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क्या बिलकिस बानो के दोषियों पर फैसला पलटेगी सरकार?

जेल से बाहर क्यों खुला घूम रहा है गुरमीत राम रहीम?

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बिलकिस बानो रेप केस के दोषी (बाएं) और गुरमीत राम रहीम (दाएं) (फोटो: इंडिया टुडे)

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब बलात्कार एक ऐसा जुर्म होता था, जिसपर किसी किंतु-परंतु के लिए जगह नहीं थी. आरोपी चाहे कितना भी ताकतवर हो, किसी भी पार्टी या धर्म का हो - समाज, कानून और मीडिया हमेशा पीड़िता के साथ खड़े होते थे. दिसंबर 2012 में गैंग रेप दिल्ली में हुआ, लेकिन गुस्सा पूरे देश को आया. ऐसा ज़बरदस्त विरोध हुआ, कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार को साल भर के भीतर कानून ही बदलना पड़ा. बावजूद इसके जब 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए, तो निर्भया गैंगरेप एक बड़ा मुद्दा था, जिसने शीला दीक्षित की सरकार गिराने में अहम भूमिका निभाई.

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थोड़ा पीछे चलिए. दिल्ली का ही प्रियदर्शिनी मट्टू रेप और मर्डर केस. 1996 में अपराध हुआ और 1999 तक मामला घिसटता रहा. क्योंकि आरोपी संतोष कुमार सिंह के पिता का रसूख था. वो पुलिस में IG थे. जब संतोष बरी हो गया, तो इतना हंगामा मचा कि CBI को फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील करनी पड़ी. फिर भी 6 साल तक मामले ने रफ्तार नहीं पकड़ी तो मीडिया ने दबाव बनाया और हाईकोर्ट में रोज़ाना सुनवाई शुरू हुई. अतंतः संतोष को हत्या और बलात्कार का दोषी पाया गया.

और पीछे चलिए. 1972 का मथुरा रेप केस. महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में पुलिस थाना परिसर में एक आदिवासी लड़की का गैंगरेप हुआ. आरोपी पुलिस कर्मी सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए. इस फैसले का भी जमकर विरोध हुआ और 1983 में भारतीय दंड संहिता में बदलाव किया गया. पीड़िता की रज़ामंदी को कानूनी रूप से महत्व दिया गया और कस्टोडियल रेप को दंडनीय अपराध माना गया.

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मतलब कम से कम आधी सदी से तो यही परंपरा रही है कि समाज पीड़िता के साथ खड़ा रहा और जब सिस्टम ने अपराधी का साथ देने की कोशिश की भी, तब राजनीति को मजबूर किया गया, कि सिस्टम को साधे. कानून में कमी लगी, तो कानून को बदला गया. फैसलों में चूक मिली, तो फैसले पलटे गये. नेतागिरी की गुंजाइश थी, तो बस इतनी, कि कौन पीड़िता का कितना बड़ा पैरोकार है. लेकिन अब लगता है वो सांचा टूट गया, जिसमें बीते दिनों के लोग ढला करते थे. तभी तो बिलकिस बानो मामले में सामूहिक बलात्कार के दोषी आज़ादी की 75 वीं वर्षगांठ पर जेल से बाहर चले आते हैं, दांत निपोरकर मिठाई खाते हुए तस्वीरों में कैद होते हैं. क्या इसलिए कि गुजरात में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं?

देश के संविधान की आत्मा पर इतनी मूंग दलना क्या काफी नहीं था, जो अब गुरमीत राम रहीम जैसे बलात्कारी और हत्यारे को चौथी बार जेल से छुट्टी मिल गई है? क्या इसलिए कि हरियाणा की आदमपुर सीट पर उपचुनाव होने जा रहा है?  

बलात्कार - एक ऐसा अपराध जिसकी शिकार हुई कितनी ही महिलाएं कभी सामने नहीं आतीं, क्योंकि बदनामी का डर होता है. इसीलिए कानून में बलात्कार पीड़िता की पहचान ज़ाहिर करने की मनाही है. ऐसे में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि जब-जब बिलकिस बानो खबरों में अपना नाम सुनती होंगी, तो उनपर क्या बीतती होगी. किसी तरह उन्होंने उन तारीखों को पीछे छोड़ा होगा. तारीख - 27 फरवरी 2002 की, जब गुजरात के गोधरा स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में एक भीड़ ने आग लगा दी. कारसेवकों से भरी ट्रेन में सवार 59 लोगों की मौत हो गई. और गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए. गोधरा का बदला पूरे गुजरात के मुसलमानों से लिया जाने लगा.

