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100 रुपए किलो! सर्दी में बिल्कुल सस्ता मिलने वाले टमाटर के दाम में आग क्यों लगी है?

और महंगे टमाटर का किसानों को कितना फायदा मिल रहा है?

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आमतौर पर सर्दियों में टमाटर की कीमतें 15 से 20 रुपए होती हैं लेकिन इस साल कई जगहों पर कीमतें 100 रुपए के पार चली गई हैं. (फोटो-ट्विटर से)
टमाटर का नाम बदलकर पेट्रोल कर देना चाहिए.
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टमाटर और पेट्रोल एक दाम करने के लिए थैंक्यू मोदी जी.
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मैं टमाटर नहीं खरीदती, मैं अपना फूड जोमैटो से ऑर्डर करती हूं.
Nirmala
दो किलो टमाटर खरीदने वाले लोगों, अमीरों वाली फीलिंग आनी चाहिए.
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टमाटर को लेकर ऐसे हजारों मीम्स सोशल मीडिया पर बन रहे हैं. वजह, देश के कई हिस्सों में टमाटर की कीमत 100 रुपए के पार जाना. न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, देश के कई हिस्सों में टमाटर की खुदरा कीमत 80 रुपए किलो है. दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में तो कीमत 120 रुपए किलो तक पहुंच गई है. केरल की बात करें तो यहां के कोट्टायम में टमाटर का दाम 120 रुपए प्रति किलो, एर्नाकुलम में 110 रुपए प्रति किलो, तिरुवनंतपुरम में 103 रुपए प्रति किलो और कोझीकोड में 90 रुपए प्रति किलो चल रहा है.
वहीं तमिलनाडु के रामनाथपुरम में टमाटर 119 रुपए प्रति किलो मिल रहा है. एक और दक्षिण राज्य कर्नाटक के धारवाड़ में 85 रुपए किलो, मैसूर में 84 रुपए पये किलो टमाटर बिक रहा है. वहीं देश की राजधानी दिल्ली की बात करें तो उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के 167 केंद्रों के आंकड़ों के अनुसार यहां टमाटर 72 रुपए प्रति किलो बिक रहा है.
टमाटर की बढ़ती कीमतों के बीच तमिलनाडु के सोथुपक्कम में एक बिरयानी वाले ने एक किलो बिरयानी खरीदने पर आधा किलो टमाटर फ्री देने का ऐलान कर दिया. इस ऑफर के तहत 350 लोगों ने बिरयानी खरीदी और अपने साथ आधा किलो टमाटर फ्री ले गए. इस दुकान पर बिरयानी 160 रुपए प्रति किलो बिकती है.

टमाटर इतना महंगा क्यों है?

