साल 1954. बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में था. ऐसी ग्रहदशा बनने पर कुंभ के लिए प्रयागराज को चुना जाता है. बताया जाता है कि इस साल जो योग बना था वो 108 साल बाद आता है. दूसरी खास बात ये थी कि देश की आजादी के बाद पहला कुंभ होने जा रहा था. नई सरकार और प्रशासन की साख का सवाल था. अमूमन होता यही था कि तीर्थयात्री संगम में पहले डुबकी लगाते थे और उनके बाद नागा साधुओं की बारी आती थी. लेकिन 1954 में ये परंपरा बदल दी गई. ऐसा पहली बार हो रहा था कि साधुओं को पहले स्नान करने की अनुमति मिली और पब्लिक बैरीकेड के पीछे थी. 3 फरवरी, मौनी अमावस्या का दिन था. सुबह के 9 बज रहे होंगे जब नागा साधुओं का जुलूस निकला. बैकीकेड्स के पीछे से श्रद्धालु आगे बढ़कर साधुओं के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहते थे. धक्का मुक्की हुई बैरियर टूटा और लोग आगे बढ़ गए. कुछ ही देर में भीड़ तितर बितर हो गई. चारों और भगदड़ जैसा माहौल बन गया. क्या हुआ था उस दिन, जानने के लिए देखें तारीख का ये एपिसोड.
तारीख: कुंभ मेले में 1954 में हुई भगदड़ में क्या हुआ था?
3 फरवरी, मौनी अमावस्या का दिन था. सुबह के 9 बज रहे होंगे जब नागा साधुओं का जुलूस निकला. बैकीकेड्स के पीछे से श्रद्धालु आगे बढ़कर साधुओं के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहते थे. धक्का मुक्की हुई बैरियर टूटा और लोग आगे बढ़ गए.
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