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बारामती तक सीमित रहीं सुनेत्रा पवार की अब सबसे कठिन परीक्षा शुरू होने वाली है

Sunetra Pawar का जन्म साल 1963 में धाराशिव जिले में एक राजनीतिक परिवार में हुआ था. उनके पिता बाजीराव पाटिल धाराशिव एक स्वतंत्रता सेनानी थे और स्थानीय राजनीति में उनकी रुचि थी. सुनेत्रा पवार अब महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनने जा रही हैं. उनके आगे एक नहीं कई बड़ी चुनौतियां हैं.

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सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम के तौर पर शपथ लेंगी (PTI)

साल 2024. लोकसभा चुनाव में टिकट बंटवारे की सुगबुगाहट थी. महाराष्ट्र की एक सीट पर सबकी निगाहें टिक गई थीं. वो सीट शरद पवार की भी थी और अजित पवार की भी. रिश्ते में दोनों चाचा भतीजे, लेकिन एक साल पहले दोनों राजनीति में प्रतिद्वंद्वी बन बैठे थे. और इसी प्रतिद्वंद्विता ने बारामती सीट को दोनों की नाक का सवाल बना दिया.

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बारामती सीट से पिछले तीन बार से शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले सांसद चुनकर आ रही थीं. लेकिन इस बार अजित पवार ने अपनी बहन के सामने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को उतार दिया. इस लड़ाई में सुप्रिया जीतीं और सुनेत्रा हार गईं. पर कुछ इस तरह महाराष्ट्र की सबसे 'हाई प्रोफाइल सियासी बैटल' से सुनेत्रा पवार का राजनीतिक पदार्पण हो गया.

तब कहा गया कि NCP की सियासत में उनकी भूमिका औपचारिक ही रहेगी. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. अजित पवार की असामयिक मौत ने उनको नेपथ्य से महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में ला दिया. अपना पहला चुनाव हारने वाली सुनेत्रा पवार, अब राज्य की पहली महिला डिप्टी सीएम बनने जा रही हैं.

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राजनीतिक माहौल में पली बढ़ीं

सुनेत्रा पवार का जन्म साल 1963 में धाराशिव जिले में एक राजनीतिक परिवार में हुआ था. उनके पिता बाजीराव पाटिल धाराशिव एक स्वतंत्रता सेनानी थे और स्थानीय राजनीति में उनकी रुचि थी. सुनेत्रा पवार ये बताती हैं कि राजनीति और समाजसेवा का जुनून उनमें उनके पिता से ही आया. सुनेत्रा के भाई पद्मसिंह पाटिल साल 1980 के दशक में एक बड़ी राजनीतिक शख्सियत के तौर पर उभर रहे थे. साल 1983 में औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) के एसबी आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज से सुनेत्रा ने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया. दो साल बाद 1985 में उनके भाई ने उनकी शादी अजित पवार से तय कर दी. ये शादी पद्मसिंह पटेल और शरद पवार की दोस्ती की वजह से हुई.

साल 1985 में शादी के बाद सुनेत्रा बारामती आ गईं. तब तक अजित सक्रिय राजनीति में नहीं आए थे. उनका राजनीतिक करियर शुरु ही हो रहा था. साल 1991 में अजित पवार बारामती विधानसभा का उपचुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने. तब सुनेत्रा दूध के कारोबार में उनका हाथ बंटा रही थीं.

साल 1993 में शरद पवार एक बार फिर से मुख्यमंत्री बने. तब अजित पवार और सुनेत्रा मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास 'वर्षा बंगले' में उनके साथ रहने लगे. तब भारत में उदारीकरण का दौर था. कंप्यूटर क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. सुनेत्रा ने अजित से कंप्यूटर सीखने की जिद की और इसे पूरा भी किया.

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पवार के पैतृक गांव को बनाया सामाजिक कार्यों की प्रयोगशाला   

साल 2024 तक सुनेत्रा आधिकारिक तौर पर राजनीति में नहीं आईं. लेकिन सामाजिक जीवन में काफी सक्रिय रहीं. महाराष्ट्र में जिले का गार्डियन मिनिस्टर बनाने की परिपाटी है. जब अजित पवार सतारा के गार्डियन मिनिस्टर थे. सुनेत्रा पवार महाबलेश्वर यात्रा पर गईं. लौटते समय उन्हें एक गांव दिखा. वहां संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान चल रहा था. इससे प्रभावित होकर उन्होंने अजित पवार के पैतृक गांव कोटेवाड़ी में काटेवाड़ी प्रोजेक्ट की शुरुआत की.

