वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के मुताबिकः
आइसलैंड में 88% औरतें नौकरीशुदा हैं, यूनिवर्सिटी में 65% स्टूडेंट लड़कियां हैं, 41 % सांसद औरतें हैं.इतनी ख़ास बातों में सबसे ख़ास बात ये है कि आइसलैंड में 67% बच्चे बिनब्याहे मां-बाप के है. ये नए तरह का समाजशास्त्र है. जहां एशिया, यूरोप सभी जगह लोगों को इस बात का डर दिखाया जाता है कि मां-बाप के तलाक से बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. लेकिन हैप्पीनेस इंडेक्स में 10 में 7.5 नंबर लाके इस थ्योरी को झूठ साबित कर दिया है. दुनिया के लिए कुंवारी मां शर्म की बात हो सकती है लेकिन वाइकिंग्स की इस धरती पर ये शान का मामला है.
1980 में आइसलैंड ने अपनी पहली महिला राष्ट्रपति विगदिस को चुना. वे आइसलैंड ही नहीं पूरे यूरोप में राष्ट्रपति बनने वाली पहली महिला थीं.
ग़ज़ब का ख़ूबसूरत देश और उससे भी ख़ूबसूरत लोग. बिलाशक आइसलैंड हमारे लिए जैसे कोई दूसरा ग्रह हो.

फ़ोटो: एनी लिंज
आइसलैंड में नगर निगम ने सिंगल मांओं के लिए बहुत सारे इंतजाम कर रखे हैं. बच्चे जब प्लेग्रुप में होते हैं तो उसका 95% खर्च का जिम्मा सरकार उठाती है और 5 साल तक के वो बच्चे जो सरकारी स्कूलों में होते हैं उनके खर्च का 90% .
बच्चों के लिए ही मां-बाप का साथ रहना आइसलैंड में किसी विदेशी अवधारणा की तरह है. सिंगल गर्भवती महिलाओं के लिए तो माहौल इतना सामान्य है कि सबसे बड़े विश्वविद्यालय रेकेविक यूनिवर्सिटी में प्रेग्नेंट औरतें आराम से काम करते, क्लास करते हुए दिख जाएंगी.

सरकार की पॉलिसी सिंगल मांओं के पक्ष में
मशहूर साहित्यकार निर्मल वर्मा ने भी 1964 में आई अपनी किताब 'चीड़ों पर चांदनी' में आइसलैंड के इस अद्भुत सोशल स्ट्रक्चर का जिक्र किया है. आइसलैंड के माहौल के लिए ये समीकरण अच्छा है.
पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा जन्म दर+ सबसे ज्यादा तलाक़+ कामकाजी औरतों की सबसे ज्यादा संख्या= दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत और खुशनुमा देश.












