'जब ऐसा लगा कि ये सब (कोरोना का दौर) खत्म होने वाला है और जिंदगी फिर से सामान्य हो जाएगी, तभी हमें पता चला कि हम पैंडेमिक के सबसे भयावह दौर में प्रवेश कर चुके हैं. इतिहास के किसी भी वायरस से ज्यादा तेज ओमिक्रॉन फैल रहा है. जल्दी ही ये दुनिया के हर देश में होगा और हम सब ये भी नहीं जानते हैं कि ओमिक्रॉन हमारे लिए कितना खतरनाक हो सकता है. जब तक हमें इसके बारे में पता नहीं चल जाता, तब तक हमें बेहद सावधान रहना होगा. भले ही ये डेल्टा वेरिएंट के मुकाबले कम घातक हो, लेकिन इस संक्रमण के फैलने की रफ़्तार काफी तेज है.'माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) के को-फाउंडर बिल गेट्स (Bill Gates) ने 21 दिसंबर को एक के बाद एक ट्वीट कर ओमिक्रॉन को लेकर ये चेतावनियां दीं. पिछले साल डेल्टा वेरिएंट के बारे में भी बिल गेट्स ने जो कुछ कहा था उसमें से काफ़ी कुछ सच साबित हुआ था.
बात करेंगे कि ओमिक्रॉन को इतना खतरनाक आखिर क्यों बताया जा रहा है. ओमिक्रॉन का स्ट्रक्चर हमने आपको ओमिक्रॉन के बारे में पिछले एक एपिसोड में विस्तार से बताया था
कि साउथ अफ्रीका के वैज्ञानिकों को इस वेरिएंट के बारे में कैसे पता चला. रकेल विएना साउथ अफ्रीका की एक सीनियर मेडिकल साइंटिस्ट हैं और यहां के सबसे बड़े प्राइवेट लैब 'लैंसेट लेबोरेटरीज़' में काम करती हैं. 19 नवंबर को इसी लैब को सबसे पहले कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन (Omicron) के बारे में पता चला था.
रकेल ने जब पहली बार माइक्रोस्कोप पर ओमिक्रॉन को देखा था तो शॉक्ड रह गई थीं, क्योंकि इसमें 50 से भी ज्यादा म्यूटेशन थे. इनमें से 32 म्यूटेशन तो इसके स्पाइक प्रोटीन में देखे गए थे. और यही वो असली वजह है जिसके चलते ओमिक्रॉन इतिहास का सबसे तेज़ी से फैलने वाला वायरस बनने की ओर है. लेकिन कैसे?
दरअसल वायरस की ऊपरी सतह पर उभरी हुई इन आकृतियों (स्पाइक प्रोटीन) के सहारे ही वायरस हमारे बॉडी सेल्स में घुसता है. अब चूंकि स्पाइक प्रोटीन पर 32 म्यूटेशन हैं, जोकि काफ़ी ज्यादा हैं, ऐसे में न तो एंटीबॉडी वायरस को पहचान पा रहे हैं और न ही इतने ज्यादा स्पाइक प्रोटीन्स पर हमला करके ओमिक्रॉन के वायरस को रोक पा रहे हैं.

लाल रंग की संरचनाएं ओमीक्रॉन और डेल्टा वायरस पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन म्यूटेशन हैं (फोटो सोर्स -ट्विटर)
ओमिक्रॉन कितना तेज़ फैलता है? ओमिक्रॉन का स्ट्रक्चर इसे ज्यादा ट्रांसमिसिबल बनाता है. अपनी अधिकारिक खोज होने के एक महीना पहले से अब तक यानी करीब 2 महीने में ओमिक्रॉन ये साबित भी कर चुका है. WHO के दिए आंकड़ों से इसकी फैलने की दर समझें तो ओमिक्रॉन साउथ अफ्रीका से शुरू होकर अब तक करीब 100 देशों में फ़ैल चुका है. हालांकि ज्यादातर देशों में केस अभी भी डेल्टा वेरिएंट के ही ज्यादा हैं, लेकिन अमेरिका और यूरोप में इसके बढ़ते मामलों ने संकेत दे दिया है कि जल्दी ही ओमिक्रॉन बड़ी संख्या में लोगों को अपनी चपेट में लेगा.