उस वक्त काटेवाड़ी में 80 फीसदी लोगों के घर में शौचालय नहीं था. उन्होंने लोगों को शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित किया. आगे चलकर साल 2006 में शौच मुक्त होने के चलते गांव को निर्मल ग्राम का दर्जा मिला. इसके बाद काटेवाड़ी में सोलर एनर्जी से चलने वाली स्ट्रीटलाइट, बायोगैस प्लांट, वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम और जैविक खेती को बढ़ावा दिया. उनके प्रयासों के चलते गांव को संत गाडगेबाबा स्वच्छता अभियान पुरस्कार समेत कई पुरस्कार मिले.

साल 2008 में बारामती हाई टेक टेक्सटाइल पार्क की स्थापना में सुनेत्रा पवार की अहम भूमिका रही. इस टेक्सटाइल पार्क में लगभग 15 हजार लोग काम कर रहे हैं. इनमें अधिकतर महिलाएं हैं. सुनेत्रा पवार टेक्सटाइल पार्क की अध्यक्ष हैं. सुनेत्रा विद्या प्रतिष्ठान नाम के एक शैक्षणिक संस्थान की ट्रस्टी हैं. यह संस्थान ग्रामीण इलाकों में शिक्षा को बढ़ावा देता है.

इसके अलावा पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिए उन्होंने एनवायरनमेंटल फोरम ऑफ इंडिया (EFOI) नाम से एक गैर सरकारी संगठन बनाया है. सुनेत्रा इस फोरम के माध्यम से जैव विविधता संरक्षण, लुप्त होते प्रजातियों की सुरक्षा, जल संसाधन, सूखा राहत और पेड़ लगाने का काम करती हैं. पर्यावरण के क्षेत्र में उनके काम के लिए उनको ग्रीन वॉरियर अवार्ड भी मिल चुका है. सुनेत्रा साल 2011 से विश्व उद्यमिता मंच (फ्रांस) की थिंक टैंक मेंबर हैं. वो सतत विकास और नवाचार पर होने वाली अंतरराष्ट्रीय बहसों में भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं.

नेपथ्य की नायिका और राजनीति

सुनेत्रा पवार सामाजिक कामों के जरिए बारामती में मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही थीं. लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर वह अजित पवार के चुनाव अभियान तक ही महदूद थीं. अजित पवार नियम से हर हफ्ते बारामती आते थे. वहां के विकास का जिम्मा उनका था. इस दौरान सुनेत्रा क्षेत्र में उनके जनसंपर्क का काम देखती थीं. इस वजह से उन्हें 'बारामती की भाभी' कहा जाने लगा.

वह सक्रिय राजनीति में नहीं थीं लेकिन बारामती में अजित पवार के चुनाव प्रचार की कमान उनके हाथ में होती थी. गांवों का दौरा, सभाएं करना या फिर इलाके के महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात का जिम्मा. सब वहीं तय करती थीं. चुनावों के दौरान शरद पवार, सुप्रिया सुले और अजित पवार पूरे राज्य का जिम्मा संभालते थे. वह बस चुनाव प्रचार की शुरुआत और अंत में बारामती आते थे. बाकी समय प्रचार का जिम्मा सुनेत्रा के कंधों पर होता था.

पार्टी और परिवार में बंटवारा

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अजित पवार के बेटे पार्थ पवार चुनाव लड़े. इसके साथ ही पवार परिवार में विवाद की सुगबुगाहट शुरु हो गई. चर्चा थी कि सुनेत्रा की जिद की वजह से ही पार्थ को चुनाव लड़वाया गया. इस चुनाव में पार्थ को हार का सामना करना पड़ा. कुछ दिन बाद हुए विधानसभा चुनाव में शरद पवार के एक और भाई दिनकरराव गोविंदराव पवार के पोते और राजेंद्र पवार के बेटे रोहित पवार ने राजनीति में एंट्री ली. उन्होंने कर्जत विधानसभा से चुनाव लड़ा और 43 हजार वोटों से जीते. दावा किया जाता है कि रोहित पवार की मां सुनंदा पवार और पार्थ की मां सुनेत्रा पवार के बीच मतभेद थे. हालांकि सार्वजनिक तौर पर सुनंदा इसका खंडन करती रही हैं.

