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दुनिया के इस देश में कोई हराम-ज़ादा नहीं होता

निर्मल वर्मा ने भी 1965 में अपनी बुक 'चीड़ों पर चांदनी' में इस मुल्क का जिक्र किया था.

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आइसलैंड में इंडिपेंडेंट मदर्स पर फोटोग्राफर एनी लिंग की सीरीज में से एक बच्ची की तस्वीर जो स्वतंत्र मां की संतान है.
आइसलैंड, एक ख़ूबसूरत देश. साफ़ पानी. खुली हवा. जीने के लिए माकूल माहौल. सबसे कम क्राइम रेट. 3 लाख से कुछ ही ज्यादा की आबादी. दुनिया में सबसे ज्यादा फेमिनिस्ट माना जाने वाला देश. औरत-मर्द का रेशियो बराबर  का. अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने आइसलैंड को एक तरह का इकोनॉमिक मिरैकल  कहकर नवाजा था.
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के मुताबिकः
आइसलैंड में 88% औरतें नौकरीशुदा हैं, यूनिवर्सिटी में 65% स्टूडेंट लड़कियां हैं, 41 % सांसद औरतें हैं. 
1980 में आइसलैंड ने अपनी पहली महिला राष्ट्रपति विगदिस को चुना. वे आइसलैंड ही नहीं पूरे यूरोप में राष्ट्रपति बनने वाली पहली महिला थीं.
इतनी ख़ास बातों में सबसे ख़ास बात ये है कि आइसलैंड में 67% बच्चे बिनब्याहे मां-बाप के है. ये नए तरह का समाजशास्त्र है. जहां एशिया, यूरोप सभी जगह लोगों को इस बात का डर दिखाया जाता है कि मां-बाप के तलाक से बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. लेकिन हैप्पीनेस इंडेक्स में 10 में 7.5 नंबर लाके इस थ्योरी को झूठ साबित कर दिया है. दुनिया के लिए कुंवारी मां शर्म की बात हो सकती है लेकिन वाइकिंग्स की इस धरती पर ये शान का मामला है.
ग़ज़ब का ख़ूबसूरत देश और उससे भी ख़ूबसूरत लोग. बिलाशक आइसलैंड हमारे लिए जैसे कोई दूसरा ग्रह हो.
Ling/Independent Mothers - PB.:
फ़ोटो: एनी लिंज

आइसलैंड में नगर निगम ने सिंगल मांओं के लिए बहुत सारे इंतजाम कर रखे हैं. बच्चे जब प्लेग्रुप में होते हैं तो उसका 95% खर्च का जिम्मा सरकार उठाती है और 5 साल तक के वो बच्चे जो सरकारी स्कूलों में होते हैं उनके खर्च का 90% .
बच्चों के लिए ही मां-बाप का साथ रहना आइसलैंड में किसी विदेशी अवधारणा की तरह है. सिंगल गर्भवती महिलाओं के लिए तो माहौल इतना सामान्य है कि सबसे बड़े विश्वविद्यालय रेकेविक यूनिवर्सिटी में प्रेग्नेंट औरतें आराम से काम करते, क्लास करते हुए दिख जाएंगी.
Ling/Independent Mothers - PB.:
सरकार की पॉलिसी सिंगल मांओं के पक्ष में

मशहूर साहित्यकार निर्मल वर्मा ने भी 1964 में आई अपनी किताब 'चीड़ों पर चांदनी' में आइसलैंड के इस अद्भुत सोशल स्ट्रक्चर का जिक्र किया है. आइसलैंड के माहौल के लिए ये समीकरण अच्छा है.

पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा जन्म दर+ सबसे ज्यादा तलाक़+ कामकाजी औरतों की सबसे ज्यादा संख्या= दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत और खुशनुमा देश.

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अब बाकी दुनिया के अनुसार इसी समीकरण को दूसरे शब्दों में लिखें तो ढेर सारे बच्चे+ बिखरे परिवार+ घर से गायब मांएं. कुल मिलाके पूरे समाजशास्त्र की बर्बादी. लेकिन आइसलैंड ने यूनाइटेड नेशन्स डेवेलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) के हालिया सोशियो- इकोनॉमी इंडेक्स में टॉप करके सारे पूर्वाग्रह ध्वस्त कर दिए हैं.
और बात जब औरतों के सम्मान और बराबरी की हो. तो आइसलैंडी अपनी रौ में आ जाते हैं. जेंडर इक्वैलिटी में वो जरा भी कोताही बर्दाश्त नहीं कर सकते.

जब आइसलैंड की औरतों ने चलाया #FreeTheNipples मूवमेंट

आइसलैंड के स्कूल की एक लड़की की टॉपलेस फोटो किसी ने बिना उसकी रजामंदी के इंटरनेट पर डाल दी गई थी. गुस्साए आइसलैंड ने मार्च 2015 में #FreeTheNipples कैंपेन चला दिया. हर उमर की लड़कियां बिना टॉप बिना ब्रा सड़कों पर घूमने लगीं, पार्कों में बैठने लगीं. जब मर्दों के निप्पल को सेक्शुअलाइज नहीं किया जाता तो औरतों के निप्पल दिखना सेक्शुअल कैसे हो गया. औरतों के निप्पल को ऐसे टैबू बना दिया गया है कि बच्चे को दूध पिलाती मां के स्तन से भी लोग आहत हो जाते हैं. 2016 में भी ये मूवमेंट जोरों शोरों से चलता रहा. असर बाकी देशों में भी दिख रहा. चलते भी रहना चाहिए जब तक औरतों का निप्पल सेंसेशन का विषय बनना बंद हो जाए.

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