एक शब्द याद होगा आपको– कम्युनिटी ट्रांसमिशन. कोविड-19 के शुरुआती वक़्त में कहा जाता था कि कोरोना के मरीजों की चेन कहां से शुरू हुई और कहां तक फ़ैल चुकी है ये बता पाना मुश्किल हो जाए तो इसका मतलब है कि कोरोना वायरस अब कम्युनिटी ट्रांसमिशन की स्टेज में आ चुका है. और अब ओमिक्रॉन किस रफ़्तार से फ़ैल रहा है, ये समझने के लिए सिर्फ इतना तथ्य काफ़ी है कि ऐसे कई लोग ओमिक्रॉन से संक्रमित पाए गए हैं जिनकी कोई ट्रेवेल हिस्ट्री ही नहीं थी.
WHO से लेकर भारत के बड़े स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी साफ़ कहा है कि ओमिक्रॉन की ट्रांसमिसिबिलिटी डेल्टा वेरिएंट से कई गुना ज्यादा है. मेदांता हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहन ने भी 'दी लल्लनटॉप' से हुई बातचीत में कहा कि ओमिक्रॉन, डेल्टा वेरिएंट से 3 से 4 गुना ज्यादा तेज़ी से फैलता है. कितना जानलेवा है ओमिक्रॉन? इस बारे में साफ़ शब्दों में कुछ कहना अभी मुश्किल है. कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि ये डेल्टा वेरिएंट की तुलना में माइल्ड है यानी हल्के लक्षणों वाला है, ज्यादा जानलेवा नहीं होगा. वहीं कुछ रिपोर्ट्स ये कहती हैं कि अभी इसे कम या फिर ज्यादा जानलेवा बताना दोनों ही सही नहीं है. वजह यही, कि इसमें किसी भी और वेरिएंट की तुलना में 3 से 5 गुना तक ज्यादा म्यूटेशंस हैं.
स्पाइक म्यूटेशंस ज्यादा होने का एक परिणाम तो हम आपको बता ही चुके, कि इससे वायरस तेज़ी से फैलता है. दूसरा बुरा परिणाम भी समझ लीजिए.
वैक्सीन लेने के बाद हमारे शरीर में एंटीबॉडी बनते हैं जो इन्हीं स्पाइक प्रोटीन पर हमला करके वायरस को न्यूट्रलाइज़ करते हैं. अब चूंकि स्पाइक प्रोटीन पर म्यूटेशन ज्यादा हैं तो हमारे शरीर के एंटीबॉडीज़ के लिए इन स्पाइक प्रोटीन पर हमला करके वायरस को हरा पाना मुश्किल हो जाता है.
हालांकि यूनिवर्सिटी ऑफ़ हांग कांग की एक ताज़ा रिपोर्ट
कुछ राहत देने वाली है. इसके मुताबिक ओमिक्रॉन, डेल्टा वेरिएंट से ज्यादा, कहीं ज्यादा तेज़ी से फैल सकता है, लेकिन कई गुना कम जानलेवा हो सकता है. अब रिपोर्ट इसे कम जानलेवा कैसे बता रही है इसे आसान भाषा में समझते हैं.
