा खून लग जाए तो और की चाहत उसके मन को घेर लेती है. ठीक वैसा ही हुआ राम कुमार और हरीश के साथ. पूजा-पाठ गया तेल लेने. ध्यान तो बस बाइक टपाने में रहने लगा दोनों का. 2-3 घंटे पूजा-पाठ करते, उसके बाद शिकार खोजते. हाथ साफ करने के लिए रात का समय फिक्स कर दिया था. कभी पार्क के बाहर से तो कभी मेट्रो स्टेशन से बाइक ले भागते थे. बाइक को अनलॉक करने के लिए मास्टर की ले रखा था. ऐसी ही दोनों की दुकान चल रही थी. लेकिन संडे को धरे गए. काकरोला रोड से दोनों गुजर रहे थे. रात का टाइम था. लहराते-लहराते बाइक ले जा रहे थे. पुलिस ने देखा तो उनको शक हुआ. पुलिस ने रोक लिया और बाइक के पेपर दिखाने को कहा. चोरी के माल का कोई कागज-पत्तर थोड़ी होता है. दिखा पाए नहीं. रजिस्ट्रेशन नंबर से पता चला कि बाइक चोरी की है. अक्टूबर में इसे उत्तम नगर से उठाया गया था. मौके से दोनों को पुलिस उठा ले गई. दोनों ने फिर कबूला कि वो अपना गुजारा करने के लिए चोरी करते थे. हरीश ने पुलिस को चोरी की बाइक का पता बताया. जहां से 8 बाइक मिले. जेल में जाने के बाद राम कुमार को याद आ रहा है कि वो जन्म से एक पंडित है, कोई चोर नहीं.
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