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ज़मीनी हकीकत (पार्ट-3) : 5 लाख का मुफ्त बीमा करने वाली आयुष्मान भारत योजना में झोल कहां मिला?

11 करोड़ लोगों को कवर करने वाली इस हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम का असली हाल.

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रैली में योजना की घोषणा करते नरेंद्र मोदी, और हमारी पड़ताल.
23 सितंबर 2018. झारखंड की राजधानी रांची. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक भव्य कार्यक्रम में आयुष्मान भारत योजना लॉन्च कर रहे हैं. भाषण शुरू होता है. पीएम कहते हैं, आयुष्मान भारत योजना से स्वस्थ भारत-सशक्त भारत बनेगा. फिर इसके फायदे गिनाते हुए एक व्यक्ति की जानकारी देते हैं. व्यक्ति का नाम प्रधानमंत्री आरोग्य मित्र या आयुष्मान मित्र. और काम अस्पताल में भर्ती होने वाले गरीबों का सहारा बनना. उन्हें भर्ती करवाना, फॉर्म भरवाना, हर वो काम करवाने में मदद करना जिनसे गरीब आदमी अस्पताल की प्रक्रियाओं में घबराता है.
अब 6 महीने आगे चलते हैं. तारीख 18 मार्च. रांची से 1650 किलोमीटर दूर बिलासपुर का रीजनल हॉस्पिटल. पता चलता है कि जिले में 10 अस्पताल हैं, जहां आयुष्मान योजना वर्किंग कंडीशन में है. सभी सरकारी अस्पताल हैं. पर प्रधानमंत्री का बताया गरीबों का वो सहारा, वो मित्र इन 10 अस्पतालों में से एक में भी नहीं मिलता. पीएम का एक दावा यहां टूटता दिखता है. टूटता भी कहां है. बिलासपुर में. वो बिलासपुर जो देश के स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा का गृह क्षेत्र है. यहीं से नड्डा 1993 में पहली बार चुनाव लड़े और विधायक बने. 1998 में यहीं से जीते तो लालबत्ती मिली. 2007 में वो इसी सीट से जीतकर हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बने. फिर 2012 में हिमाचल प्रदेश के कोटे से राज्यसभा सांसद बने. 9 नवंबर 2014 को उन्हें देश का स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया. तब से उनका कार्यकाल हमारी रिपोर्ट होने तक जारी है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा (रॉयटर्स)
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा. (फोटोः रॉयटर्स)

हमारी जम़ीनी हकीकत पर आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं इस योजना के बारे में जरूरी बातें और इसे लेकर सरकार के दावे.

क्या है आयुष्मान भारत योजना?

1. ये एक तरह का बीमा है. हेल्थ कवर. इसमें आर्थिक रूप से कमजोर, 10 करोड़ 74 लाख परिवार कवर होंगे. परिवार के साइज और लाभार्थी की उम्र से फर्क नहीं पड़ेगा. 2. बीमा की रकम एक परिवार के लिए 5 लाख रुपये तय है. 60 फीसदी प्रीमियम केंद्र और 40 फीसदी राज्य सरकार देगी. 3. लाभार्थियों का चुनाव 2011 की सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना के आधार पर किया गया है. लाभ तब मिलेगा जब कोई लाभार्थी किसी ऐसे सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होगा, जो आयुष्मान के पैनल में आता है. 4. योजना में दो-तीन साल में देश में 1.5 लाख वेलनेस सेंटर बनाने का प्लान है. 5. योजना का लक्ष्य है - स्वस्थ भारत और सशक्त भारत. इसके लिए करीब 10,000 करोड़ का बजट जारी किया गया है. 6. पहले दो ऐसी सरकारी योजनाएं थीं जिन्हें आयुष्मान में मिला दिया गया. पहली थी, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना. और दूसरी, सीनियर सिटीजन हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना 2008 में मनमोहन सरकार ने शुरू की थी. इसमें यैलो राशन कार्ड धारक बीपीएल लोगों के लिए 30 रुपए में 30 हज़ार रुपए का बीमा होता था. वहीं 2016 में शुरू हुई सीनियर सिटीजन हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम में 60 से ज्यादा उम्र के बीपीएल लोगों के साथ 11 अलग कैटेगरी के लोग शामिल थे. इनको 30 हज़ार रुपए प्रतिवर्ष का बीमा मुफ्त मिलता था.
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आयुष्मान भारत को लेकर सरकारी दावे