दरअसल कोरोना के गंभीर लक्षण वाले मरीजों में जानलेवा स्थिति तब बन आती है जब वायरस मरीज़ के फेफड़ों में मल्टीप्लाई होना शुरू कर देता है. किसी वजह से अगर फेफड़े कमज़ोर हुए (या नहीं भी हुए) तो वायरस की बढ़ती हुई तादात के आगे फेफड़े कोलैप्स कर जाते हैं. इसीलिए गंभीर मरीजों के मामलों में सर्वाइवल के चांस बताने के लिए डॉक्टर फेफड़ों का CT स्कैन करवाने को कहते हैं. यानी ख़तरा-ए-जान इस बात से तय होता है कि लंग्स का हाल कैसा है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, ओमिक्रॉन वेरिएंट श्वासनलियों में तो डेल्टा वेरिएंट से 70 गुना ज्यादा तेज़ी से मल्टीप्लाई करता है, लेकिन फेफड़ों में डेल्टा से दस गुना कम रफ़्तार से अपनी तादात बढ़ाता है. अब श्वसन नलियां भी सुरक्षित रहना ज़रूरी तो हैं, लेकिन इन्हें वाइटल ऑर्गन की श्रेणी में नहीं रखा जाता. माने इन्हें अगर कुछ अंदरूनी नुकसान हो भी जाए तो हीलिंग के लिए वक़्त मिल जाता है. सीधे जान पर नहीं बनती. इसी निष्कर्ष के आधार पर रिपोर्ट कहती है कि ओमिक्रॉन वेरिएंट, डेल्टा वेरिएंट से कम खतरनाक रहेगा.

बार चार्ट (फोटो साभार- Univeristy of Hongkong)
वैक्सीनेटेड लोग कैसे संक्रमित हो रहे? अब तक आप समझ चुके हैं कि वैक्सीन कितना काम कर पाती है और ओमिक्रॉन उनसे बनीं एंटीबॉडीज़ को कैसे मात दे सकता है. चर्चा इस बात की भी है कि कोई वैक्सीन कितने समय तक के लिए हमारे शरीर में एंटीबॉडीज़ बना पाती है.
इसी सवाल के जवाब में बूस्टर डोज़ की आवश्यकता पर भी बहस चल रही है. WHO से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों तक. केंद्र सरकार का कहना है कि हम साइंटिफिक अप्रोच से आगे बढ़ेंगे, जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मांग है कि जब बूस्टर डोज़ दी ही जानी हैं तो देर क्यों?
लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई बूस्टर डोज़ की ज़रूरत है? और क्या सरकार के मुताबिक भारत के वो साठ फ़ीसद लोग जिनका डबल डोज़ वैक्सीनेशन हो चुका है, उन्हें भी ओमिक्रॉन से उतना ही ख़तरा है जितना सिंगल डोज़ वाले लोगों को या एक भी वैक्सीन डोज़ न लेने वालों को है? अगैन, कोई स्पष्ट जवाब नहीं है. बट एक रिपोर्ट का जिक्र किया जा सकता है.
मेडिकल क्षेत्र की जानी-मानी पत्रिका Nature की एक रिपोर्ट के अनुसार
, अभी तक जितने भी कोरोना टीके आए हैं, वे सभी साल 2019 में चीन के वुहान शहर से आए कोरोना वेरिएंट पर बेस्ड हैं. और ऐसे में डेल्टा, बीटा, ओमिक्रॉन जैसे खतरनाक और संक्रामक वेरिएंट से निपटने के लिए अलग-अलग 'वेरिएंट स्पेसिफ़िक वैक्सीन' बनाए जाने की ज़रूरत है. फाइजर, मॉर्डना, एस्ट्राजेनेका वगैरह इस मामले में ट्रायल मोड में हैं और जल्दी ही ओमिक्रॉन के लिए स्पेसिफ़िक वैक्सीन आने की उम्मीद भी है.
कई एक्सपर्ट्स ये भी कहते हैं कि पैन-कोरोनावायरस (Pan Coronavirus ) वैक्सीन बनाई जानी चाहिए जो वायरस के कई वेरिएंट के खिलाफ प्रभावी हो.
बूस्टर डोज़ और उससे जुड़ी चर्चाओं पर फिर बात करेंगे. फ़िलहाल न तो सरकार के पास इसका सटीक जवाब है कि वैक्सीन ले चुके लोगों को कोरोना वायरस क्यों हो रहा, और न स्वास्थ्य संगठनों से लेकर वैक्सीन बनाने वालों तक के पास. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि जानकारी और सतर्कता ही बचाव है. जानकारी हम देते रहेंगे, लेकिन सतर्कता आपकी ज़िम्मेदारी है.























