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बिजली बिल के चार बड़े प्रस्तावों को मोदी सरकार ने क्यों झटक दिया?

डायरेक्ट सब्सिडी, डी-लाइसेंसिंग ठंडे बस्ते में.

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बिजली सेक्टर की सांकेतिक तस्वीर
चुनावों की सबसे बड़ी ताकत शायद उनके होते रहने में ही है. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के हालिया फैसले इस बात को एक तरह से साबित करते हैं. अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए पिछले महीने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने वाली सरकार ने अब बिजली संशोधन बिल (The Electricity Amendments Bill 2021) पर भी कदम पीछे खींच लिए हैं. उसने बिल के उन चार प्रस्तावों को खत्म करने का फैसला किया है, जिनका किसानों, कर्मचारियों और विपक्षी दलों की ओर से जमकर विरोध हो रहा था.
यहां हम आसान भाषा में जानेंगे कि ये चार प्रस्ताव क्या थे और उन पर इतना हंगामा क्यों मचा था. साथ ही ये भी कि इनके लागू होने से हम-आप पर क्या असर होता. लेकिन उससे पहले जान लें कि इन प्रस्तावों को हटाने के बाद सरकार बाकी संशोधनों वाला विधेयक भी संसद के मौजूदा सत्र में पेश नहीं करने जा रही है.

डी-लाइसेंसिंग

नए बिल के विरोध में आपने सुना होगा कि सरकार बिजली क्षेत्र का निजीकरण करने जा रही है. बात नई नहीं है. ये कवायद तो दो-तीन दशक पहले ही शुरू हो गई थी. लेकिन इस बिल में सरकार ने एक नया शिगूफा छेड़ा था. कहा गया कि अब एक ही इलाके में कई बिजली कंपनियां (डिस्ट्रिब्यूटर) होंगी. कंज्यूमर की मर्जी होगी कि वो बिजली किससे ले. ठीक वैसे ही जैसे डीटीएच के लिए आपके पास विकल्प है कि टाटा स्काई लें, एयरटेल या कोई और.
यहां डिस्ट्रिब्यूटर शब्द पर थोड़ा गौर करने की जरूरत है. पूरे बिजली क्षेत्र को तीन भाग में बांट सकते हैं- जेनरेशन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन. आज भी देश में 48 फीसदी पावर जेनरेशन प्राइवेट सेक्टर के हाथ में है. ट्रांसमिशन यानी पावर प्लांट से आपके शहर तक बिजली लाने की जिम्मेदारी सरकार ही उठाती आ रही है. एक शहर या मुहल्ले के भीतर घर-घर बिजली पहुंचाना ही डिस्ट्रिब्यूशन कहलाता है. अभी 10 प्रतिशत डिस्ट्रिब्यूशन ही प्राइवेट कंपनियों के हाथ में है, वो भी दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में.
सरकार का कहना है कि वो कोई अतिरिक्त निजीकरण नहीं करने जा रही, बल्कि वितरकों का एकाधिकार खत्म करना चाहती है. पिछले बजट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि पूरे देश में बिजली वितरण कंपनियों की मोनोपॉली चल रही है, चाहे वो सरकारी हों या प्राइवेट. उनका कहना था कि उपभोक्ताओं के पास चॉइस होनी चाहिए कि वे किसकी बिजली लें. सरकार सिर्फ 'एंट्री बैरियर' खत्म कर रही है. यानी किसी इलाके में पहले से मौजूद डिस्ट्रिब्यूटर तो काम करता रहेगा, दूसरी कंपनियों को भी वहां बिजली बेचने की इजाजत होगी. कीमतों पर मनमानी रोकने के लिए सरकार के पास एक उच्चतम सीमा तय करने का अधिकार होगा. कोई कंपनी इस सीमा से नीचे किसी भी कीमत पर बिजली बेच सकती है. विरोध क्यों? आरोप था कि सरकार अरसे से कॉर्पोरेट घरानों और वर्ल्ड बैंक के दबाव में बिजली वितरण का निजीकरण खुदरा व्यापार की तरह करना चाहती है. फ्रेंचाइजी या सब-लाइसेंसी सिर्फ नाम के रह जाएंगे और बड़ी कंपनियां आपस में गठजोड़ कर फिर मोनोपॉली शुरू कर देंगी. अभी जिस तरह मोबाइल कंपनियां बेतहाशा दाम बढ़ा रही हैं और ग्राहकों के पास विकल्प सीमित रह गए हैं, वहां भी कंपनियों को मनमानी के लिए कोई न कोई लूपहोल मिल जाएगा. सवाल ये भी उठा कि बड़े शहरों में तो ये मॉडल चल भी जाएगा, लेकिन सरकारी वितरण पर निर्भर कस्बों और ग्रामीण इलाकों में लोग निजी कंपनियों को अफोर्ड नहीं कर पाएंगे. बिजली कटौती या गुणवत्ता को भी सरकार काबू नहीं कर पाएगी.
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बिजली कनेक्शन की सांकेतिक तस्वीर (साभार: बिजनेस टुडे)

