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गांव याद आता है तो मैं टिंडर पर टहल आता हूं

इस एप्प में आजादी है. दाएं और बाएं दोनों ओर मुड़ने की. यहां संस्कारों की लकीर नहीं है. स्वतंत्रता है, डेटिंग है, सेक्स है और फिर स्वतंत्रता है.

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Tinder Screenshot
लेफ्ट स्वाइप करते-करते मैं एक प्रोफाइल देखकर रुक गया. एक छू लेने वाला कोटेशन लिखा था. गार्डन में प्यारी सी बिल्ली के साथ तस्वीरें. इंटरेस्ट में कुछ अच्छे से नाम. और इंस्टाग्राम पर नीली चादर ओढ़े पहाड़, झरने और जंगल की तस्वीरें. दिस इज अ परफेक्ट मैच. मैं जबान दांतों के बीच दबाकर मुस्कराता हूं. अंगूठा नोप, लाइक और सुपर लाइक के बीच घूमने लगता है, और सुपर लाइक वाला सितारा मुझ पर हंसकर भाग जाता है. इसके कुछ ही घंटे बाद मैं टिंडर डिलीट कर देता हूं फिर लौटने का वायदा करके. सड़क के दोनों ओर से आते-जाते लोगों के चेहरों पर मैं अमलतास के रंग पढ़ता हूं. कान किसी ग़ज़ल की पंक्तियों में खोए हैं. किसी आदमी के अकेलेपन को सराहते कुछ शब्द. अचानक से मुझे टिंडर याद आ जाता है. आगे चल रहे दोस्तों के पास पहुंचता हूं. और एक दोस्त से कहता हूं तुम टिंडर क्यों नहीं आजमाती? इससे तुम्हें बहुत कुछ लिखने को मिल जाएगा. गांव की लड़की का टिंडर एक्सपीरिएंस. कैसे एक गांव की लड़की टिंडर पर डेट करती है. पर वो कहती है मैं क्यों ऐसे फालतू कामों में समय खराब करूं? ऐसे लोगों से क्यों मिलूंगी जिन्हें जानती ही नहीं? इस बात के कुछ दिन बाद मैं ओपिनियन वेबसाइट डेलीओ पर चिंकी सिन्हा का टिंडर पर लिखा एक लेख पढ़ रहा था. बहुत सारी बातें दिमाग में घूम गईं. मुझे लगा लिखना चाहिए. वो सारी बातें जो मैं टिंडर पर देखता हूं, सोचता हूं. और उनसे कैसे रिलेट करता हूं. कैसे टिंडर पर टहलते हुए मैं अपने गांव को देखता हूं. पहले टिंडर के बारे में बता दूं. यह एक लोकेशन बेस्ड डेटिंग साइट है. जिसमें आप चुने गए किलोमीटर और आयु वर्ग में लोगों को ढूंढ़ सकते हैं. अपने आस-पास दोस्त ढूंढ सकते हैं. टिंडर में लेफ्ट और राइट स्वाइप का ऑप्शन होता है. दोनों तरफ से राइट स्वाइप होने पर चैट कर सकते हैं. मिल सकते हैं, कॉफी पी सकते हैं, हाथ पकड़ कर घूम सकते हैं, शारीरिक संबंध बना सकते हैं. कहीं पढ़ा था मैंने 'टिंडर मंडी की तरह है जहां जिस्म मिलते हैं'.
मैं गांव में जब भी अकेला महसूस करता था, गांव के पास की एक पहाड़ी पर चला जाता था. वहां उड़ते पंछियों को निहारता, खुद से बातें करता, आक के फूलों को चूमता, जाल के पत्तों से पहाड़ी पर कुछ बनाता और डूबते सूरज के रंगों मे खो जाता. उस पहाड़ी से हजार किलोमीटर दूर यहां शहर के कमरे में जब भी गांव याद आता है या अकेलापन लगता है मैं टिंडर इंस्टॉल कर वहां टहल आता हूं. टिंडर को गांव से रिलेट करने के बहुत सारे कारण हैं.
एक दिन घर से फोन आया कि तुम्हारी सगाई कर रहे हैं. मैंने मना कर दिया. मुझे अभी नहीं करनी. मेरी हंसी उड़ाई गई. बोला गया कि तुमसे पूछा नहीं जा रहा, तुम्हे बताया जा रहा है. दिल्ली क्या चले गए नखरे दिखाओगे? मैंने कह दिया तुम ही सगाई कर लो, तुम ही शादी कर लेना. मैं कभी वापस नहीं आने वाला. मेरा मन अजीब सा हो गया. उसके बाद मैंने टिंडर इंस्टॉल कर लिया और तीन दिन अपने लिए लड़की ढ़ूंढ़ता रहा. टिंडर पर लड़की ढ़ूंढ़ रहा था, बहुत बचकाना लग रहा है न? पर मुझे अच्छा लगा. ऐसे लगा जैसे टिंडर की वो सारी प्रोफाइल्स जिन्हें मैंने राइट स्वाइप किया मेरे लिए सहानुभूति प्रकट कर रही हैं. कुछ राइट स्वाइप के बाद घंटों उलझता रहा खुद से. फिर टिंडर डिलीट कर दिया.