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तारीख 3 मार्च 2002 की, जब एक खेत में दंगाइयों ने बिलकिस के परिवार और साथियों को घेर लिया. पांच महिलाओं का सामूहिक बलात्कार हुआ. किसी को नहीं छोड़ा गया. 5 महीने की गर्भवती बिलकिस को भी नहीं और उनकी बुज़ुर्ग मां को भी नहीं. 14 लोगों की हत्या कर दी गई. इनमें बिलकिस की साढ़े तीन साल की बच्ची सालेहा भी थी.

और सिस्टम ने क्या किया? लिमखेड़ा पुलिस थाने पर मौजूद हेड कॉन्स्टेबल सोमाभाई गोरी ने ढंग से तहरीर ही नहीं लिखी. डॉक्टरों ने लाशों का पोस्टमॉर्टम तक ऐसे किया कि आरोपी बचाए जा सकें. ये हम नहीं कह रहे, मामले की जांच करने वाली CBI ने कहा था. सूबतों के अभाव का बहाना बनाकर मामला खत्म कर दिया गया. जब हंगामा हुआ, तब जाकर CBI जांच बैठी. गुजरात में न्याय की संभावना न देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सूबे से बाहर चलवाया. और तब 11  लोगों को रेप और हत्या का दोषी पाया गया -

जसवंतभाई नाई,
गोविंदभाई नाई,
शैलेश भट,
राधेश्याम शाह,
बिपिन चंद्र जोशी,
केसरभाई वोहनिया,
प्रदीप मोरढ़िया
बाकाभाई वोहनिया,
राजूभाई सोनी
मितेश भट
रामेश चांदना

इन 11 लोगों के हाथों बिलकिस अकल्पनीय बर्बरता का शिकार हुई थीं. और फिर उन्होंने न्याय मिलने तक एक असाधारण यात्रा पूरी की थी. इसीलिए बिलकिस एक प्रतीक बन गईं. उनकी कहानी ने अगर भारतीय न्याय व्यवस्था की कमज़ोरियों को उजाकर किया, तो ये भी बताया कि न्याय के मंदिर में देर है, लेकिन अंधेर नहीं है. क्योंकि निचली अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए पहले बंबई उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय ने डॉक्टरों और पुलिस वालों तक को सज़ा सुनाई थी. लेकिन गुजरात सरकार के एक कदम ने इस सब पर पानी फेर दिया. और वो भी उस दिन, जब गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से देश को संबोधित करते हुए महिलाओं के सम्मान की सीख दे रहे थे.

इस बयान के कुछ ही घंटों के भीतर 11 बलात्कारी और हत्यारे गोधरा की एक जेल से बाहर आ गए थे. चोरी छिपे नहीं, दिन दहाड़े. वहां इनके माथे पर तिलक लगाया गया, इन्हें मिठाई खिलाई गई. जैसे ये कोई जंग जीतकर आए हों. तब गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) राज कुमार का इंडियन एक्सप्रेस को दिया बयान काफी चर्चा में रहा था - 

''छूट देते वक्त, सज़ा के 14 साल पूरे होने, उम्र, अपराध की प्रकृति, जेल में व्यवहार जैसे कारकों पर विचार किया गया था.''

शुरुआत में इस फैसले को भी अदालतों के सिर मढ़ने की कोशिशें हुईं. तभी तत्कालीन CJI NV रमणा को कहना पड़ा कि हमने रियायत नहीं दी, हमने तो बस रियायत पर विचार करने का आदेश दिया था. दरअसल राधेश्याम शाह ने सज़ा में रियायत की गुहार लगाई थी. इस रियायत को कहते हैं रिमीशन. इसमें दोष या सज़ा का चरित्र नहीं बदलता. बस अवधि कम हो जाती है. मामला गुजरात हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जहां से मई 2022 में आदेश आया, कि गुजरात सरकार एक समिति बनाकर 1992 की नीति के तहत रिमीशन पर विचार करे. इसका मतलब दोषियों को छोड़ना है या नहीं, ये गुजरात सरकार पर छोड़ा गया था. 1992 की गुजरात रिमीशन नीति कहती है कि इंस्पेक्टर जनरल (प्रिज़न्स) एक जेल एडवाइज़री कमेटी की राय लें. इस कमेटी के अध्यक्ष थे पंचमहल के ज़िला मैजिस्ट्रेट सुजल मयात्रा. मयात्रा के साथ कमेटी में और कई अधिकारी थे -

