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पुतिन जिस नाटो के पीछे पड़े हैं, उसकी कहानी जान लीजिए

NATO को लेकर Ukraine-Russia क्यों आपस में भिड़े हुए हैं?

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NATO को लेकर Ukraine-Russia क्यों आपस में भिड़े हुए हैं?
रूस-यूक्रेन विवाद के बीच जिस नाम पर सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वो है नेटो (NATO). पूरा-पूरा बोलें तो नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन. अभी वाला झगड़ा इसी के इर्द-गिर्द घूम रहा है. रूस कहता है कि यूक्रेन को नेटो में लिया तो ठीक नहीं होगा. गारंटी दो कि कभी यूक्रेन को इसका मेंबर नहीं बनाया जाएगा. उधर, अमेरिका और नेटो वाले कहते हैं कि ये बेमंटी है. हम इस शर्त को नहीं मानेंगे. इसी को लेकर दोनों तरफ़ तनातनी है. रूस के पौने दो लाख सैनिक यूक्रेन बॉर्डर के पास तंबू लगाकर बैठे हैं. कुछ सैनिक बेलारूस में युद्ध अभ्यास करने जा रहे हैं. यूक्रेन को पश्चिमी देशों से भारी मदद मिल रही है. नेटो अपने सदस्य देशों की ज़मीन पर भारी-भरकम हथियार तैनात कर रहा है. कुल जमा बात ये है कि युद्ध की तैयारी ज़ोरों पर है. नेटो का इतिहास क्या है और ये काम कैसे करता है? रूस-यूक्रेन के झगड़े में इसकी क्या भूमिका है? और, क्या ये संगठन रूस को टक्कर दे सकता है? साल 1945. यूरोप में दूसरा विश्वयुद्ध लगभग समाप्त हो चुका था. स्टालिन की रेड आर्मी ने बर्लिन में अपना झंडा फहरा दिया था. एडोल्फ़ हिटलर ने आत्महत्या कर ली थी. बाकी वॉर क्रिमिनल्स पर मुकदमा चलाने की तैयारी हो रही थी. उसी समय पैसिफ़िक में युद्ध चलता ही जा रहा था. जापान सरेंडर करने के लिए तैयार नहीं था. अमेरिका को लगा कि इस तरह से लड़ाई लंबी खिंचेगी. जान-माल का नुकसान बढ़ता जाएगा. इससे बचने के लिए अमेरिका ने दो परमाणु बम गिराए. अगस्त 1945 में. हिरोशिमा और नागासाकी पर. दोनों बम तबाही का प्रतीक थे. इन बमों ने दोनों शहरों को लगभग बर्बाद कर दिया. घबराए जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया. इस तरह दूसरे विश्वयुद्ध का बचा-खुचा चैप्टर भी क्लोज़ हो गया. जैसा कि विद्वानों ने कहा कि विश्वयुद्ध इतने भयावह हैं कि कोई भी देश दोबारा लड़ने से पहले सौ बार सोचेगा. परमाणु बम ने उस भयावहता को विस्तार दिया था. लेकिन दुनिया की चेतना नहीं जागी. अमेरिका ने परमाणु बम के बारे में सोवियत संघ को नहीं बताया था. अमेरिका और सोवियत संघ दूसरे विश्वयुद्ध में एक ही पाले में थे. इसके बावजूद उससे इतने बड़े फ़ैसले के बारे में राय नहीं ली गई थी. स्टालिन को शक हुआ कि अमेरिका बहुत कुछ छिपा रहा है. ये शक आगे चलकर मनमुटाव और फिर तकरार में बदल गया. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ और अमेरिका महाशक्ति बनकर उभरे. उन्होंने छोटे देशों को अपनी-अपनी तरफ़ मिलाना शुरू किया. स्टालिन ने पूर्वी यूरोप के कई देशों में कम्युनिस्ट सरकार स्थापित करवा दी थी. इससे अमेरिका को ये डर हुआ कि स्टालिन के साम्यवाद की लहर पश्चिमी यूरोप तक भी पहुंच सकती है. 