1. देश के 50 करोड़ लोगों को इसका फायदा मिलेगा. अब तक कितनों को फायदा पहुंचा. सरकारी आंकड़ा कहता है लगभग 17 लाख लोगों को. इन लोगों को फायदा मिला. क्योंकि इनके पास ई कार्ड है. स्कीम के फायदे के लिए जरूरी कार्ड. ये कार्ड अब तक 2 करोड़ 72 लाख लोगों को मिल चुका है. यानी इतने परिवार कवर हो चुके हैं. कुल लक्ष्य है 10 करोड़ परिवार. 2. देश के 31 राज्य और यूनियन टैरिटरी इससे जुड़ चुके हैं. अस्पतालों की बात करें तो सरकारी और प्राइवेट मिलाकर लगभग 15 हजार अस्पताल जुड़े हैं. 3. स्कीम के तहत 1350 मेडिकल पैकेज दिए गए हैं. इसमें सर्जरी भी है, दवाई और ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी.
आयुष्मान योजना का मुख्य मकसद था गरीबों को उनके घर के सबसे नजदीकी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में 5 लाख तक का मुफ्त इलाज दिलवाना. बिलासपुर के रीजनल हॉस्पिटल से मिले आंकड़े बताते हैं कि आयुष्मान योजना से 10 अस्पताल जुड़े हैं. मगर सबके सब सरकारी हैं. एक भी प्राइवेट अस्पताल इस योजना से जुड़ने को तैयार नहीं है. आखिर क्यों? बिलासपुर में एन.आर. हॉस्पिटल चलाने वाले डॉ. पंकज शर्मा इसका सबसे बड़ा कारण सरकार द्वारा इलाज के तय किए रेट्स को बताते हैं. वो कहते हैं कि हर तरह की सर्जरी के रेट, बेड चार्जेज बहुत ऊपर नीचे हैं. जिस रेट को सरकार ने तय किया है और जिस रेट पर प्राइवेट अस्पताल इलाज कर रहे हैं, उसे कंपेयर नहीं किया जा सकता. वो सिजेरियन डिलीवरी का उदाहरण देते हैं. बताते हैं कि किसी भी प्राइवेट अस्पताल में इसके रेट 20 से 25 हजार हैं. पर सरकार ने 9000 रुपये तय किया है. इतने में ये संभव नहीं है. पंकज कहते हैं -
"प्राइस लिस्ट को देखकर ही लगता है कि इसे बनाने में टेक्निकल लोगों को शामिल नहीं किया गया, तभी रेट्स में इतनी गड़बड़ है. अगर इसमें डॉक्टर होते तो ये न होता. डॉक्टर पंकज खुद इस योजना से जुड़ना चाहते हैं, मगर कहते हैं कि सरकार को सबसे पहले लिस्ट में समानता लानी पड़ेगी. हम इतना कर सकते हैं कि अपने रेट्स 25-30 फीसदी कम कर दें. मगर जो रेट्स अभी हैं, उनमें जुड़ना नामुमकिन है."
बिलासपुर में ही सीएमओ रह चुके डॉ. डीआर सहगल भी सहगल हॉस्पिटल चलाते हैं. उन्होंने भी इस योजना से जुड़ने की इच्छा जताई. मगर वो कहते हैं कि इसकी प्रक्रिया जटिल है. वो इसके लिए सिंगल विंडो की डिमांड करते हैं. उनकी दूसरी शिकायत भी रेट्स को लेकर है. वह कहते हैं कि सरकार की तरफ से हमें कहीं भी कोई छूट नहीं मिलती. हम इतने कम रेट्स में कैसे इलाज कर दें. अस्पताल चलाने में बहुत तरह के खर्च होते हैं. सरकार सिर्फ इलाज का पैसा देख रही है. वह कहते हैं कि सरकार बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज को तो कम दरों पर जमीन देती है, तो हमें क्यों नहीं दे सकती. हमें छूट मिलेगी तो हम मरीजों के लिए और सुविधाएं जुटा सकेंगे. रेट तो मुनासिब करने ही होंगे.
डॉ. पंकज शर्मा और डॉ. डीआर सेहगल (फोटो- रजत सैन | दी लल्लनटॉप)
डॉ. पंकज शर्मा और डॉ. डी आर सहगल. (फोटो: दी लल्लनटॉप)