> पंचमहल पुलिस अधीक्षक 
> गोधरा जेल के सुपरिंटेंडेंट 
> पंचमहल के ज़िला कल्याण अधिकारी
> गोधरा सेशन्स जज

इन नामों पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती. लेकिन जब हम कमेटी के बाकी सदस्यों को देखते हैं, तो एक दूसरी ही तस्वीर सामने आती है. द स्क्रोल पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी के कम से कम पांच सदस्य ऐसे थे, जो भाजपा से जुड़े हुए थे -

1. गोधरा से भाजपा विधायक सीके राउलजी
2. कलोल से भाजपा विधायक सुमनबेन चौहान
3. भाजपा की गुजरात कार्यकारिणी के सदस्य पवन सोनी
4. गोधरा तहसील की भाजपा इकाई के अध्यक्ष सरदार सिंह बारिया पटेल
5. गोधरा में भाजपा की महिला इकाई की उपाध्यक्ष विनीताबेन लेले

14 अगस्त, 2022 को, जब पूरे देश में हर घर तिरंगा अभियान की तैयारी चल रही थी. और भारत सरकार पूरी उर्जा के साथ दिल्ली में होने वाले मुख्य कार्यक्रम की तैयारी कर रही थी. बिलकिस के बलात्कारियों को छोड़ने का फैसला एक ऐसी कमेटी ने ले लिया, जिसमें महिलाएं भी थीं. सीके राउलजी ने तो मोजो स्टोरी नाम के ऑनलाइन समाचार पोर्टल से ये तक कह दिया था कि, 

"वैसे भी वो ब्राह्मण लोग थे, उनका संस्कार भी बड़ा अच्छा था...हो सकता है सज़ा करवाने के पीछे बद-इरादा हो."

खैर, बलात्कारियों को छोड़ने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं के नाम जान लीजिए -
> सीपीएम नेता सुभाषिनी अली
> पत्रकार रेवती लौल
> प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा
> तृणमूल नेता महुआ मोइत्रा
> पूर्व IPS डॉ मीरान चड्ढा बोरवणकर
> पूर्व राजनयिक मधु भादुड़ी
> चुनाव सुधारों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. जगदीप छोकर

गुजरात सरकार शुरू से अदालत में ये कहती रही है कि इन लोगों की याचिका सुनी जाने लायक ही नहीं है. क्योंकि ये स्ट्रेंजर्स हैं. माने इनका मामले से लेना देना नहीं है. लेकिन नोटिस जारी हुए और गुजरात सरकार को जवाब दाखिल करने को कहा गया. इस जवाब में गुजरात सरकार ने क्या कहा, अब बिंदुवार जानिए -
> रिहाई के खिलाफ याचिका सुनवाई लायक नहीं है.
> रिहाई का फैसला केंद्र सरकार की रज़ामंदी से लिया गया.
> रिहाई के लिए दोषियों के ''अच्छे व्यवहार'' को आधार बनाया गया.
> रिहाई का फैसला 1992 की नीति के तहत लिया गया, न कि ''आज़ादी के अमृत महोत्सव'' के तहत.

वहीं इन लोगों ने मार्च, 2021 में रिहाई का विरोध किया था-
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो CBI की मुंबई स्थित स्पेशल क्राइम ब्रांच के SP
- मुंबई स्थित CBI की विशेष अदालत के जज
- सिटी, सिविल एवं सेशंस कोर्ट - ग्रेटर बॉम्बे

> गुजरात में सभी अधिकारियों ने राधेश्याम भगवानदास शाह उर्फ लाला वकील को छोड़कर बाकी 10 दोषियों की रिहाई की सिफारिश की थी. लेकिन दाहोद के SP, कलेक्टर और ADG प्रिज़न्स (अहमदाबाद) राधेश्याम की रिहाई के खिलाफ थे.

आज इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई जिसमें जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने गुजरात सरकार के हलफनामे का संज्ञान लिया. याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, 

‘गुजरात सरकार ने जो हलफनामा दायर किया है, हम उसे पढ़ने के लिए कुछ वक्त चाहते हैं.’

इसपर जस्टिस रस्तोगी ने कहा, 

'हलफनामा मिलता, उससे पहले ही हमने उसके बारे में खबरें देख लीं.' 

इसके बाद उन्होंने गुजरात सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की तरफ देखते हुए कहा,

'मिस्टर मेहता, आपने जो काउंटर एफिडेविट फाइल किया है, वो बड़ा भारी भरकम है. ढेर सारे फैसलों का उल्लेख है. घटनाओं और महत्वपूर्ण बिंदुओं का संक्षेप में वर्णन कहां है? दिमाग का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?'