आम तौर पर सर्दियां आने पर टमाटर 15 से 20 रुपए प्रति किलो बिकता है. लेकिन इस साल इसकी कीमतें 100 रुपए प्रति किलो के आंकड़े को पार कर रही हैं. ऐसा क्यों हो रहा है, ये जानने के लिए हमने बात की दिल्ली के आजादपुर टमाटर संघ के अध्यक्ष अशोक कौशिक से. उनका कहना है,
दिल्ली में ज्यादातर टमाटर दक्षिण भारत से आता है. बिन मौसम बारिश से पहली फसल नष्ट हो गई. इसलिए टमाटर की कीमतें बढ़ गई हैं. हालांकि पड़ोसी राज्यों उत्तराखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश से देसी टमाटर आने के कारण आजादपुर थोक बाजार में टमाटर की कीमतों में थोड़ी गिरावट आई है.
उन्होंने आगे बताया,
तीन दिन से टमाटर डाउन आया है. पहले जो टमाटर हमने 60 रुपए में खरीदा था, आज 40 रुपए पर आ गया है. ऐसे में बिचौलियों को नुकसान है. लेकिन जो आगे बेच रहे हैं उन्हें फायदा हो रहा है. वो ऊंची कीमत पर टमाटर बेच रहे हैं. मार्केट में बैठ लोगों को पता नहीं होता कि मंडी टूट गई है. दूसरी बात ये है कि जिन्होंने महंगे दाम पर माल खरीदा है वो डाउन नहीं बेचेंगे.
वहीं दी लल्लनटॉप से बातचीत में इंडियन एक्सप्रेस के एग्रीकल्चर एडिटर हरिश दामोदरन का कहना है,
टमाटर महंगा होने का मुख्य कारण बारिश है. आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से जो टमाटर आता है, खासतौर पर मदनपल्ली से, वो पूरा डैमेज हो गया है. इसलिए टमाटर महंगा मिल रहा है. दूसरी बात ये है कि यहां से सेंटिमेंट बन गया है. टमाटर का ज्यादातर प्रोडक्शन यहीं होता है. हालांकि मुझे नहीं लगता कि टमाटर महंगा होने को पॉलिटिकल टॉर्चर के रूप में देखना चाहिए. क्रॉप डैमेज हुआ है. इसमें कोई क्या कर सकता है.
आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में टमाटर की खेती वाले इलाके बारिश के कारण प्रभावित हुए हैं और देरी भी हुई है. आम तौर पर टमाटर की फसल बोने के लगभग दो से तीन महीने बाद तैयार हो जाती है. लेकिन अब तक आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक सहित टमाटर की खेती करने वाले प्रमुख राज्यों में कटाई चल रही है.

किसानों को कितना लाभ मिल रहा है?

हमें टमाटर 80 से 90 रुपए किलो मिल रहा है, लेकिन जो किसान इसकी खेती करते हैं उन्हें कितनी कीमत मिल रही है. ये जानने के लिए हमने बात की मध्य प्रदेश के शिवपुरी के किसान नवीन सिंह से. वो टमाटर के अलावा शिमला मिर्च की खेती करते हैं. उनका कहना है कि इस समय मंडियो में 1000 से 1200 रुपए में एक कैरेट टमाटर बिक रहा है. एक कैरट में 25 से 26 किलो टमाटर होता है. नवीन ने बताया,
हमारा माल 35 से 40 रुपए किलो बिक रहा है. लेकिन किचन तक पहुंचते-पहुंचते ये 70 से 80 रुपए हो जाता है. जो बीच का 50 प्रतिशत गैप है वो कहां जा रहा है? मान लीजिए कि हमने मंडी में टमाटर 40 रुपए किलो में बेचा. आढ़तिये ने उसे 45 रुपए में बेच दिया. वहां से छोटी मंडी वाले ले गए. लेकिन छोटी मंडी वाले को शाम तक 100 किलो टमाटर बेचना है. ऐसे में वे कीमत बढ़ा देते हैं.
नवीन का कहना है कि पांच रोज पहले तक उन्होंने 50 से 60 रुपए किलो टमाटर बेचा. अब ये डाउन होकर 35 से 40 रुपए पर आ गया है. लेकिन खाने वालों को ये अब भी 80 से 90 रुपए प्रति किलो मिल रहा है. जाहिर सी बात है बिचौलिए गड़बड़ कर रहे हैं.
Tomato (2) सांकेतिक तस्वीर.

हालांकि आजादपुर मंडी में APMC (Agricultural Produce Market Committee) के चेयरमैन रहे राजेंद्र शर्मा का मानना है कि ये कहना बिल्कुल गलत है कि आढ़तिया ही पैसा पीट रहे हैं. उनका कहना है,
आप मंडी आइए. आप देखकर हैरान हो जाएंगे कि जो टमाटर मंडी में आता है. अगर वो 25 किलो है तो 20 किलो भी खाने लायक नहीं होता. क्योंकि किसान हर तरह का टमाटर डालता है. लेकिन जो व्यक्ति हमसे खरीद रहा है, वो खरीदता है मार्केट कमेटी के नियम के अनुसार. आप कभी किसान से पूछिए कि क्या वो माल बेचते समय ग्रेड करता है. वो तरह-तरह का माल लाता है. अगर अधिकारी और मार्केट कमेटी ठीक हो तो मंडी में 50 प्रतिशत भी फल और सब्जी नहीं बिक सकते. क्योंकि डॉक्टर चेक करेगा और खराब निकलेगा तो वो कहेगा फेंक दो.
राजेंद्र शर्मा ने ये भी कहा कि जो काम किसानों को करना चाहिए, वो माल खरीदने के बाद रिटेलर करता है. उन्होंने बताया,
आप विदेश में देखिए, पूरे डिब्बे में एक रंग, एक साइज और एक टेस्ट होगा. लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है. क्योंकि हमारे यहां एक्शन नहीं होता. जिस दिन हमारे देश में ये चीज हो जाएगी 40 का माल 50 में बिकेगा.