डायरेक्ट सब्सिडी

संशोधन बिल का ये प्रस्ताव अरसे से चर्चा में रहा है और यही किसानों की आंख की किरकिरी बना हुआ था. मकसद ये है कि केंद्र या राज्य सरकारें बिजली कंपनियों को जो भारी सब्सिडी देती हैं, वो सीधे जनता के बैंक खाते में जाए. जनता कंपनी को भुगतान करे. इसके फायदे भी बेशुमार हैं, मसलन बिजली की चोरी रुकेगी. वो फर्जीवाड़ा कर सब्सिडी नहीं मार पाएंगी. सब्सिडी जरूरतमंदों तक पहुंचेगी.
सबसे बढ़कर ये कि जब लोगों की जेब से पैसे जाएंगे और फिर सरकार की ओर से भरपाई होगी, तब उन्हें महसूस होगा कि सरकार वाकई कितनी सब्सिडी दे रही है. इससे बिजली की फिजूलखर्ची भी रुकेगी. मसलन, आंध्र प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में तो किसानों को बिजली मुफ्त या मामूली दरों पर मिलती है. इसका बोझ राज्य सरकारें उठाती हैं और कंपनियों को भारी सब्सिडी देती हैं. ऐसे में किसान सिंचाई के नाम पर जरूरत से ज्यादा पानी खर्च करते हैं. इससे अंडरग्राउंड वाटर लेवल गिरता है. किसान पहले अपनी जेब से बिल देगा तब उसे बिजली की सही कीमत समझ में आएगी. विरोध क्यों? इसका किसान ही नहीं, कई राज्य सरकारें भी विरोध कर रही थीं. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार हर महीने 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त और 400 यूनिट तक बेहद किफायती देती है. बदले में बिजली कंपनियों को करीब 3000 करोड़ रुपये की सालाना सब्सिडी दी जाती है. इसका उसे सियासी फायदा भी मिलता रहा है. डायरेक्ट सब्सिडी से उन सरकारों को डर था जो अपने यहां डायरेक्ट सब्सिडी दे रही थीं. उन्हें लग रहा था कि इससे पासा पलट सकता है, क्योंकि गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग बिल भरने की हालत में नहीं होंगे.
देश में दी जाने वाली कुल बिजली सब्सिडी का आधे से ज्यादा पंजाब के किसानों को मिलता है. वहां किसानों में इसे लेकर खासी नाराजगी थी. चुनाव में जा रही सरकार भी नहीं चाहती थी कि कोई खलल पड़े. डायरेक्ट सब्सिडी उन लाखों लोगों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है, जो किराए के मकान में रहते हैं या कोई दुकान चलाते हैं. यहां बिजली कनेक्शन तो मालिक के नाम से होता है. सब्सिडी मालिक के खाते में आती. लेकिन भारी बिलों का बोझ किरायेदार पर पड़ता.
दूसरी ओर क्रॉस सब्सिडी घटाने और धीरे-धीरे खत्म करने की बात भी कही गई थी. क्रॉस-सब्सिडी का मतलब है कि सरकार एक तरफ गरीब तबकों को किफायदी दरों पर बिजली देती है और दूसरी तरफ अमीर या औद्योगिक उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे लेती है. ऐसे में एक तरह से अमीरों पर बोझ, गरीबों के लिए राहत बन जाती है.
क्रॉस सब्सिडी घटने से सरकारों पर बोझ बढ़ना तय है. मसलन, मान लीजिए बिजली का रेट 6 रुपये प्रति यूनिट है. कोई सरकार गरीबों को 4 रुपये और उद्योगों को 8 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली देती है. एक तरफ के अतिरिक्त दो रुपये दूसरी तरफ शिफ्ट हो जाते हैं और सरकार पर कोई बोझ नहीं पड़ता. देशभर में ये मॉडल लोकप्रिय रहा है. लेकिन इसे इंडस्ट्री फ्रेंडली नहीं माना जाता और विकास में बाधक समझा जाता है. विरोधियों का कहना था कि ये कदम भी कॉर्पोरेट के दबाव में और बिजली कंपनियों को ज्यादा फायदा पहुंचाने के लिए उठाया जा रहा है.
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देश में सबसे ज्यादा बिजली सब्सिडी पंजाब के किसानों को मिलती है. (साभार: आजतक)