तब मेहता ने जवाब दिया,

‘अदालत के पुराने फैसलों का उल्लेख उचित संदर्भ देने के लिए किया गया था. हम इससे बच सकते थे. वैसे हमारी दलील ये है कि पक्षकारों के स्थान पर थर्ड पार्टीज़ सरकार के फैसले को चुनौती नहीं दे सकतीं.’

तभी एक और वकील ने इसी मामले में एक और याचिका लगानी चाही. इसपर बेंच ने कहा,

'पर्याप्त याचिकाएं लग चुकी हैं. कई नामी वकील बहस कर ही रहे हैं. ऐसे में अब और रिट याचिकाएं नहीं ली जाएंगी.'

तब मेहता ने कहा, कि यही समस्या है. सिर्फ नाम के लिए याचिकाएं लगा दी जा रही हैं. इसके बाद बेंच ने आज के लिए सुनवाई को विराम दिया. मामले में अगली तारीख लगी है 29 नवंबर 2022. इस रोज़ तक याचिकाकर्ता, गुजरात सरकार और सामूहिक बलात्कार के दोषियों के काउंटर एफिडेविट पर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं.

यहां तक आते आते आप मामले के सभी प्रमुख तथ्यों को जान गए हैं. अब आते हैं सवालों पर. ये सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 की नीति के तहत रिहाई पर विचार करने को कहा था. लेकिन इस एक तर्क के पीछे सरकार पूरी तरह नहीं छिप सकती. कानून के जानकार बार-बार ध्यान दिलाते हैं - एक होता है ''लेटर ऑफ लॉ'' माने कानून में लिखा क्या है. और एक होता है ''इंटेंट ऑफ लॉ.'' माने कानून की मंशा क्या है. ज़ाहिर है, कानून की तकनीकी बारीकियों का पालन करते हुए, उसकी भावना को नहीं नकारा जा सकता. और कानून की भावना क्या है, ये हमने खुद गुजरात सरकार के फैसलों में देखा है. साल 2014 में गुजरात की सरकार ने सज़ा-माफ़ी नीति को संशोधित किया. नई नीति के तहत कई श्रेणी के दोषियों की रिहाई पर रोक लगाने के प्रावधान हैं. जैसे बलात्कार और हत्या के दोषी. 2014 की ही नीति में ये भी कहा गया कि अगर किसी दोषी के मामले की जांच सीबीआई ने की है तो केंद्र सरकार की सहमति के बिना राज्य सरकार सज़ा-माफ़ी नहीं कर सकती.

इन बातों के आलोक में 1992 की नीति का हवाला देकर 11 बलात्कारियों को रिहा कर देना कानूनी नहीं, तो कम से कम नैतिक आधार पर सवालों के घेरे में आ जाता है. CBI केंद्र को रिपोर्ट करती है. और केंद्र में उसी पार्टी की सरकार है, जिस पार्टी की सरकार गुजरात में है. तब गुजरात सरकार ने CBI तथा CBI अदालत की राय को वज़न क्यों नहीं दिया? आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि बलात्कारियों को 15 अगस्त के दिन न सिर्फ रिहा होने दिया गया, बल्कि उनका सार्वजनिक रूप से सम्मान हुआ. और भाजपा नेताओं ने इस फैसले का बचाव किया. बाद में स्पष्टीकरण आए. लेकिन सारी बातों पर भारी होती है ठोस कार्रवाई. अगर वाकई गुजरात सरकार को लगता है कि बलात्कारियों को समाज से दूर रहना चाहिए, तो फिर वो इस फैसले का इतनी शिद्दत से बचाव क्यों कर रही है? और क्या याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए बिंदु सिर्फ इसलिए झुठलाए जा सकते हैं कि वो मामले में पार्टी नहीं हैं?

इसीलिए सरकार की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं और बलात्कारियों की रिहाई को गुजरात चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का कहना है कि इस मामले में बीजेपी अपना चुनावी फायदा देख रही है. इसपर भाजपा की तरफ से केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी इतना ही कह पाए कि जो हुआ, कानून के तहत ही हुआ. इससे पहले महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कह चुके हैं कि बलात्कारियों का सम्मान नहीं होना चाहिए था. लेकिन अभी तक किसी ने ये नहीं कहा कि बलात्कारियों को इस तरह रिहा नहीं किया जाना चाहिए था.