इसी साल 23 नवंबर 2019 को अजित पवार ने फड़णवीस के साथ उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. हालांकि अगले दिन वो वापस शरद पवार के साथ लौट आए. लेकिन साल 2023 में NCP में फूट हुई और अजित पवार ने बीजेपी के साथ जाकर फिर से उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. परिवार और पार्टी की फूट सतह पर आ गई.

‘बैटल ऑफ बारामती’ में सुप्रिया VS सुनेत्रा

साल 2024 में आधिकारिक तौर पर सुनेत्रा पवार ने राजनीति में एंट्री ली. अजित पवार और NCP ने उनको बारामती लोकसभा से टिकट दिया. सामने अजित की चचेरी बहन सुप्रिया सुले थीं. इस लड़ाई को अजित पवार बनाम शरद पवार के तौर पर देखा गया. सुनेत्रा पवार इस दौरान खूब एक्टिव रहीं. उन्होंने गांव-गांव का दौरा किया. चुनावी अभियान के दौरान शरद पवार ने उनको बाहरी बता दिया. इसके जवाब में वो हर जगह कहतीं,  

'आपने दादा (अजित पवार) की पत्नी के रूप में मुझे स्वीकार किया. लेकिन साथ में सुनेत्रा भाभी के तौर पर भी स्वीकार किया है.'

लेकिन बारामती के लोगों ने इस लड़ाई को शरद पवार की आन के साथ जोड़ लिया. नतीजन सुप्रिया जीतीं और सुनेत्रा को हार का सामना करना पड़ा. लेकिन इस चुनाव के बाद राज्य की सियासत में उनकी एक पहचान बनी. लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद साल 2024 में अजित पवार ने उनको राज्यसभा भेज दिया. महायुति गठबंधन की उम्मीदवार के तौर पर उन्हें निर्विरोध चुना गया. जून 2024 में शपथ लेने के बाद से राज्यसभा में उनकी अपस्थिति लगभग 69 फीसदी रही है, जबकि चार बहसों में भाग लिया है. इस मामले में राष्ट्रीय औसत 58 फीसदी और औसतन हर साल 10 बहस है.

भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं

महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाला मामले की शुरुआती जांच में उनका नाम भी सामने आया था. चीनी मिलों के लेन देन में शामिल कंपनियों से उनके लिंक थे. साल 2021 में ईडी ने अजित और सुनेत्रा पवार से जुड़ी फर्मों की संपत्तियों को जब्त किया था. लेकिन एजेंसी ने आरोप पत्र दायर किया तो उसमें दोनों में से किसी का नाम नहीं था. अप्रैल 2024 में मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने उन्हें क्लीन चिट दे दी. शाखा ने कहा कि बैंक से जुड़े लोन स्वीकृत करने या चीनी मिलों की बिक्री और पट्टे में कोई गड़बड़ी नहीं मिली है.

भविष्य की चुनौतियां 

सुनेत्रा पवार की छवि बेहद सौम्य और मृदुभाषी नेता की है. साथ ही उनका राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव बेहद कम है. ऐसे में लॉन्ग टर्म में बीजेपी के साथ समन्वय और पार्टी के क्षत्रपों को साथ जोड़े रखने में उनको कठिनाई आ सकती है. वरिष्ठ पत्रकार साहिल जोशी का मानना है,

 डिप्टी सीएम बनना आसान है लेकिन पार्टी का मुखिया बनना मुश्किल क्योंकि सारे राजनैतिक फैसले उसी को लेने होंगे. फिलहाल तो प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे पार्टी के मजबूत क्षत्रप उनके साथ खड़े नजर आ रहे हैं. लेकिन सुनेत्रा की असल चुनौती इन नेताओं को अपने साथ बनाए रखने की होगी.

उनकी दूसरी बड़ी चुनौती NCP के मर्जर की है. क्योंकि अगर अजित पवार जिंदा होते तो वो मर्जर के बाद पार्टी के स्वाभाविक नेता होते. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में मर्जर आसान नहीं  होगा. यूं भी पार्थ पवार को राज्यसभा भेजकर सुनेत्रा ने उन्हें अजित पवार के उत्तराधिकारी के तौर पर आगे कर दिया है. जिसे स्वीकार करना सुप्रिया सुले और पवार परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए आसान नहीं होगा.

वीडियो: अजित पवार के प्लेन क्रैश से पहले पायलट को फोन पर क्या कहा गया था?

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