अपने देश के लिए बुरा लगना बुरा है क्या?
दरअसल वो बहुत सीधे लोग हैं. इतने सरल हैं कि उनकी सरलता से डर लगने लगता है.
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Source- Reuters
उनके नायक गुटखा दबाए एंकर हैं. जो कैमरे के सामने चिल्ला-चिल्लाकर वो कहने का अभिनय कर रहे हैं. जो वो समझ पाते हैं और जो शायद वो कहना भी चाह रहे होंगे. एंकर हीरो हैं. अंग्रेजी में भी गरिया पाते हैं. पूरे शोर के साथ. उन्हें लगता है बखिया उधेड़ी जा रही है. वो मगन हो जाते हैं. जल्द ही मंदिर बनेंगे. जहां एंकरों की मूर्तियां रखी जाएंगी. हवन होंगे. एंकर्स नए भारत के नए अवतार हैं. चौराहे पर खड़े होइए. 10 लोगों से पूछिए JNU में जो हुआ वो सही था या गलत? ज्यादातर कहेंगे गलत हुआ. उनका कहना गलत है क्या? नहीं! कुछ कहेंगे, बहुत गलत हुआ, मार दो, भगा दो. ये गलत है. पर अब भी गलती उनकी नहीं है. इस मार दो के पीछे 69 साल खपाए गए हैं. उन्हें कश्मीर दिखता है, गोले-बम दिखते हैं. टेररिज्म दिखता है. तमाम वो चीजें दिखती हैं जो हैं भी, और बार-बार उन्हें दिखाई भी गई हैं. उनने देखनी भी चाही हैं. उनको नहीं पता कि अफज़ल की फांसी पर किसी को ऐतराज़ क्यों हो सकता है. उनको ये समझ नहीं है कि AK-47 लेकर संसद में घुसना और उसी मामले से जुड़े एक शख्स की पैरवी करना, उसके फेवर में दो नारे लगा देना. दो अलग बाते हैं. उनने वो देखा है जो सुलभ था, हर कोई JNU का नहीं है. हर किसी की समझ आपके जैसी नहीं है. उन्हें समझाया भी तो नहीं जा रहा. हर कोई क्रांति में जुटा है और उन्हें लगने लगा है. हर मंसूबा उनके खिलाफ बांधा जा रहा है. दरअसल उन्हें कुछ बताने की कभी जरूरत ही नहीं समझी गई. उनको दिखता क्या है? देशभर में 700 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज तो होंगी ही. वैसी ही यूनिवर्सिटी का एक लड़का है. चलो प्रेसिडेंट है. उसके लिए सुप्रीम कोर्ट पुलिस कमिश्नर पर चढ़े बैठी है. सारे देश का ध्यान बस इस पर लगा है कि उसके साथ क्या हो रहा है. वो भी तब जब एक बड़े वर्ग के अनुसार उसने कुछ गलत किया है. आप कहते हैं सरकार गलत कर रही है तो वो खुश होते हैं कि सरकार कुछ तो कर रही है. और ऐसे ही सरकार के गलत करने के रास्ते खुलते हैं फिर कोई कुछ नहीं बोल पाता, फिर कोई आपकी नहीं सुनता. आप नारे लगाने में खप रहे हैं. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा. आदमी के शरीर में 70% पानी होता है तो 140% PDA होता होगा. संभव नहीं है, पर होता ही होगा. यहां देश के लिए बड़ा PDA भरा है. कमजोरियां भी उसी के तले छुपा लेना चाहते हैं. ये जो वकील हाथ चला रहे हैं वो भी संगठित नहीं हैं, उन्हें कोई पार्टी नहीं भेज रही है. कोई पार्टी इतनी मूर्खता नहीं करेगी. वो भी ऐसे ही लोग हैं. पर वो बहस नहीं करना चाहते. हाथ चलाकर PDA दिखाना चाहते हैं. दरअसल बहुत भावुक और एक सी सोच वाले करोड़ों लोग इस देश में हैं. जो खुद की अच्छाई-बुराई में लिपटे पड़े हैं. वो बहुत अच्छे लोग हैं. इतने सरल हैं कि उनकी सरलता से खीझ होने लगती है. उन्हें अपनी चीजें अच्छी लगती हैं. अपनी चीजों के लिए वो इनसिक्योर भी फील करते हैं, देश भी उसी में एक है. देश भी एक चीज है. आप कितने भी लॉजिकल हो जाएं कभी कोई कन्हैया कुमार उनका हीरो नहीं बनेगा.
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