चलते चलते आपको बिलकिस का हाल भी बताते चलें. राज्य सरकार ने बिलकिस को 5 लाख का मुआवज़ा देने की बात कही थी. लेकिन बिलकिस ने इसे बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. यहां से उन्हें 50 लाख मुआवज़ा देने का आदेश हुआ. साथ में एक घर और नौकरी. इतना हाई प्रोफाइल केस होने के बावजूद बिलकिस तक ये सब नहीं पहुंचा. बीते दिनों बिलकिस के पति ने इंडिया टुडे से कहा था कि पहले भी डर था, लेकिन अब 11 दोषियों की रिहाई के बाद डर और बढ़ गया है. हम अपनी जगह बदलते रहते हैं और सार्वजनिक जीवन से छिपते रहते हैं. हमारे पास कोई सुरक्षा नहीं है. हमें अभी भी घर और नौकरी नहीं मिली है. हमारे पास अभी के लिए कोई कानूनी टीम नहीं है और भविष्य के कानूनी विकल्प के बारे में नहीं पता है.

अब एक दूसरे मामले का रुख करते हैं. ये मामला भी रेप से ही जुड़ा है. रेप के दोषी और राजनीति के घालमेल का एक और संगम, हरियाणा में भी मिलता है. डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख राम रहीम. दो साध्वियों के रेप के मामले में दोषी पाया गया. 20 साल की बामुशक्कत कैद की सज़ा मिली. साल था 2017. इसके अलावा राम रहीम को पूर्व डेरा प्रबंधक रंजीत सिंह और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में भी दोषी करार दिया गया है. बावजूद इसके, 3 दिन पहले यानी 15 अक्टूबर को उसे परोल मिल गई. हरियाणा की सुनारिया जेल से वो 40 दिन के लिए बाहर आ गया. बाकायदा गाड़ियों के काफिले के साथ वो यूपी के बागपत पहुंचा, जहां उसका आश्रम है. अनुयायियों ने जश्न मनाया. आते ही उसने प्रवचन देना भी शुरू कर दिया. राम रहीम की तरफ से क्या बोला गया, इस पर आएंगे, पहले ये समझ लीजिए परोल क्या होती है?

परोल कैदियों के लिए एक तरह का पुरस्कार होता है. लेकिन तकनीकि रूप से ये एक करार होता है, जेल और कैदी के बीच. जिसमें उसे कुछ शर्तों के साथ घर-परिवार के बीच जाने दिया जाता है. 1894 के जेल अधिनियम और 1990 के कैदी अधिनियम के अनुसार, भारत में परोल को नियंत्रित करते हैं. अलग-अलग राज्यों में परोल को लेकर अलग से दिशा निर्देश सेट होता है. इसमें कैदी को कम अवधि के लिए अस्थाई रूप से छोड़ा जाता है. ताकि वो अपने परिवार या सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा रहे. कोई भी आरोपी, दोषी सिद्ध होने के 1 साल बाद परोल के लिए प्रार्थना पत्र दायर कर सकता है. परोल की अवधि के दौरान जेल से बाहर बिताए गए दिन को सजा के रूप में नहीं गिना जाता है.

एक मामले की सुनवाई करते हुए अप्रैल 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने परोल पर टिप्पणी करते हुए कहा- परोल प्रदान करते समय मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, ताकि दोषियों को अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक मुद्दों को हल करने का अवसर मिल सके. अपराधियों को समाज के संबंध में प्रतिबद्धिता प्रदर्शित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. कुल मिला कर कहें तो अदालत भी पेरोल को एक तरह से कैदियों का अधिकार भी मानती है.

मगर राम रहीम के केस में परोल मिलने से ज्यादा सवाल टाइमिंग पर है. हरियाणा में पंचायती चुनावों की घोषणा हो चुकी है. पहले चरण के पंचायती चुनाव 30 अक्टूबर और 2 नवम्बर को हैं. इसके अलावा 3 नवम्बर को हिसार जिले की आदमपुर विधानसभा में उपचुनाव के लिए वोटिंग होनी है. जहां से बीजेपी से कुलदीप बिश्नोई के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के पोते भव्य बिश्नोई मैदान में हैं. जबकि कांग्रेस की तरफ से भूपेंद्र हुड्डा ने अपने विश्वस्त और पूर्व मंत्री जय प्रकाश को उतार रखा है. ये सीट भजन लाल की पुश्तैनी सीट रही है. 1968 के बाद से आदमपुर सीट पर बिश्नोई परिवार का ही कब्जा रहा है. मगर आम आदमी पार्टी के मैदान में आने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है. दूसरी बात ये भी है कि कुलदीप बिश्नोई कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए हैं.