सरकार का दावा था कि मेडिकल पैकेज के रेट तय करने से इलाज सस्ता होगा. मगर दोनों डॉक्टर सरकार की इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. वो कहते हैं कि छोटे शहरों में तो ऐसा कुछ नहीं हुआ है. ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल जब जुड़ ही नहीं रहे तो ऐसा कैसे होगा. बिलासपुर के डिस्ट्रिक्ट हेल्थ ऑफिसर और आयुष्मान योजना के नोडल अधिकारी डॉ. परविंदर सिंह का इस पर कुछ और सोचना है. वो कहते हैं -
"पूरे हिमाचल प्रदेश में ज्यादातर लोग प्राइवेट अस्पताल के बजाए सरकारी अस्पताल जाना पसंद करते हैं. बिलासपुर में ही मुश्किल से 3-4 प्राइवेट हॉस्पिटल होंगे. हमने उन अस्पतालों को सूचित भी कर दिया था, मगर वो इसमें शामिल नहीं हुए. इलाज के तय सरकारी रेट्स को लेकर मेरे पास कोई शिकायत नहीं आई है. इसमें कोई कमी है तो सरकार ही जवाब दे सकती है और कुछ कर सकती है. मैं इसमें सक्षम नहीं हूं."
डॉ. परविंदर इस बात से भी इनकार करते हैं कि आयुष्मान से जुड़ने का प्रॉसेस जटिल है. वह कहते हैं कि एक बार रजिस्ट्रेशन करवाना है तो करवाना ही पड़ेगा. जो मांगा जाए वो देना ही होगा.

'आयुष्मान- ये किस बला का नाम है?'

बिलासपुर के रीजनल हॉस्पिटल से मिले आंकड़े बताते हैं कि बिलासपुर में आयुष्मान की कैटेगरी में 37,899 परिवार आते हैं. इसमें से 22,518 परिवार के कार्ड 11 मार्च 2019 तक बन चुके हैं. तो क्या इन सभी को इलाज मिल रहा है. जवाब - हां मिल रहा है. मगर इसके लिए उन्हें आयुष्मान कार्ड की जरूरत नहीं. क्यों?
बिलासपुर के नमोल गांव के रहने वाले रूपलाल मजदूरी करते हैं. अपनी पत्नी का इलाज करवाने बिलासपुर रीजनल अस्पताल आए हुए हैं. उन्होंने आयुष्मान भारत योजना के बारे में कभी नहीं सुना. न उनके गांव में प्रधान या आंगनबाड़ी कर्मियों ने कुछ बताया, न अस्पताल में उनको इसकी जानकारी दी गई. वो इस बात से जरूर सहमत हैं कि उनका पैसा एक भी नहीं लगा. भले उनका कार्ड न हो, पर उनकी पत्नी का इलाज फ्री में हुआ.
अवारी गांव के लखविंदर सिंह यहीं बिलासपुर के अस्पताल में भर्ती हैं. पेशे से ड्राइवर हैं. 6000 रुपये प्रति महीना तनख्वाह है. एक हादसे में उनका पैर जल गया था. उन्हें भी आयुष्मान भारत योजना के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उनका भी इलाज बिना कार्ड मुफ्त में हो रहा है. अगले वार्ड में मांडवा गांव के लेखराम मिले. अस्पताल में बेटे का इलाज चल रहा है. उन्होंने भी आयुष्मान योजना के बारे में नहीं सुना.
रुपलाल और लखविंदर सिंह (फोटो- रजत सैन | दी लल्लनटॉप)
रूपलाल और लखविंदर सिंह. (फोटो: दी लल्लनटॉप)

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि बिलासपुर में योजना लॉन्च होने के बाद से 159 लोगों का आयुष्मान योजना के तहत इलाज हुआ है. ऐसे ही एक मरीज बलबीर सिंह बिलासपुर के रीजनल अस्पताल में भर्ती थे. पेशे से किसान हैं. आयुष्मान योजना से बहुत खुश हैं. पीएम मोदी को शुक्रिया कहते हैं. बताते हैं पहले मरीजों के पास पैसा नहीं होता था, अब आयुष्मान से सहारा मिल गया. पहले जब सरकारी अस्पताल में इलाज करवाते थे तब पैसा लगता था. इंजेक्शन, दवाई खुद लानी पड़ती थी, पर अब एक पैसा नहीं लगा.
अस्पताल के कुछ अधिकारी ऑफ द रिकॉर्ड ही सही, बलबीर सिंह की बात से इत्तेफाक नहीं रखते. वो कहते हैं हमारे अस्पताल में एक-एक इंजेक्शन, दवाई से लेकर ऑपरेशन तक सब फ्री है. न पहले पैसा लगता था, न अब लगता है. जब कोई दवा अस्पताल में नहीं होती तो लोकल पर्चेज करके उसे मंगा लिया जाता है. यहां बात फिर वहीं अटक जाती है कि आयुष्मान आने के बाद आखिर बदला क्या?
आयुष्मान के नोडल अधिकारी डॉ. परविंदर सरकारी अस्पताल में फ्री इलाज की बात पर कहते हैं -
"ऐसा नहीं है कि लोगों को सारी चीज फ्री मिलती थीं. पर अब जो मरीज आता है और उसका आयुष्मान कार्ड बना है तो उसे जेब से एक पैसा नहीं लगाना है. अस्पताल का जो पैसा लगेगा वो सरकार दे देगी. पेशेंट के सिर पर कोई बोझ नहीं होगा कि जांच का पैसा देना है, दवाई लानी है. अब सुई से लेकर ऑपरेशन तक सरकार की ही जिम्मेदारी है."
डॉ. परविंदर, नोडल अधिकारी, आयुष्मान, बिलासपुर (फोटो- रजत सैन | दी लल्लनटॉप)
डॉ. परविंदर. बिलासपुर में आयुष्मान योजना के नोडल अधिकारी. (फोटोः दी लल्लनटॉप)