कब कम होंगी कीमतें?

अशोक कौशिक का मानना है कि 8-10 रोज में टमाटर का दाम डाउन आ जाएगा. वहीं हरिश दामोदरन का कहना है कि मार्च के बाद टमाटर के दाम सामान्य होंगे, क्योंकि तब समर टौमैटो आने लगेगा. टमाटर की खेती कितनी फायदेमंद है? हरिश दामोदरन का कहना है कि टमाटर की खेती में बहुत पैसा लगता है. ये किसानों के लिए एक तरह से सट्टा है. कीमत घटती-बढ़ती रहती है. हरिश कहते हैं,
इसकी एक वजह ये भी है कि टमाटर की MSP नहीं है. टमाटर की खेती करने वाले किसान एक तरह से सट्टा खेल रहे हैं. वो सोचते हैं कि तीन फसल उगाते हैं. एक से पैसा बनाएंगे. एक एवरेज रहेगा और एक में नुकसान भी हो गया तो कोई बात नहीं. मान लीजिए कि किसी किसान के पास पांच एकड़ जमीन है तो वो एकाध एकड़ में टमाटर लगाता है और बाकी में दूसरी फसल.
दी लल्लनटॉप ने इस मुद्दे पर गुजरात में ‘एग्रीसाइंस एग्रो’ नाम की एग्रीकल्चर वेबसाइट चलाने वाले हर्षद गोहिल से बात की. उन्होंने बताया,
ये स्टॉक मार्केट जैसा है. ये तो है कि दाम बढ़ने पर मुनाफा बढ़ जाएगा. लेकिन हमारे यहां के सप्लाई चेन में किसान के पास मुनाफे का बड़ा हिस्सा आता ही नहीं है. डायरेक्ट फार्म टू कन्ज़्यूमर की थ्योरी अभी भी अमल में नहीं आ पाई है. इसलिए सब्जी का दाम बढ़ने पर भी किसान के हिस्से में बहुत कम ही मुनाफा आ पाता है.
इस बारे में शिवपुरी के किसान नवीन सिंह का कहना है,
जुलाई अगस्त में बुआई होती है. अक्टूबर में हार्वेस्टिंग शुरू हो जाता है और मार्च तक चलता है. टमाटर में दो लाख प्रति एकड़ की लागत आती है. सामान्य परिस्थितियों में टमाटर 4 से 5 लाख रुपए एकड़ बिक जाता है. अगर 20 का भाव मिलता रहे तो भी 4 लाख प्रति एकड़ मिल जाता है. लेकिन दाम 20 से नीचे जाए. 10 रुपए हो जाए, तो दिक्कत है.
नवीन सिंह की इस बात ने हमें वो दृश्य याद दिला दिए जिनमें बेहद कम कीमत मिलने के कारण किसान अपनी फसल को कभी आग लगाते दिखे, तो कभी सड़क पर फेंकते नजर आए. भले अभी टमाटर 100 रुपए किलो तक पहुंच गया है, लेकिन एक वक्त ऐसा भी आता है कि टमाटर की खेती करने वाले किसान को इसे सड़कों पर फेंकना पड़ता है. क्योंकि उस समय भाव दो से तीन रुपए किलो हो जाता है.

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