1948 में बर्लिन नाकेबंदी की घटना ने इस धारणा को पुष्ट किया कि सोवियत संघ से निपटने के लिए एकजुट होने की ज़रूरत है. बर्लिन नाकेबंदी का क़िस्सा क्या है? दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी को चार हिस्सों में बांटा गया. ये चार हिस्सेदार थे - अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस और सोवियत संघ. वेस्ट जर्मनी में अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस थे, जबकि ईस्ट में सोवियत संघ की हिस्सेदारी थी. वेस्ट बर्लिन तक जाने का रास्ता सोवियत क़ब्ज़े वाले इलाक़े से होकर गुज़रता था. जून 1948 में सोवियत संघ ने वो रास्ता बंद कर दिया. इससे सप्लाई लाइन ठप पड़ गई. वेस्ट बर्लिन के लोग बुनियादी चीज़ों के लिए तरसने लगे. फिर अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस ने मिलकर बर्लिन एयरलिफ़्ट चलाया. इसके तहत, हर तीस सेकंड पर जहाज बुनियादी सामान भरकर वेस्ट बर्लिन में उतरते और वापस लौट जाते. ये सिलसिला तब तक चला, जब तक कि सोवियत संघ ने रास्ता खोल नहीं दिया. भले ही रास्ता खुल गया था, लेकिन भरोसे पर ताला लग चुका था. पश्चिमी देशों को एक सुरक्षा संगठन की ज़रूरत महसूस हो रही थी. 04 अप्रैल 1949 को वॉशिंगटन में 12 देश इकट्ठा हुए. उन्होंने मिलकर नेटो की नींव रखी. ये पूंजीवादी देशों का सोवियत विस्तार को चुनौती देने के लिए बना सैन्य संगठन था. इसने सामूहिक सुरक्षा का वादा किया. कहा गया कि अगर नेटो के एक देश पर हमला हुआ तो माना जाएगा कि ये हमला पूरे नेटो पर हुआ है. ऐसी स्थिति में नेटो के सभी सदस्य देश पीड़ित की सहायता करने आएंगे. चूंकि अमेरिका नेटो का सबसे ताक़तवर देश था, इसलिए उसे नेटो का मुखिया मान लिया गया. नेटो के जवाब में सोवियत संघ ने 1955 में वॉरसा पैक्ट की स्थापना की. ये कम्युनिस्ट देशों का साझा सुरक्षा संगठन था. इसके बाद दोनों धड़ों में हथियारों की रेस शुरू हुई. दोनों के पास अकल्पनीय तबाही मचाने वाले हथियार थे. 1962 के क्यूबा संकट के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ एक-दूसरे पर परमाणु बम गिराने के लिए तैयार हो गए थे. अंतिम क्षण में जाकर वो संकट टला. तब दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के बीच हॉटलाइन स्थापित की गई. ताकि परमाणु युद्ध की संभावना से बचा जा सके. 1980 के दशक में कोल्ड वॉर धीमा पड़ने लगा था. अमेरिकी धड़े वाले देशों में तरक्की हो रही थी. वहीं, सोवियत धड़े वाले देश बुनियादी चीज़ों के लिए जूझ रहे थे. यूटोपिया का दावा एक दिवास्वप्न साबित हुआ था. एक तरफ़ पूंजीवादी देशों में नए आविष्कार हो रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ सोवियत संघ कोल्ड वॉर में उलझा हुआ था. तेल और गैस की कीमतें घटने के चलते आर्थिक संकट बढ़ गया था. इसी दौर में सोवियत संघ को अफ़ग़ानिस्तान युद्ध में भी पैसा झोंकना पड़ रहा था. इसी बीच में सोवियत धड़े वाले देशों में प्रोटेस्ट शुरू हो गए. 1989 में पोलैंड, ईस्ट जर्मनी, बुल्गारिया, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और रोमानिया में कम्युनिस्ट सरकारों के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा. कई हफ़्तों के प्रोटेस्ट के बाद ईस्ट जर्मन सरकार ने हाथ खड़े कर लिए. उसने ईस्ट जर्मनी के लोगों को वेस्ट में जाने की इजाज़त दे दी. 