क्या सही लोगों को मिल रहा फायदा?

रूपलाल और लखविंदर जैसे लोगों को आयुष्मान योजना की जानकारी तक नहीं थी. इससे एक और सवाल खड़ा होता है कि क्या ये योजना सही लोगों तक पहुंच भी रही है. इस आशंका को और मजबूती मिली 19 मार्च की सुबह के करीब 12 बजे. रीजनल हॉस्पिटल के गेट के सामने एक सफ़ेद रंग की मारुति वैन आकर रुकती है. अंदर से केसरिया रंग की टीशर्ट पहने एक अधेड़ शख्स उतरता है. उसके हाथ में एक प्रिंटेड पर्चा था, जिस पर कोने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर छपी हुई थी, जिसमें वो बेहद गंभीर नजर आ रहे हैं. यह शख्स हॉस्पिटल के गेट के पास बने एल्यूमिनियम के केबिन में घुस जाता है. पर्ची थमाता है और वहां बैठे शख्स से आयुष्मान कार्ड बनाने के लिए कहता है. करीब 25 साल के दिखने वाले जयपाल, बिलासपुर रीजनल हॉस्पिटल में ये कार्ड बनाने का काम करते हैं. वो इस शख्स की पर्ची उठा लेते हैं. पर्ची पर सबसे ऊपर सरस्वती देवी का नाम दर्ज है. वो सात लोगों के परिवार की मुखिया हैं. जयपाल रिकॉर्ड खंगालते हैं. पूरा डेटा कंप्यूटर स्क्रीन पर आ जाता है. पर जयपाल सॉफ्टवेयर में दिक्कत की बात कहके उस आदमी को लौटा देते हैं. वो आदमी गाड़ी स्टार्ट करता है. लौट जाता है. जयपाल ने उसे क्यों लौटा दिया? कंप्यूटर चल तो रहा था. रिकॉर्ड भी सामने था. इसे समझने के लिए आयुष्मान का लाभार्थी नहीं होने की शर्तें पढ़नी पड़ेंगी. वो ये है कि अगर आपके पास दुपहिया, तीन-पहिया, चार-पहिया वाहन है या फिशिंग बोट है, तो आयुष्मान योजना आपके लिए नहीं है. और वो आदमी तो कार से आया था. वो लाभार्थी कैसे हो सकता है. वो इसलिए हो सकता है क्योंकि उसका नाम 2011 की जनगणना में जुड़ा रहा होगा जिसके आधार पर ही आयुष्मान के लाभार्थियों को छांटा गया है.

क्षेत्रीय चिकित्सालय बिलासपुर (फोटो- रजत सैन | दी लल्लनटॉप)
क्षेत्रीय चिकित्सालय बिलासपुर. (फोटोः दी लल्लनटॉप)

जयपाल इस पर कहते हैं उनका काम कार्ड बनाना है. जिसका भी नाम इस सॉफ्टवेयर में है उन्हें उसका कार्ड बनाना पड़ेगा. वो किसी को मना नहीं कर सकते. दावा तो यहां तक किया जाता है कि इस लिस्ट में ऐसे कार वाले लोगों के लाखों नाम हो सकते हैं जिनसे गरीबों का हक मारा जाएगा.
डॉ. परविंदर गलत लाभार्थियों को फायदा मिलने पर सफाई भी देते हैं. वो कहते हैं कि इसकी जांच करने का तरीका हमारे पास नहीं है. 2011 की जनगणना में जिन लोगों के नाम जुड़े हैं, उनको फायदा देना ही होगा. आयुष्मान का डेटा है भी 8 साल पुराना. तो हो सकता है कुछ लोग पहले गरीब रहे हों, मगर बाद में उनके हालात सुधर गए हों. अब डेटा पुराना है तो अंतर आ सकता है.