तो ऐसे चुनावी मौके पर राम रहीम को परोल मिलने पर विरोधी नेता पूछ रहे हैं, ये संयोग है या प्रयोग? क्योंकि इससे पहले भी पंजाब चुनाव से ऐन पहले 7 फरवरी 2022 को राम रहीम जेल से बाहर आ गया था. तब उसे 21 दिन की फरलो मिली थी. फरलो भी परोल जैसा ही है, लेकिन फरलो में मिली आजादी को सजा के दिन में काउंट किया जाता है. इसके बाद 17 जून को राम रहीम 30 दिन की परोल मिली थी. राम रहीम के गुनाहों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है. फिर वो जेल से छूट कर क्या रहा है?

जवाब आसान है. पंजाब हरियाणा में राम रहीम का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है. बागपत के बरनावा आश्रम से राम रहीम ने 17 अक्टूबर को पहला ऑनलाइन सत्संग किया. 18 अक्टूबर को फिर सत्संग किया. दैनिक भास्कर में छपी सनमीत सिंह की खबर की मुताबिक इसका पता चलते ही पंचायत चुनावों के उम्मीदवार समर्थन मांगने उसके सत्संग में पहुंच गए. ये सभी सरपंच, ब्लॉक समिति मेंबर और जिला परिषद पदों के दावेदार या उम्मीदवार थे. राम रहीम ने आशीर्वाद भी दिया.

भास्कर में ही छपी खबर के मुताबकि हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर के विधानसभा क्षेत्र करनाल की नगर निगम चेयरपर्सन रेणु बाला गुप्ता, मेयर और डिप्टी मेयर भी हाजिरी लगवाने पहुंचे. तीनों भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं. कमोबेश सभी ने राम रहीम के सामने चुनाव का जिक्र किया और जीत का आशीर्वाद मांगा. आखिर में करनाल नगर निगम की चेयरपर्सन रेणु बाला की चिट राम रहीम के पास पहुंची तो वो ऑनलाइन हुई और कहा कि आप पहले भी स्वच्छता अभियान के लिए करनाल आए थे. अब भी करनाल में आकर दर्शन दें.

मतलब ये कि असली खेल तो पंचायत चुनावों का है. जिसका प्रपंच, विधायकी और सांसदी के चुनाव से कम नहीं होता. अब इससे ज्यादा खुला खेल फर्रुखाबादी और क्या हो सकता है? सब खुलेआम सिस्टम के साथ हो रहा है. राजनीति से कनेक्शन साफ दिख रहा है, मगर सवाल  पूछेंगे तो नियम कानून की दुहाई दे दी जाएगी. राम रहीम के गुनाहों पर किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी से लल्लनटॉप ने फोन पर बात की. पूछा कि क्या राम रहिम की पेरोल का चुनाव से कोई कनेक्शन है? जवाब में वो बोले-

''सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात है, जिस देश में अंडर ट्रायल कैदियों को सालों तक जेल में सड़ाया जाता है. कई बार तो गुनाह भी साबित नहीं होते और एक उम्र जेल में निकल जाती है. यहां राम रहीम को हर तीसरे महीने परोल दी जा रही है. एक व्यक्ति जो दो साध्वियों की रेप का दोषी है, जिस पर दो हत्याओं का जुर्म साबित हो चुका है, जमीन कब्जाने का आरोप है, साधुओं को नपुंसक बनाने से लेकर जघन्य आरोपों की लंबी फेहरिस्त है. जिसकी वजह से 2017 के साल पंचकुला में भीषण हिंसा हुई. 33 लोग मारे गए. उसे बार-बार परोल पर छोड़ा जाता है. राजनीतिक सांठगांठ का इससे अच्छा उदाहरण शायद ही कहीं देखने को मिल सकता है.''

एक आपराधिक प्रवृति का व्यक्ति है, जिसपर भरोसा करने वालों की संख्या अब भी बड़ी है. उसका वोटों पर प्रभाव है. सामने नियम हैं, कानून हैं और उदाहरण भी. जो वाकई सबके लिए बराबर नहीं हैं क्योंकि ये बात सिर्फ राजनीतिक संरक्षण तक सीमित नहीं है. सवाल उन अदालतों से भी है, जहां संज्ञान लेने और न लेने को लेकर समय समय पर सवाल उठाए जाते रहे हैं.  

 

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