28 बरसों से खड़े बर्लिन वॉल को गिरा दिया गया. ये सोवियत संघ के पतन का प्रतीक बन गया. आख़िरकार, दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया. वॉरसा पैक्ट जुलाई में ही भंग हो चुका था. नेटो के पहले सेक्रेटरी-जनरल हेस्टिंग्स लियोन इस्मे ने एक बार कहा था, नेटो का मकसद है, सोवियत संघ को बाहर करना, अमेरिका का प्रभुत्व कायम रखना और जर्मनी को औकात में रखना. सोवियत संघ टूट चुका था. वॉरसा पैक्ट भी खत्म हो चुका था. यानी, जिस मकसद से नेटो की स्थापना की गई थी, वो पूरा हो चुका था. फिर नेटो को भंग क्यों नहीं किया गया? नेटो ने अपना चरित्र बदल लिया. उसने कहा कि अब हम शांति कायम रखने के मकसद से काम करेंगे. यूरोप में अस्थिरता बढ़ रही थी. 1992 में बोस्निया और हर्ज़ेगोविना में नेटो ने पीसकीपिंग फ़ोर्स भेजी. 1999 में कोसोवो में भी उसने ऐसा ही किया. जानकार बताते हैं कि मकसद बदलने के पीछे भी एक मकसद छिपा था. अमेरिका को डर था कि रूस वापस से खड़ा हो सकता है. सोवियत संघ वाला ख़तरा दोबारा पनप सकता है. अमेरिका ये भी नहीं चाहता था कि उसका बना-बनाया एकाधिकार खत्म हो जाए. इसी वजह से उसने नेटो को बरकरार रहने दिया. सितंबर 2001 में अमेरिका पर हमला हुआ. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन की इमारतों से विमान टकराए गए. इन हमलों में लगभग तीन हज़ार लोगों की जान चली गई. अमेरिका नेटो का अगुआ देश है. हमला उसकी धरती पर हुआ था. नेटो के आर्टिकल पांच के अनुसार, एक देश पर हमले का मतलब सभी सदस्य देशों पर हमला है. ऐसी स्थिति में सभी देश जवाब देने आएंगे. वही हुआ भी. अमेरिका के नेतृत्व में नेटो सेना अफ़ग़ानिस्तान गई. वो अलग बात है कि 20 साल तक चले युद्ध के बाद उन्हें हारकर वापस जाना पड़ा. अब सवाल ये आता है कि यूक्रेन को लेकर नेटो और रूस का झगड़ा कब शुरू हुआ? ये शुरू तो हुआ 2014 में, लेकिन इसकी बुनियाद 1990 के दशक में ही रख दी गई थी. सोवियत संघ के विघटन के बाद पूर्वी यूरोप के 14 देश नेटो के सदस्य बने. इनमें से कई एक समय तक सोवियत संघ और वॉरसा पैक्ट का हिस्सा थे. एस्टोनिया और लातविया की सीमाएं सीधे रूस से जुड़ती है. सीमाएं छोटी हैं, लेकिन वहां नेटो ने अपनी मिसाइलें तैनात कर रखीं है. ये रूस को नागवार है. यूक्रेन नेटो का सदस्य तो नहीं है, लेकिन उसका साझेदार ज़रूर है. मतलब ये कि नेटो में शामिल होने के रास्ते उसके लिए खुले हैं. अगर यूक्रेन नेटो में शामिल हुआ तो रूस की दो-तिहाई से अधिक पश्चिमी सीमा सीधे नेटो की पहुंच में आ जाएगी. रूस का कहना है कि ऐसा हुआ तो बवाल काट देंगे. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अमेरिका को 1990 के एक वादे की याद दिलाते हैं. पुतिन का दावा है कि अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने जर्मनी के एकीकरण के समय एक वादा किया था. क्या? वादा ये था कि नेटो पूर्व की तरफ़ एक इंच भी नहीं बढ़ेगा. अमेरिका कहता है कि बेकर के बयान को लेकर ग़लतफ़हमी हुई है. वो ईस्ट यूरोप नहीं बल्कि ईस्ट जर्मनी में विदेशी सेना की मौजूदगी के बारे में बात कर रहे थे. जर्मनी के एकीकरण को लेकर जो संधि हुई, उसमें ये तय हुआ कि पुराने ईस्ट जर्मनी में नेटो सेना को नहीं रखा जाएगा. लेकिन नेटो के अंदर तैनात जर्मन सैनिकों को वहां तैनात किया जा सकता है. ईस्टर्न यूरोप में नेटो के विस्तार को लेकर उस संधि में कोई चर्चा नहीं हुई थी. रूस और पश्चिमी देश अपने-अपने हिसाब से इसकी व्याख्या करते हैं. रूस वादाख़िलाफ़ी का आरोप लगाता है, जबकि पश्चिमी देश रूस पर दुष्प्रचार का आरोप