एन्फोर्समेंट अथॉरिटी

बिजली बिल में इलेक्ट्रिसिटी कॉन्ट्रैक्ट एन्फोर्समेंट अथॉरिटी (ECEA) के गठन का प्रस्ताव था. इसका मकसद उत्पादन और डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों के बीच कॉन्ट्रैक्ट को सही तरीके से लागू करवाना होगा. यानी देश में बिजली की खरीद, बिक्री और वितरण में पैदा होने वाले विवादों का निपटारा इसके जिम्मे होगा. इसके पैरोकारों का कहना था कि इससे विवादों के निपटारे में तेजी आएगी. कंपनियों और सरकार दोनों को राहत मिलेगी.
आरोप ये भी है कि स्टेट कमीशन अक्सर कंपनियों के साथ विवाद पर सरकार के पक्ष में ही फैसले देते हैं. बिजली कंपनियां भी नई अथॉरिटी के पक्ष में थीं. हालांकि बिजली के दाम तय करने या इससे जुड़े विवादों को इस अथॉरिटी के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया था. लेकिन कई राज्य सरकारों ने इसका खुलकर विरोध किया और इसे संविधान के संघीय ढांचे के खिलाफ भी बताया गया. विरोध क्यों? फिलहाल राज्यों के स्तर पर स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेग्युलेटरी कमीशन (SERCs) टैरिफ रेग्युलेट करने से लेकर विवादों का निपटारा भी करता है. इसी रह केंद्रीय स्तर पर सेंट्रल रेग्युलेटरी इलेक्ट्रिसिटी कमीशन (CERC) है, जो दो राज्यों के बीच ट्रांसमिशन के मसले निपटाने से लेकर कई बड़े फैसले करता है. इससे ऊपर अपीलेट ट्राइब्यूनल ऑफ इलेक्ट्रिसिटी (APTEL) है. इन तीनों ही स्तरों पर विवाद नहीं निपटने के बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाने का रास्ता भी है.
विरोधियों कहना था कि कई अधिकार जो अभी राज्य कमीशनों के पास हैं, अब नई अथॉरिटी झटक लेगी. चूंकि इसमें केंद्रीय दखल चलेगा, ऐसे में निष्पक्षता भी संदेह के घेरे में होगी. बिजली संविधान की समवर्ती सूची में रखी गई है. यानी इस पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों को है. ऐसे में विवादों के निपटारे का क्षेत्र पूरी तरह केंद्र के पाले में झुक जाएगा. उत्पादक और वितरक के बीच के विवाद में जनता के हित भी अहम होते हैं. ऐसे में राज्य सरकार की भागीदारी जरूरी हो जाती है. अथॉरिटी में राज्य की नुमाइंदगी इसलिए भी जरूरी है कि कभी जन-विरोधी कॉन्ट्रैक्ट न होने पाए.
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रेगुलेशन सिस्टम की सांकेतिक तस्वीर (साभार: इंडिया टुडे)

सेलेक्शन कमिटी

बिल में एक कॉमन सेलेक्शन कमिटी बनाने का प्रस्ताव था. ये कमिटी इलेक्ट्रिसिटी कॉन्ट्रैक्ट एन्फोर्समेंट अथॉरिटी (ECEA) के सदस्यों, केंद्रीय (CERC) और राज्य कमीशनों (SERC) के सदस्यों का चुनाव करेगी. इसका मकसद बिजली नियामक आयोगों में राजनीतिक दखलंदाजी और पक्षपातपूर्ण नियुक्तियों को रोकना है. इस कमिटी में राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर था. केंद्र सरकार कई बार कह चुकी है कि राज्य आयोगों में स्थानीय सरकार के ही लोग भरे होते हैं. ऐसे में टैरिफ से लेकर कॉन्ट्रैक्ट विवाद में सही फैसले नहीं लिए जाते. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अगुवाई वाली कमिटी को पूरी तरह अराजनीतिक बनाने का दावा किया गया था. विरोध क्यों? राज्यों ने इस मसले पर केंद्र से कड़ा ऐतराज जताया था. उनका आरोप था कि निष्पक्ष बोर्ड की आड़ में केंद्र अपनी दखलंदाजी को मजबूत कर रहा है. मांग ये भी होती रही कि इसकी कमान सुप्रीम कोर्ट के जज के बजाय ऐसे व्यक्ति के हाथ होनी चाहिए जिसके पास बिजली क्षेत्र का अनुभव हो. ये भी आरोप लगाया गया कि भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से इतने बड़े देश में केंद्रीयकरण कई समस्याएं पैदा करेगा. अभी तक हर राज्य में सेलेक्शन बोर्ड होता था. बिल के विरोध में सड़कों पर उतरे बिजली कर्मचारियों ने यहां तक आशंका जताई कि ये कमेटी धीरे-धीरे निचले स्तरों की नियुक्तियों के लिए केंद्रीकरण या निजीकरण का रास्ता खोलेगी. इससे हजारों नौकरियां जाएंगी.

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