कितने वेलनेस सेंटर बने?

आयुष्मान भारत योजना के पहले हिस्से पर खूब बात हो गई. यानि बीमा पर. दूसरा हिस्सा है वेलनेस सेंटर. इसके अंतर्गत सरकार का देश भर में 1.5 लाख हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर बनाने का लक्ष्य था. वेलनेस सेंटर माने क्या? मतलब पहले से ही चल रहे प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों का अपडेटेड वर्जन. पर बिलासपुर में अब तक एक भी वेलनेस सेंटर नहीं डेवलप किया गया है. एक भी नहीं. 9 सेंटर तय जरूर हो गए हैं.
डॉ. परविंदर सिंह बताते हैं कि पूरे हिमाचल प्रदेश में ये अभी प्रॉसेस में है. बिलासपुर में नोटिफाई किए गए 9 सेंटर पर इसी मार्च से काम शुरू हो जाएगा. एक प्राइवेट एजेंसी को सरकार ने काम दे दिया है. वो बताते हैं कि सभी वेलनेस सेंटर में एक योगा ट्रेनर भी होगा. मगर फिलहाल मरीज खुद ही अनुलोम-विलोम कर रहे हैं.
रांची की रैली में योजना की घोषणा के दौरान नरेंद्र मोदी.
रांची की रैली में योजना की घोषणा के दौरान नरेंद्र मोदी.

योजना हिट या फ्लॉप?

आयुष्मान भारत योजना सितंबर 2018 में शुरू हुई. अभी 6 महीने बीते हैं तो हर काम अप टू डेट मिले. ऐसी उम्मीद करना बेइमानी है. मगर जब बात स्वास्थ्य मंत्री के क्षेत्र की हो तो उम्मीद करना बनता है. खैर हमें जो दिखा वो हमने आपको दिखाया. हम कोई निष्कर्ष नहीं देंगे, पर सरकार के लिए 5 छोटे सुझाव जरूर हैं -
1. लाभार्थी 2011 के सेंसस के अनुसार चुने जा रहे हैं. इसको रिवाइज किया जाना चाहिए ताकि नए गरीब इसमें जुड़ सकें और गलत की छंटनी हो जाए 2. छोटे जिलों में प्राइवेट अस्पतालों को जोड़ने के लिए अधिक प्रयास किए जाएं. डॉक्टरों से बात कर उनकी परेशानियों को सुलझाया जाए. 3. आयुष्मान मित्र इस योजना की लाइफलाइन हैं. गरीबों के लिए ये किसी वरदान से कम नहीं. इन मित्रों की भर्तियां हर हाल में सुनिश्चित की जानी चाहिए. 4. वेलनेस सेंटर एक अच्छा कॉन्सेप्ट है. इससे बड़े अस्पतालों पर बोझ घटेगा. ये जितनी जल्दी बनेंगे उतना अच्छा है. 5. योजना के प्रचार-प्रसार, लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए युद्धस्तर पर अभियान चलाए जाएं. ताकि इसका लाभ सही लोगों को सही समय पर मिल सके.
देश के स्वास्थ्य को लेकर सरकारें कितना सीरियस रही हैं इसे बताने के लिए ये आंकड़ा काफी है कि 2008 से 2015 के बीच हेल्थ पर खर्च जीडीपी का 1.3 फीसदी था. 2016 से 2017 में बढ़कर ये 1.4 फीसदी हो गया. जबकि हेल्थ बजट का ग्लोबल एवरेज 6 फीसदी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन भी 5 फीसदी हेल्थ बजट होने की बात कहता है. मगर तमाम दावों के बीच ये 1.4 फीसदी पर अटक कर रह जाता है. एक और बात, 2019-20 में देश का हेल्थ बजट 61,398 करोड़ रहा. ये पिछले साल के मुकाबले 13 फीसदी बढ़ा. उसमें भी अगर आयुष्मान का फंड निकाल दें तो ये बढ़ोतरी सिर्फ 6 फीसदी है.
आयुष्मान एक अच्छी योजना होने के बावजूद जमीन पर इस कमजोर बजट जैसी ही लगती है. हमने जिस क्षेत्र में जाकर पड़ताल की और जो मिला, उसे देख ये कह सकते हैं कि इस योजना में अभी बहुत पेच कसे जाने की जरूरत है.


Video: आयुष्मान भारत: 11 करोड़ लोगों को 5 लाख का बीमा देने वाली स्कीम में झोल कहां है?

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