लगाते हैं. इसी बहस के बीच 2014 में रूस ने क्रीमिया को अपनी सीमा में मिला लिया था. उस समय नेटो ने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया था, लेकिन उसने अपने सहयोगी देशों में सेना ज़रूर उतार दी. नेटो ने लातविया, पोलैंड, एस्टोनिया और लिथुआनिया में अपनी बटालियन तैनात की हुई है. रोमानिया में नेटो की एक ब्रिगेड है. इनमें सभी सदस्य देशों के सैनिक है. यूक्रेन संकट के बीच नेटो कई जहाज और फ़ाइटर जेट्स इस इलाके में लगाए हैं. रूस का कहना है कि उनको पूर्वी यूरोप से हटाया जाए. 1997 के बाद जो भी देश नेटो के मेंबर बने हैं, उन्हें नेटो से निकाला जाए. और ये गारंटी मिले कि आगे किसी भी देश को नेटो में शामिल नहीं किया जाएगा. अमेरिका ने यूक्रेन को नेटो में कभी शामिल नहीं करने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है. अमेरिका ने ये मांग मानने से साफ़ मना कर दिया है. उसने कहा कि यूक्रेन एक संप्रभु देश है. वो अपने फ़ैसले ख़ुद ले सकता है. नेटो के दरवाज़े यूक्रेन के लिए हमेशा खुले रहेंगे. अमेरिका के विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने कहा कि हमने रुस को डिप्लोमैटिक रास्ता सुझाया है. अगर वो माने तो ठीक, नहीं तो हम किसी भी स्थिति के लिए तैयार है. ब्लिंकेन ने ये नहीं बताया कि उन्होंने रूस को क्या प्रस्ताव दिया है. हालांकि, उन्होंने इतना ज़रूर कहा कि हम किसी भी तरह से रूस के सामने झुके नहीं हैं. प्रस्ताव सीक्रेट है. उसे सावर्जनिक नहीं किया जा सकता. इस प्रस्ताव पर रूस का भी बयान आ गया है. रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि सबसे ज़रूरी सवाल को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है. उनका इशारा यूक्रेन में नेटो में जगह मिलने की संभावना की तरफ़ था. लावरोव ने कहा कि बाकी प्रस्तावों पर बातचीत की गुंज़ाइश बनी है. लेकिन जब मुख्य मुद्दा ही एजेंडे में नहीं रखा गया है तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाता. रूस के हमले की स्थिति में नेटो यूक्रेन का कितना साथ देगा? यूक्रेन को लेकर नेटो में एकजुटता की कमी दिख रही है. अफ़ग़ानिस्तान में हार के बाद से नेटो की गंभीरता पर सवाल खड़े हुए हैं. कई देशों में नेटो को भंग करने की मांग भी चली. एक तरफ़, अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा डिफ़ेंसिव हथियार भेज रहे हैं. डेनमार्क, फ्रांस, स्पेन और नीदरलैंड्स पूर्वी यूरोप में फ़ाइटर जेट्स तैनात कर रहे हैं. वहीं, जर्मनी ने यूक्रेन को हथियार देने से मना कर दिया है. जर्मनी, अमेरिका के बाद नेटो का सबसे बड़ा सहयोगी है. उसकी नीति कॉन्फ़्लिक्ट ज़ोन में हथियार ना भेजने की रही है. जर्मनी ने कहा है कि वो हथियार की बजाय पांच हज़ार हेलमेट्स भेजेगा. यूक्रेन ने इसे भद्दा मज़ाक बताया है. जानकारों की मानें तो इस समय व्लादिमीर पुतिन का हाथ ऊपर है. वो कैलकुलेट करके कदम उठा रहे हैं. उन्हें पता है कि क्या करना है और क्या नहीं. पुतिन की तुलना में पश्चिमी देश आपस में सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं. यूक्रेन को सबसे अधिक भरोसा नेटो पर है. अगर नेटो के सदस्य देशों में आम सहमति नहीं बन पाई तो क्या होगा? इसका जवाब जल्दी ही मिलने की उम्मीद है.

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