शादी और टिंडर से मुझे एक घटना याद आ गई. चार-पांच साल पुरानी है घटना. मैं अपने एक दोस्त के साथ शादी में गया था. जैसलमेर के ही किसी गांव में. रसोई में दूल्हे की सुहागरात का बिस्तर लगा था. पास के कमरे में दोस्त का और बाहर की तरफ मेरा. रात को कुछ हो-हल्ला हो रहा था. सुबह मैंने दोस्त से पूछा तो उसने जो बताया मुझे तीन दिन तक नींद नहीं आई. दूल्हा चरवाहा था. उसे दीन-दुनिया का इल्म कम ही था. किसी दोस्त ने उसे मजाक में सलाह दी कि पहली रात को चिमटा गर्म करके दुल्हन के अंगों पर चिपका देना. और उसने ऐसा कर दिया.
देश इस वक्त फ्री सेक्स पर बहस कर रहा है. मैं टिंडर पर मैच ढूंढ़ता हूं. देश में ऑर्गेज़्म पर बहसें होती हैं. पर दूसरी तरफ वही चरवाहे की सुहागरात, खाप, बुर्का, पर्दा, वर्जिनिटी सामने आ जाते हैं. यहां इज्जत अंग विशेष में समाई रहती है. उसको छूते ही लुट जाती है. मैं टिंडर पर टहलते हुए अपने शहर को याद करता हूं. जहां कोई नहीं जानता उनकी शादी किससे होगी. लड़की की उम्र 15 और लड़के की 20 होते ही शादी हो जाती है. एक साल में बच्चा और पच्चीसवें साल तक पहुंचते-पहुंचते जैसे उम्र खतम हो गई सी लगती है. टिंडर पर लोग मर्जी से मैच ढ़ूंढते हैं, मिलते हैं, सेक्स करते हैं और मतभेद हो गए तो अलग हो जाते हैं. पर टिंडर से बाहर निकलता हूं तो खुद को ऐसी जगह पाता हूं जहां खुद की मर्जी से जीवनसाथी नहीं चुन सकते. यहां तक कि बच्चे भी खुद की मर्जी से नहीं पैदा कर सकते. पहले ही साल बच्चा चाहिए. वो भी लड़का होना चाहिए. और बहसें ऑर्गेज़्म, फ्री सेक्स पर होती है. इससे बुरे भी हालात हैं. देश में कई समाज हैं जिनमें विधवा विवाह नहीं होता. पहले पसंद या बाद में तलाक दूर-दूर दक दिखाई ही नहीं देते. चाहे पति की मौत फेरे होते ही क्यों न हो जाए? पर वो दोबारा शादी नहीं कर सकती. जिसका पति 15 की उम्र में मर जाए उसे समाज कहता है कि वो दोबारा शादी नहीं करेगी. अगर किसी से बात कर ले तो समाज जीना मुश्किल कर दे. मुझे समझ में नहीं आता ये वही संस्कृति है जिसमें कामसूत्र और अजंता ऐलोरा की मूर्तियां हैं. मुझे ऑर्गेज़्म वाली बहस पर हंसी आती है. और टिंडर पर स्वाइप करने लगता हूं. भारत में टिंडर के बारे में लोग जो राय रखते हैं वो भी मुझे बचकानी सी लगती है. जैसे लोगों को मेरा सगाई से भागकर टिंडर पर लड़की ढूंढना लग सकता है. उन्हें लगता है कि टिंडर एक सब्जी मंडी जैसी कोई जगह है जहां लड़कियों का शरीर बिकता है, राइट स्वाइप पर सेक्स मिलता है. इस पितृसतात्मक समाज से टिंडर कैसे अछूता रहता. वो कहावत है न कि गधे काबुल में भी होते हैं. मैं यहां कोई बहस नहीं खड़ी कर रहा. न इस लायक हूं पर इसे मैंने देखा ऐसे ही है. मैं टिंडर पर सेपियोसेक्सुअल मैच ढ़ूंढ़ता हूं. कभी-कभी ऐसे लगता है जैसे मैं खुद से ही झूठ बोल रहा हूं. मेरे जैसे लोग जिन्हें लोगों से आमने-सामने बात करना अच्छा नहीं लगता जो चुपचाप टुकुर-टुकुर मुंह देखते रहते हैं, उन्हें टिंडर जैसी एप्प्स पर टहलना अच्छा लगता है. मुझे अकेलापन बहुत अच्छा लगता है. इसका मतलब ये नहीं कि मुझे लोग अच्छे नहीं लगते. मैं बिना बताए, बिन बोले लोगों से प्रेम करता हूं. मुझे हमेशा अनजान लोगों से प्रेम होता है. किसी का अच्छा लिखना पागल कर देता है, किसी का अच्छा सोचना. कभी-कभी बिना किसी वजह ही किसी के प्यार में होता हूं. इसलिए लोगों को भी आसानी होती है वो आराम से मुझे 'गो टू हेल' या 'तुमसे बात करते हुए इस्तेमाल होने की फीलिंग आती है' बोल जाते हैं और मुझे बुरा नहीं लगता बिल्कुल भी. इसीलिए मुझे टिंडर पसंद है. यहां आजादी है. लेफ्ट स्वाइप और राइट स्वाइप दोनों की. यहां बीच में संस्कारों की लकीर नहीं होती. जिसे लक्ष्मण रेखा कहा जाता है.

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